Wednesday 21st April 2021

दक्षिण की निर्भया के संदर्भ में दोहे

*प्रो.शरद नारायण खरे*

एक बार फिर से जगा ,मानव बन हैवान ।
उसकी पशुता ने हरा ,नारी जीवन,मान ।।

हद से गुज़री क्रूरता,दक्षिण का यह कृत्य ।
चंदा भी रोने लगा,रोता है आदित्य ।।

वह भोली सी डॉक्टर,मानव सेवा लक्ष्य ।
हिंसक नर ने कर लिया,उस देवी को भक्ष्य ।।

रौंद दिया बूटों तले,कलिका का संसार ।
फांसी में ही शेष अब,’शरद’ न्याय का सार ।।

सामूहिक दुष्कृत्य यह,सुनकर झुकते शीश ।
दोषी का संहार हो,विनय कौशलाधीश ।।

क्रूर बना मानव बहुत,तनिक न आई लाज ।
कैसे उसने यह किया,सोचे सकल समाज ।।

दिन पर दिन अब बढ़ रहे,महिला प्रति दुष्कर्म ।
नारी की रक्षा पले,हम सबका यह धर्म ।।

चर्चा में आया नगर,आज हैदराबाद ।
पर सिर सबके झुक गये,है सबको अवसाद ।।

क्योंकर नर कामी हुआ,तजकर पावन रूप ।
वह तो तम में खो गया,सिसके उजली धूप ।।

मृत्युदंड ही कारगर,यही आज हुंकार ।
ये दानव रखते नहीं,जीने का अधिकार ।।


   
*प्रो.शरद नारायण खरे
मंडला(मप्र)-481661

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