Sunday 18th April 2021

गैस त्रासदी दुर्घटना की सच्चाई बयाँ करती कहानियाँ

गैस त्रासदी दुर्घटना की सच्चाई बयाँ करती कहानियाँ

कृति-कहानी संग्रह-काली रात लेखक-बटुक चतुर्वेदी प्रकाशक-विभोर प्रकाशन भोपाल संस्करण-2019 मूल्य-60/-

दो दिसम्बर की आधी रात,उस मनहूस सुबह को यूनियन कार्बाइड के प्लांट नम्बर ‘सी’ में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे।लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर एकाएक क्या हो रहा है?कुछ लोगों का कहना था कि गैस के कारण लोगों की आँखों में और साँस लेने में परेशानी हो रही थी।जिन लोगों के फेंफड़ों में बहुत गैस पहुँच गई थी वे सुबह देखने के लिए जीवित नहीं थे।
जानकार सूत्रों का कहना था की कार्बाइड फ़ैक्टरी से क़रीब चालीस हज़ार टन गैस का रिसाव हुआ था और इसका कारण यह था कि फ़ैक्टरी के टैंक नम्बर 610 में ज़हरीला मिथाइल आइसोसानाइट गैस से पानी मिल गया था।इस घटना के बाद रासायनिक प्रक्रिया हुई और उसके परिणामस्वरूप टैंक में दबाव बना।अंततः टैंक खुला रह गया और गैस वायुमंडल में फैल गई।
इस गैस के सबसे आसान शिकार कारख़ाने के पास झुग्गी बस्ती के लोग हुए।ये वे लोग थे जो रोजी रोटी की तलाश में दूर-दूर के गाँवों से आकर यहाँ रह रहे थे।उन्होंने नींद में ही अपनी आख़िरी साँस ली।इस गैस को लोगों को मारने के लिए मात्र तीन मिनट ही काफ़ी थे।कारख़ाने में अलार्म सिस्टम था,लेकिन वह घंटों तक बेअसर बना रहा।
बड़ी संख्या में लोग गैस से प्रभावित होकर आँखों में और साँस में तकलीफ़ की शिकायत लेकर अस्पताल पहुँचे तो डॉक्टर्स को भी पता नहीं था कि इस आपदा से कैसे निपटा जाए?मरीज़ों की संख्या भी इतनी अधिक कि लोगों को भर्ती करने की जगह नहीं रही।बहुतों को तो आँख से दिखाई नहीं दे रहा था।बड़ी संख्या में लोगों के सिर चकरा रहे थे।साँस लेने में तकलीफ़ तो हरेक को हो रही थी।मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया कि पहले दो दिनों में लगभग पचास हज़ार लोगों का इलाज किया गया।
जैसी की आशंका थी कि शुरू में डॉक्टर्स को ही ठीक तरह से पता नहीं था कि क्या इलाज किया जाए।शहर में ऐसे डाक्टर्स भी नहीं थे,जिन्हें मिक गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव रहा हो।हलांकि गैस रिसाव के आठ घंटे बाद भोपाल को ज़हरीली गैसों के असर से मुक्त मान लिया गया था।
भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है।यूनियन कार्बाइड की फ़ैक्टरी से निकली ज़हरीली गैस(मिक या मिथाइल आइसो साइनाइट)ने हज़ारों लोगों की जान ले ली।मरने वालों की संख्या को लेकर मदभेद हो सकते हैं,लेकिन इस त्रासदी की गंभीरता को लेकर किसी को शक,शुबह नहीं है।इसीलिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि मरने वालों की संख्या हज़ारों में थी,तो प्रभावितों की संख्या लाखों में। आज से पैंतीस बरस पहले उस रात मौत ने हज़ारों लोगों को दबे पाँव अपने आग़ोश में ले लिया।भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के कारख़ाने से निकली ज़हरीली गैस के रिसाव के कारण समूचे शहर में मौत का तांडव मच गया।इस हादसे से भोपाल आज तक उबर नहीं पाया है।जब तक इसकी यादें रहेंगी उबरने की संभावना भी नहीं होगी।
वरिष्ठ लेखक श्री बटुक चतुर्वेदी जी के सद्ध प्रकाशित कहानी संग्रह ‘काली रात’ में गैस त्रासदी से जुड़ी सच्ची घटनाओं का चित्रण है। इस संग्रह में चार कहानियाँ हैं।लेखक ने गैस त्रासदी को स्वयं भोगा है।वे परी बाज़ार इलाक़े में रहते थे।1984 की वो कड़कड़ाती रात जब सारा भोपाल नींद के आग़ोश में था तब आधी रात के समय ज़हरीली गैस ने अपना तांडव रचाया।
इस संग्रह की प्रथम कहानी ‘भागो- भागो मौत आई’ में लेखक को मौत के बहुत नज़दीक से दर्शन हुए।उन्हीं दृश्यों के दर्शन पाठक को भी इस कहानी में होते हैं जो हृदय तक झकझोरते हैं।लेखक में ज़िम्मेदार क़लमकार का दायित्व बोध कूट-कूट कर भरा है।उन्होंने स्वयं की परवाह किए बग़ैर समाज की सलामती का बीड़ा उठाया।इस हृदयविदारक घटना से ग्रसित लेखक ने धीरे-धीरे अपने चार जिगर के टुकड़ों को भी खो दिया।
गैस पीड़ित कई महिलाओं की विकृत संतानें पैदा होने का क्या कारण है।आख़िर कब तक भोपालवासियों की और कितनी पीढ़ियाँ इस त्रासदी को भोगेंगी।ये प्रश्न लेखक ही नहीं प्रत्येक भोपालवासियों को आज तक उद्वेलित कर रहा है।
सरकार ने गैस पीड़ितों के दावे के निराकरण हेतु लोक अदालत शुरू किया।कई बरस बीत जाने के बाद भी उस जानलेवा घटना से प्रभावित लोग मुआवज़ा राशि के लिए दर-दर भटक रहे हैं।सुबह से शाम लोक अदालत में ठोकरें खाते वे अपना सा मुँह लेकर रीते हाथ घर लौटने को विवश।’क्षतिपूर्ति’ कहानी में लेखक ने स्वयं के साथ तथा उस दौरान आस-पास के लोगों के साथ घटित घटना को कहानी के शिल्प में गढ़ा है।इस दौरान कई लोग जो उस समय वहाँ थे ही नहीं,उन्हें मुआवज़ा राशि का भुगतान हुआ।दलालों का धंधा ज़ोर-शोर से चल पड़ा।जो रिश्वत दे उसका काम बन जाए और जो ना दे,वो चक्कर काटते वहीं दम तोड़ दे उनकी बला से।’क्षतिपूर्ति’ कहानी में लेखन स्वयं दृष्टा के रूप में मौजूद दुखिया सम्पत बाई का दर्द बयाँ कर रहे हैं,जो हर पाठक को अपनी सी प्रतीत होती है।लोगों के दिलों से संवेदनाएँ मृत  होते देखने का सटीक उदाहरण है ये कहानी।
इस भयावह त्रासदी में हज़ारों लोगों की जानें गई।इसके दूसरे दिन अफ़वाह के कारण जो भगदड़ मची उसमें जान ओ माल  बहुत नुक़सान हुआ।कई लोग अपने परिवार से बिछड़कर कहाँ से कहाँ पहुँच गए।इसी हादसे की शिकार सरसुती को बदमाशों ने नूराबाद में छुपा रखा था।इलाज के दौरान हालत सुधरने के बाद,भोपाल का पता बताने पर वहाँ की पुलिस सरसुती को भोपाल पुलिस के हवाले कर गई,जिसका घर वीरान पड़ा था।घरवालों का अता-पता न मिलने के कारण सरसुती को मामा के पास ले जाया गया।रामरतन भोपाल की भयावह गैस त्रासदी से अनभिज्ञ था।पुलिसवालों के साथ अचानक भांजी को देख वो चिंता में पड़ जाता है।गैस त्रासदी की शिकार दहशत की मारी सरसुती को चारों ओर भेड़िए नज़र आने लगते हैं।उसके हाव-भाव लोगों को पागल सदृश प्रतीत होते हैं,या ज़हरीली गैस के प्रभाव का परिणाम।
लोकभाषा शैली के प्रयोग से ‘भेड़िए’ कहानी का ताना-बाना बुनने में लेखक बहुत सफल रहे हैं।कहानी में सरसुती के किरदार ने रोंगटे खड़े कर दिए।
प्रभावित इलाक़े में पत्रकार के साथ ड्यूटी पर तैनात लेखक का दिल ज़ार-ज़ार रोता है।अपना घर छोड़ शिविर में रहने को बाध्य लोगों तथा मुर्दाघर के दृश्य को देखकर दिल दहल जाता है।लाशों का गोदाम बनी बिल्डिंग में एक के ऊपर एक रखे लाशों में अपने परिजनों को बदहवास ढूँढते देख मन आहत हो उठता है।
लाशों के ढेर में रिश्तेदार को जीवित देख  परिजन की प्रतिक्रिया का जीवंत चित्रण मिलता है कहानी ‘एक शोकाकुल शहर में’।अपने समय में अनेकों दुर्घटनाएँ देखने के बावजूद पत्रकार का दिल गैस त्रासदी की घटना से द्रवित हो उठता है।
इस संग्रह की चारों कहानियाँ सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं।जिसे लेखक ने उतनी ही सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया है।भावपक्ष में घटनाओं का सटीक चित्रण देखने को मिलता है।इस कहानी संग्रह की भाषा सहज और सरल है।लोकभाषा,हिंदी और उर्दू के मिश्रण से कहानी का कलापक्ष बहुत प्रभावी बना है।आदरणीय बटुक चतुर्वेदी जी ने सभी कहानियों के साथ न्याय करते हुए कथ्य और शिल्प को बख़ूबी गढ़ा है।
कीर्ति श्रीवास्तव जी ने आवरण बनाते समय शीर्षक को आत्मसात किया है।जो पुस्तक के शीर्षक को चरितार्थ करता है,जिसके लिए वे प्रशंसा की पात्र हैं।मेरा मानना है इस संग्रह की सभी कहानियों से पाठक सहजता से जुड़ेंगे।साहित्य जगत में ‘काली रात’ कहानी संग्रह का हृदय से स्वागत होगा।इस पुस्तक के द्वारा लेखक ने गैस पीड़ितों को सच्ची श्रद्धांजलि देकर अपने साहित्यकार होने के दायित्व को पूरी श्रद्धा से निभाया है।इस सार्थक कृति हेतु मैं दादा बटुक चतुर्वेदी जी को हार्दिक बधाई एवं शुभेच्छा प्रेषित करती हूँ।
 
समीक्षक-
डॉ.प्रीति प्रवीण खरे,भोपाल म.प्र
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