Sunday 11th April 2021

तेरा बैरी कोई नहीं, जो मन निर्मल होय

तेरा बैरी कोई नहीं, जो मन निर्मल होय

लेख*डॉ विवेक चौरसिया

इस धरती पर अब से पहले न तो एक साथ साढ़े सात अरब से अधिक इंसान थे, न सूचनाओं के प्रसार की आज जैसी तकनीक और गति थी और न ही कोरोना जैसी कोई महामारी कभी आई थी जो आदमी को उसकी औकात बता दे। इस बार ईश्वर ने चालाक आदमी को पूरी चतुराई से उसकी हैसियत बताने की चाल चली है। न भूकंप लाकर धरती हिलाई, न सूनामी देकर समंदर की हद तोड़ी। न आसमान से आग बरसाई, न तूफान के ज़रिए बेलगाम हवाओं को मैदान में छुट्टा छोड़ा। हर बार ऐसी प्राकृतिक विपदाओं के लिए हम ईश्वर को कोसते आएँ, इसलिए इस बार ईश्वर ने ख़ुद पर इल्ज़ाम लेने की गुंजाइश ही न रखी। इंसान अपनी ही करतूत में ऐसा उलझा कि आपस में ही गुत्थमगुत्था हो गया।



यह प्रमाणित है कि धूर्त चीन में यह वायरस पैदा किया गया और पूरी शठता से जगत से छुपाया गया। जो दूसरों का घर फूंकने के लिए अपने हाथ में अंगारे उठाता है, उसके हाथ भी जलते ही हैं। सो चीन के अंग भी इस आग में झुलसे और दुनिया, वह तो छह माह से झुलस ही रही है। चीनी ही सही, मगर इस जानलेवा वायरस को पनपाने और फैलाने वाले हैं तो इंसान! साफ़ है इंसानों के खोटे करम से इंसानियत सुलग रही है। मरघट बने पृथ्वी के महाद्वीपों में धधकती चिताओं पर इंसान की लाशें ही जल रही हैं और इंसान ही क़ब्रों में लेटाया जाकर मिट्टी में मिल रहा है।
भूकंपों, सूनामियों, विद्युतपातों, झंझावातों, अकाल, अतिवृष्टि आदि के लिए अक्सर आदतन ईश्वर को अपने कुटिल मन-मस्तिष्क की अदालतों में कठघरे में खड़े रखने वाले आदमी के पास आज इस वक्त एक भी ऐसा आरोप नहीं है कि वह कोरोना के कहर के लिए ईश्वर को अदालत में खींच लाएँ और पुराण, कुरान, बाइबिल आदि की मिसालें देकर उस पर मुकदमा चला दें। दुनिया में झूठे से झूठा आदमी भी जब तर्क-कुतर्क के एक तिनके के बिना दूसरे आदमी तक को कोर्ट-कचहरी में लाकर ज़लील करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, तब इस मामले में ईश्वर को न्यायालय तक लाने की हिमाक़त भला कैसे कर पाएगा?



हम अपने ही पाप का ताप भुगते रहे हैं, इसलिए अबकी बार ईश्वर सर्वथा मुक्त है। यहाँ तक कि इस बार जन्मजात दयालु, कृपालु, दीनबंधु दीनानाथ ईश्वर ने भी मानो कोरोना की मार में मरते हम लोभी, कपटी, कृतघ्न इंसानों की इस संकट से रक्षा के लिए तटस्थता धारण कर ली है। गोया कि कामनाओं, भय और लालच से भरी हमारी प्रार्थना और पुकार को सुनकर उद्धार करने के बजाय परमात्मा भी अपने कान बन्द कर योगनिद्रा में चला गया है। लीजिए, संसार में इंसानी खटकरम का ज्वलंत दैत्य कोरोना बेक़ाबू है और उससे रक्षा के लिए ईश्वर से की जा रही हमारी प्रार्थनाएँ बेअसर नज़र आ रही हैं। अब ज़्यादा से ज़्यादा हम ईश्वर को बहरा कहे तो कहकर अपनी खीझ उतार लें!
श्रीरामचरितमानस की यह चोपाई हम सबने अनेक बार सुनी है कि ईश्वर तो वह हैं जो ‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना। अर्थात वह बिना ही पैर के चलता है, बिना कान के ही सुनता है। बगैर हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, तब इस समय वह हमारी पुकार क्यों नहीं सुन रहा? इसलिए कि आज कोरोना की मार में मरे/मारे जाकर भी इंसान अपनी हरक़तों से, अपने छल-छद्मों से बाज़ आने को राज़ी नहीं।



लोग मर रहे हैं मगर लाशों के सौदागरों को आपदा में कमाई के अवसर दिखाई दे रहे हैं। भूखे को दो वक्त का खाना देकर दस जन फोटो खिंचा रहे हैं, लाकडाउन के नुकसान की भरपाई के लिए डॉक्टरों ने फ़ीस बढ़ा दी हैं, पुलिस ग़रीब रेहड़ी वालों के फल ज़ब्त कर लूट के माल से स्वयं को भोग लगा रही हैं। मंदिरों में पुजारी कोरोना पॉजिटिव नेता-अभिनेताओं की स्वास्थ्य कामना के निमित्त हवन का ढोंग कर मीडिया में प्रचार कर रहे हैं। ऐसे हज़ार उदाहरण हैं जिनमें ईश्वर की आँखों में धूल झोंककर मानवता की सहायता के पाखण्ड भरे दिखावे के साथ भविष्य के निजी लक्ष्य छुपे हुए हैं। जब सर्वे भवन्तु सुखिनः का महाभाव केवल निजी और निहित स्वार्थ के लिए हमारा स्थायी स्वभाव बन चुका हो तब सर्वे सन्तु निरामयाः भला कैसे घटेगा? संकट की घड़ी भी जब एक इंसान दूसरे पीड़ित इंसान की मदद के बजाय माल कमाने और मतलब साधने की फ़िराक में रहेगा, पुजारियों की प्रार्थनाओं में निर्मलता के स्थान पर मतलब के मल की मिलावट होगी तब ईश्वर भला पीड़ित मानवता पर क्या दया करेगा!



साधो! जब तक हमारे चरित्र में दोगलापन है और हमारी प्रार्थनाएँ स्वार्थ से भरी है, परमात्मा दया करने वाला नहीं है। कबीर सच ही तो कहते हैं, ‘तेरा बैरी कोइ नहीं, जो मन निर्मल होय। तू आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।’ हमारे दुश्मन हम स्वयं हैं, दूसरा कोई नहीं। अपने लालची, मतलबी, मौकापरस्त, शासक भाव से भरे मन के निर्मल-शीतल होते ही ईश्वर हमारी प्रार्थना सुनेगा। वह बहरा नहीं है, हमें ही अपनी प्रार्थनाओं को केवल ‘अपने’ तक सीमित करने के ‘सबके’ लिए विस्तृत करने को तैयार और तत्पर करना पड़ेगा। अन्यथा आज जो भुगत रहे हैं, उससे अधिक ही भुगतेंगे!

*डॉ विवेक चौरसिया
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पौराणिक साहित्य के अध्येता है)

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