Tuesday 18th May 2021

एक गम्भीर फ़िल्म बनते -बनते फूहड़ हास्य तक सिमट गईः बाला

एक गम्भीर फ़िल्म बनते -बनते फूहड़ हास्य तक सिमट गईः बाला

*शिशिर उपाध्याय

शारीरिक विकृतियों पर अनेक फिल्में बनी है , विगत दिनों बौने पन को लेकर zero भी बनी थी , आलोच्य फ़िल्म इन्ही विकृतियों, विकारों या कमियों को लेकर बनी है। फिल्म ” बाला ” एक अच्छी फ़िल्म या कहें कि मील का पत्थर बनते -बनते रह गई ,,हालाँकि गंजापन पैदाइशी नहीं होता यह एक विशेष प्रोटीन की कमी से होता है , किन्तु हम कहें तो स्त्री- पुरुषों के बालों को लेकर विश्व मे एक बड़ा उद्योग चल रहा है , जो आए दिन आपको यह अहसास दिलाता है की आप के बाल सफेद हो रहें हैं , आप के बाल झड़ रहें हैं , आप गंजे हो रहे हो ,ढ़ेर सारे विज्ञापन बालों के सौंदर्य के तेल , शेम्पू , खिजाब , जंगली महँदीयो के आते हैं , इसके साथ ही त्वचा के रंग को लेकर हम जन्मजात काले बहुत चिंतित रहें , और सदियों से इसे चमकदार ,श्वेत रखने के लिए अनेक औषधीयों का प्रयोग करते आ रहें हैं , विवाह में हल्दी और मेहंदी की रस्म के पीछे भी मूल त्वचा के रंग को छूपाने का ही है ,,।।ऐसे ही बालों को छुपाने के लिए दूल्हे को पगड़ी ,साफा और सेहरा पहनाया जाता है । आदि काल से विकारों को छुपाने के लिए यह प्रयोग किया जाता रहा है ,एक लोकोक्ति भी यहाँ प्रासङ्गिक है , जो लग्न लगने के बाद दुल्हन का पिता कहता है , जिसका जवाब दूसरी पंक्ति मे दूल्हे का बाप देता है:-अब गढ़ जीत गई मेरी कानी/दूल्हा पाँव चले तब जानी ।
बहरहाल फ़िल्म बाला का प्रथम भाग फूहड़ तरीके से बालों के उगाने और गंजा पन दूर करने के अनेक उपाय बताता है , जो नई जनरेशन को बहुत बहुत आंदोलित करता है , कह दें कि गालियों और ऐसे मुहावरों का प्रयोग खुले आम किया जा रहा है , जो हमारी संस्कृति में वर्जित है। कुब्जा सुंदरी की कथा को बारम्बार रंग और वकृता हेतु बताया गया किन्तु यह नहीं बताया की भगवान कृष्ण ने मन की सुंदरता को ही सर्वोच्च बताया , भगवान ने कहा कि असुन्दर कोई भी नहीं है ,मगर पोंड्स , लोरियल ,निविया , ब्रीलक्रिम ,,आदि के उपयोगकर्ता कहाँ मानते हैं , जिस देश के पुत्र मोहनदास करमचंद गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद के खिलाफ अपना संघर्ष किया वो ही देश त्वचा के रंग नाम पर अरबों रुपयों का सौंदर्य क्रीम बेचता है ,नकली बाल , wig का प्रचलन बढ़ा है, ब्यूटी पार्लर नामक संस्थान हर गली कूचे में खुल गए हैं , शुद्ध हिंदी में हम इन्हें BBSK ” भगवान भूल सुधार केंद्र “” कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । फ़िल्म का उत्तरार्ध ज़रूर एक गम्भीर चिंतन को लेकर उभरता है , जिसमें नायक को अपनी भूलों का अहसास होता है , नायक आयुष्मान खुराना निश्चित रूप से नई पीढ़ी के गम्भीर अभिनेता हैं , वे अनेक बार संजीव कुमार के निकट खड़े दिखते हैं ,, भूमि पेंढणेकर भी सशक्त अभिनेत्री है ,कुरूपता को स्वीकारना और नक़ली पन का विरोध करना लतिका की खूबसूरती है, यह एक चुनौती थी उनके लिए जिसका निर्वाह उन्होंने सहजता से किया। यदि निर्देशक अश्लील हास्य के बजाय शिष्ट हास्य को तवज्जो देते तो यह फ़िल्म : कोशिश , स्पर्श और दोस्ती और कुंवारा बाप की श्रेणी में होती , क्षणिक हास्य बोध फ़िल्म के पूर्वार्ध को न केवल कमज़ोर करता है वरन हमारे जैसे 60:70;80 के दर्शकों को जिन्हें आईने के सामने जरा देर खड़े होने पर ही कनपटी वार होता था,झुंझलाहट देता है।
फ़िल्म का अंत सुखद इसलिए है क्योंकि उसमें नायक और नायिका को अपनी कमियों के साथ मिला दिया गया है।और मूल मंत्र ” हम जैसे हैं, वैसे ही उसे स्वीकारें ” को जीवन मे उतारने का संदेश मन को ढाँढस देता है। फ़िल्म के अन्य कलाकार सौरभ शुक्ला , पूर्व सांसद/ सीता जी दीपिका चिखलिया , जावेद जाफरी , यामी गौतम ,,आदि अपनी भूमिका बखूबी निभाते हैं,,सङ्गीतकर सिवाय शोर के कुछ नया नहीं दे पाए , निर्देशन कमज़ोर है , tiktok के ज़रिए हल्का मनोरंजन करवाया है जो आजकल आम है। जाते जाते एक प्रसङ्ग याद आया , नायक गा रहा है “तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूंगा नायिका झल्लाकर विग उतार कर कहती है लो खूब मज़े से करो ,मैं ये चली…

*शिशिर उपाध्याय, बडवाह 9926021858

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