Sunday 18th April 2021

जन्म -26 सितंबर 1926, निधन -5 जनवरी 2020

कर्मठता के प्रतिरूप रहे महाराजा बहादुर कमल सिंह

लेख*मीरा सिंह 'मीरा'

 
बिहार राज्य के बक्सर जिला अंतर्गत डुमरांव महाराजा बहादुर कमल सिंह जी नहीं रहे, यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई ।जो सुना ,स्तब्ध हो गया और सीधे भागते हुए राजघराना पहुंच गया। अपने जनप्रिय राजा की खोज खबर लेने। देश के प्रथम लोकसभा के प्रथम सांसद व रियासती हुकूमत के अंतिम राजा महाराजा बहादुर कमल सिंह जी का निधन रविवार कि सुबह 5:00 बजे उनके पैतृक आवास महाराजा कोठी में हो गया। वह जीवन के 94 बसंत पार कर चुके थे। डुमरांव राज के रूप में उसके स्वर्णिम सफर को पंद्रहवें राजा के रूप में महाराजा कमल बहादुर सिंह ने अपने जीवन काल तक जारी रखा। उनकी सहृदयता और अभिभावक की छवि का ही परिणाम था कि 1950 में प्रजातंत्र लागू होने के बाद भी डुमरांव और पूरे शाहाबाद के लोगों के दिल में राज परिवार का सम्मान कम नहीं हुआ। जब सभी राज राजवाड़े का भारतीय गणराज्य में विलय प्रारंभ हुआ, तो डुमरांव राज उन चंद राजवाड़ों में थे जो स्वेच्छा से खुशी-खुशी गणराज्य में शामिल हुए। उन्होंने स्वेच्छा से डुमराव राज्य का शासन शाहाबाद के तत्कालीन जिला अधिकारी को सौंप दिया। उस वक्त महाराज मात्र 26 वर्ष के थे। यही नहीं लोकतंत्र के प्रति अटूट आस्था प्रकट करते हुए देश का पहला आम चुनाव शाहाबाद संसदीय क्षेत्र से लड़े और भारी बहुमत से जीते। इस तरह राजतंत्र की चौखट छोड़ लोकतंत्र की सीढ़ी चढ़ने वाले पहले राजा भी बने।1952 से 1962 तक  निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते एवं दो बार सांसद रहे ।प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु भी इनकी वर्षा जल के संरक्षण के प्रति सोच, पेय जल संचयन को लेकर दूरदृष्टि के कायल थे।
कर्मठता के प्रतिरूप रहे महाराजा बहादुर का कर्मठता ही सबसे बड़ा अस्त्र था। वे खुद खेतों में काम करते थे ।सुबह में दो घंटा तो निश्चित रूप से खेत खलिहान के लिए समर्पित था। 600 एकड़ की खेती अपने बल पर करने वाले डुमरांव महाराज ने उद्योग के क्षेत्र में भी अपनी बड़ी पहचान बनाई थी ।अपने क्षेत्र की जनता को रोजगार मुहैया कराने के उद्देश्य से डुमरांव सूत मिल, लालटेन फैक्ट्री व कोल्ड स्टोरेज का निर्माण करवाएं जिससे लगभग  पांच हजार लोग प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से आश्रित थे।
आज के राजनेता कई घोषणाएं करते हैं, जो कभी पूरा नहीं हो पाती हैं। इससे इतर महाराजा बहादुर वादे के पक्के थे। जो कह देते थे, उसे करके दिखाते थे। अपने जीवन काल में इलाके के कई स्कूल, अस्पताल, तालाब बनवाए तो कई के लिए जमीन दान किए, जिसका लाभ उस इलाके के लोगों को मिल रहा है ।चाहे वो भोजपुर जिले का प्रतिष्ठित महाराजा कॉलेज व जैन कॉलेज के लिए दान दी गई भूमि हो या प्रताप सागर में बिहार के इकलौते टी बी अस्पताल के लिए किया गया भूदान ।इसके अतिरिक्त डुमरांव में राज हाई, स्कूल महारानी उषा रानी बालिका मध्य विद्यालय,  महारानी बालिका उच्च विद्यालय, डुमरांव राज प्रयागराज संस्कृत विद्यालय आदि संस्थानों के लिए जमीन दान के साथ ही साथ महाराजा बहादुर ने बिक्रमगंज का अस्पताल हो ,सभी उनके दानवीरता के प्रत्यक्ष प्रमाण है। कला, संस्कृति ,शिक्षा  एवं स्वास्थ्य सेवाओं के साथ डुमरांव में औद्योगिक क्रांति के जनक के रूप में सदैव याद किए जाएंगे। यही वजह है कि अपने प्रिय राजा के आखरी दर्शन के लिए सड़कों पर अश्रुपूरित नेत्रों के साथ जनसैलाब उमड़ पड़ा। डुमरांव  आने से पूर्व राजा रानी के किस्से मैं स्वयं किताबों में पढ़ी थी। यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे कर्मठ, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित व जन सरोकारों को समर्पित महाराजा बहादुर को नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिला।यहां की जनता इनके किए गए कार्यो के लिए सदियों याद करेगी। राज्य सरकार द्वारा इनकी लोकप्रियता को देखते हुए  राजकीय सम्मान के साथ इनका अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया है।

*मीरा सिंह “मीरा”
डुमरांव, जिला- बक्सर, बिहार

 
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