Sunday 18th April 2021

अब कहाँ बसंतीलाल…?

अब कहाँ बसंतीलाल…?

व्यंग्य*कमलेश व्यास 'कमल'

सोफे पर अधलेटा होकर सोहनलाल द्विवेदी जी की यह पंक्तियां गुनगुना रहा था-
आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत
सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठी झूल
बेलों में फूले नये फूले
पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।
मेरी यह गुनगुनाहट पड़ोसी का बच्चा, जो कि मेरे घर में खेल रहा था, सुनकर खेलते- खेलते रुक गया और दरवाजे की ओर देखने लगा। जब मेरा गुनगुनाना रुका तो पूछने लगा- “बसंत अंकल तो आए ही नहीं ?” मैं जोर से हंस पड़ा। वह मासूम बच्चा सोच रहा था कोई बसंत नाम का व्यक्ति आया है जिसे देखकर मैं गुनगुना रहा था उसे क्या समझता, बहुत छोटा था। जबकि अब तो बड़ों-बड़ों को मालूम नहीं पड़ता कि बसंत आ गया है! महानगरों और महानगर बनते शहरों की तो छोड़िए अब तो कस्बाई शहरों में भी बसंत ढूंढना पड़ता है। योगेश्वर कृष्ण ने गीता में कहा है कि- “मैं ऋतुओं में बसंत हूं।” कामदेव पुत्र बसंत के आगमन पर पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं, तरह-तरह के फूल खिलने लगते हैं, कोयल मधुर गाना गाती है, और सुवासित सुगंध फैल जाती है, प्रकृति झूमने लगती हैं, भंवरे गुनगुनाते हैं, तितलियां लहराती है आम बौरा जाते हैं इत्यादि बहुत सी प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन अनादिकाल से कवियों ने अपने काव्य में बसंत के लिए किया है और आज भी सिर्फ कवि ही एक ऐसा प्राणी होता है जिसे बसंत आता हुआ दिखाई दे जाता है…! वरना किसे फुर्सत है यह सब देखने की…?
बस साहब कवियों की इस तरह लिखी हुई कविताएं पढ़-पढ़ कर हमने भी सोचा कि चलकर किसी पार्क में बसंत के दर्शन कर लिए जाएं, क्योंकि शहरों में तो ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं, बेतहाशा धुआं उगलते वाहनों की भीड़ में बसंत दिखाई दे सकता है तो वह कोई पार्क ही हो सकता है। यह सोचकर एक उद्यान का रुख हमने किया और वहां जाकर प्रकृति का रुदन देख कर मन विचलित हो गया। सुभाषित मधुर-मधुर बयार की कल्पना उद्यान के मुख्य द्वार पर ही धराशाई हो गई, जब संडास मारती बदबू का सामना हुआ। भीतर प्रवेश करने पर इसका कारण भी ज्ञात हो गया दो दिन पहले वहां एक स्थानीय नेता ने अपने पुत्र के विवाह का रिसेप्शन किया था, जिसके अवशेष यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। एक कोने में बची हुई जूठन पड़े-पड़े सड़ रही थी, जिसकी बदबू पूरे उद्यान सहित आसपास तक फैल चुकी थी। भौरों की गुंजन की जगह मक्खियों की भनभनाहट, तितलियों की जगह लाइट के कीड़े फड़फड़ा रहे थे। बसंत की ऐसी दुर्दशा देखकर हम तो उल्टे पांव लौट आए। हम सोच रहे थे काश हमें कोई कवि मिल जाए तो उसे इस बसंत के साक्षात्कार करवा दें…! हम सोचते हैं कि वसंत ऋतु वह ऋतु होती है जो संत को भी वश में कर लेती है, इसीलिए इसको बसंत कहा जाता है। परंतु ऐसा आलम देखकर तो स्वयं कामदेव का भी पलायन करने का मन हो जाए…! यह सब देखकर तो श्रद्धेय गोपालदास नीरज की पंक्तियों को पलटकर गाने को मन करता है-
बौराई अंबुवा की डाली
गदराई गेहूं की बाली
सरसों खड़ी बजाय ताली
झूम रहे जल पात
रायन की बात न करना
आज बसंत की रात
गमन की बात न करना।
आज से कुछ साल पहले जबकि भौतिकवाद का शिकंजा नहीं था एक आम आदमी भी प्रकृति से जुड़ा रहता था उसके जीवन के सुख-दुख क्रिया-कलापों में प्राकृतिक परिवर्तनों का प्रभाव परिलक्षित होता था। बसंत पंचमी को संतान उत्पन्न हो तो नाम बसंतीलाल या बसंता बाई या बसंती होता था, कुछ बाद में बसंतीलाल से बसंत भी हुए पर अब ना बसंतीलाल मिलेंगे ना बसंती अलबत्ता बसंत पंचमी को किसी ऐसे ही उद्यान में किसी शादी के रिसेप्शन में लोग गंदगी फैलाने अवश्य इखठ्ठा होंगे। या अंतरजाल के माध्यम से बसंत पंचमी की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान कर बसंत उत्सव मनाते दिखेंगे। लेकिन कोई थोड़ा सा भी कवि हो गया है तो बसंत पंचमी को कहीं ना कहीं काव्य गोष्ठी में बसंत पर लिखी अपनी कविता अवश्य सुनाएगा!! आखिर वह सरस्वती पुत्र है… अपनी माता का जन्मोत्सव वह नहीं बनाएगा तो कौन मनाएगा..?

*कमलेश व्यास ‘कमल’
  उज्जैन

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