Wednesday 21st April 2021

जहाँ परिवार में प्रीत, वहाँ हर संकट में जीत

जहाँ परिवार में प्रीत, वहाँ हर संकट में जीत

लेख*डॉ विवेक चौरसिया

कोरोना ने देश-दुनिया में लोगों की जान भले ही कुछ लाख में ली है लेकिन नौकरियाँ कई करोड़ में छीन ली है। मोटा अनुमान है कि दुनियाभर में कोई 30 करोड़ से ज़्यादा लोग अब तक नौकरियों से हाथ धो बैठे हैं। जिनमें पहले से ही गरीबी और बेरोजगारी से जूझने वाले हमारे देश में नौकरी गंवाने वाले क़रीब दस करोड़ लोग बताए जा रहे हैं। साफ़ है इस महामारी ने तन से अधिक धन पर और धन के बहाने आमजन के मन-जीवन में उथलपुथल मचा दी है। जिसके असर आने वाले महीनों में गृहस्थी की सुख-सुविधाओं और परिवार के आनंद-शांति पर पड़ने का अनुमान है।
श्रम संगठनों के आंकड़ों और मनोवैज्ञानिकों के अनुमानों के प्रमाण अभी से दिखने भी लगे हैं। मीडिया समूहों में काम करने वाले मेरे ही कोई दर्जन भर से अधिक मित्रों को आर्थिक संकट का वास्ता देकर घर बैठा दिया गया है। होटल संचालक मित्रों ने यात्रियों की आमद थमने पर स्टॉफ कम कर दिया है और रेस्टोरेंट चलाने वालों ने लगभग सभी कर्मचारियों की स्थायी छुट्टी कर दी है। कुछ दयालु मालिक घर बैठे अपने कर्मचारियों को 40 फ़ीसदी तक वेतन देकर भविष्य के लिहाज़ से ‘अटकाए’ हुए हैं मगर ज़्यादातर ने बेरहमी से ‘कास्ट कटिंग’ का तरीका अपनाया और ‘ख़र्च में कटौती ही आय है’ का अर्थशास्त्रीय अनुकरण कर असंख्य गृहस्थों के लिए महा मुसीबत खड़ी कर दी है।



ब्रह्मचर्य धन के बगैर भी सध सकता है, वानप्रस्थ धन के बिना चल सकता है, संन्यास धन त्यागकर ही घटता है किंतु गृहस्थी धन के अभाव में किसी सूरत में नहीं चल सकती। मानो धर्म और काम दोनों का ‘मोक्ष’ अनिवार्य रूप से अर्थ केंद्रीत है। तब जब चलती जीवन यात्रा में अनायास ही अर्थ का संकुचन हो जाए, कोई संवेदनशील, स्वाभिमानी सद्गृहस्थ क्या करें! अर्थ-विस्तार के उद्योग में लगा व्यक्ति अर्थ-संकोच की अवस्था में पारिवारिक दायित्वों से न तो विमुख तो नहीं हो सकता! उसे कुछ तो करना ही पड़ेगा। यानी अर्थ संकट का सामना भी और परिवार का पोषण भी। पुरुषार्थी पलायन नहीं करेगा और अभिमानी हाथ नहीं पसारेगा।
असमंजस की इस बेला में महाभारत के वनपर्व की कथा के युधिष्ठिर हम सभी गृहस्थों के प्रेरक हो सकते है। अकेले युधिष्ठिर ही नहीं शेष चारों पांडव भाई और द्रौपदी भी, अर्थात पूरा परिवार। मानो भीम और अर्जुन भाई और बच्चों सरीखे नकुल और सहदेव। युधिष्ठिर जुआ में साम्राज्य हारकर अर्थहीन हुए थे मगर हममें से अधिकांश एक महामारी के दुष्प्रभाव में अर्थसंशय में आ खड़े हुए हैं। वे शर्त के बंधन में वनवास को विवश थे, हम नगरवास में ही हैं। स्वभावतः हमारे संताप उन पांडवों से कम हैं लेकिन गृहस्थी और अर्थतंत्र पर समस्या समान है। तय है तब पांडव परिवार के ‘सूत्र’ हमारे लिए उपयोगी सिद्ध होंगे!



सबसे बड़ा सूत्र यह कि अर्थ संकट की घड़ी में इस परिवार के लोग कभी आपस में झगड़े नहीं। न मुखिया युधिष्ठिर ने अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ा, न सुखशय्या से वंचित होने पर द्रौपदी ने दुःख का रोना रोया। पांचाली चीरहरण के अपमान से अवश्य आहत थी और भीम हस्तिनापुर पर आक्रमण करके छलपूर्वक छीने गए राज्य की पुनर्प्राप्ति के लिए आतुर थे, मगर मज़ाल कि किसी ने भी अभाव या असुविधा के लिए एक-दूसरे के प्रति खीझ निकाली हों। बल्कि विकट परिस्थिति में सभी परस्पर सहयोगी बने, सहकारी बने और अपनी क्षमता से अधिक काम करने लगे। सर्वाधिक बलवान भीम अक्सर वन में चलकर थके भाइयों को कंधे पर उठाते रहे तो राजकुमार नकुल-सहदेव फलाहार और पेयजल के प्रबंध में जुटे रहे। अर्जुन भावी युद्ध के लिए दिव्यास्त्र जुटाने देवताओं के पास निकल पड़े तो कभी सेविकाओं से घिरी रहने वाली द्रौपदी ने चूल्हा-चौका सम्भालने में संकोच न किया। परिवार के मुखिया युधिष्ठिर ने गज़ब का धैर्य धरा, धर्म पाला और पलायन का विचार तक पास न फटकने दिया। इतिहास साक्षी है ‘कठिन समय’ कट ही गया!
इससे भी बड़ा सूत्र अक्षय पात्र के प्रतीक में छुपा है। आपने सुना होगा कि वनवास मिलते ही परिवार और साथ रह रहे ऋषि-मुनियों के भरण पोषण की चिंता में युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य मुनि की आज्ञा से सूर्यदेव की आराधना कर अक्षय पात्र प्राप्त किया था। जिसकी ख़ूबी थी कि उसमें एक बार पकाया थोड़ा-सा भी भोजन अनेक लोगों के खा लेने तक अक्षय रहता था। सभी को भोजन कराकर सबसे अंत में युधिष्ठिर खाते। ‘शेषं विघससंज्ञतु पश्चाद् भुङ्क्ते युधिष्ठिर:!’ और उनके भी बाद जैसे ही द्रौपदी अपना भाग लेती, उस दिव्य पात्र का भोजन समाप्त हो जाता।



संकेत है जब हम केवल अपना पेट पालने की फ़िक्र करते हैं, संकट गम्भीर रहता है। जब हम अपने, परिवार के साथ अन्यों के पेट की भी चिंता करते हैं तब हमें ‘अक्षय पात्र’ स्वतः देवकृपा से सुलभ हो जाता है। जब घर का मुखिया विघस अर्थात बचा हुआ और गृह स्वामिनी अपने हिस्सा का दावा सबसे अंत में करती है तब तक घर में अन्नपूर्णा अक्षय बनी रहती है। जादुई अक्षय पात्र तर्क का बर्तन नहीं है बल्कि यह भाव का प्रतीकात्मक पात्र है। ठीक उसी तरह जब परिवार में सदस्यों के बीच प्रेम-प्रीत हो तो न सुख की भूख रहती है, न दुःख की चिंता। संकट आते हैं और टल जाते हैं, फिर अर्थसंकट की क्या बिसात!
साधो! अर्थसंकट यक़ीनन भारी है लेकिन परिवार के आपसी प्रेम, सामंजस्य, सहयोग, साहचर्य और सामर्थ्य से अधिक कर्म करके ही हम इसका मुकाबला कर सकते हैं। उन दिनों का स्मरण करते हुए जब फिर से हम युधिष्ठिर की तरह राजसी सुखों से सम्पन्न होंगे और द्रौपदी की भाँति अंत में अवशिष्ट नहीं अपितु प्रारम्भ में ही पकवानों का भोग लगा रहे होंगे। तब तक ज़रा छायावाद के कवि पण्डित नरेंद्र शर्मा की इन अद्भुत पंक्तियों को गुनगुनाइए, ‘सुख-दुःख आएँ जाएँ/सुख की भूख न दुःख की चिंता, प्रीत जिसे अपनाए/मीरा ने पिया विष का प्याला/विष को भी अमृत कर डाला/प्रेम का ढाई अक्षर पढ़कर, मस्त कबीरा गाए/सुख-दुःख आएँ जाएँ…!’

*डॉ विवेक चौरसिया
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पौराणिक साहित्य के अध्येता है)



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