Tuesday 18th May 2021

क्या कहते हो?

कविता *आकृति विज्ञा 'अर्पण'

मौत  को जिया जीवन भर उसने
मौन रही चिल्लाकर भी
बहरे थे सब सुनने वाले?
कर दिया उसको घोषित गूंगी?
फिर सबने उसके चीर हरे?
औ आँसू पर हुयी सियासत?
फिर जाति कौम का पता लगाकर
इक तबके का दिया हवाला
इक बात बताओ
क्या तुमको खुशी नहीं है आज
मर गयी वो…..
अरे मरी नहीं आज़ाद हुयी है…
आओ न मिलकर जश्न मंनायें
जाकर कह दो उन सब बहरों से
न व्यर्थ करें फूलों की माला
न व्यर्थ करें इक भी मोमबत्ती
आज़ाद है वो अब
इनके हर इक साजिश से
चलो न मितवा जश्न मनायें।
*आकृति विज्ञा ‘अर्पण’
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
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