Wednesday 21st April 2021

प्रकृति पर्व संक्रांति

कविता*आशुतोष

आया प्रकृति पर्व है, मनाओ सब उल्लास
बच्चो के संग में,पतंग उड़ाओ आकाश।।
 
खूब खिले है चेहरे,दान पूण्य गहरे
थाली सज रही है,तिल गूड पसरे।।
 
आनंद की हवा चली,रंगीन हुआ गगन
प्रकृति की अनमोलता से, कम हुई चुभन।।
 
ठिठूरती हुई कलियाँ भी, खिलेंगी शाम सुबह
चहुँ ओर गूँजेगी संगीत, भँवरे मंडरायेंगे शाम सुबह।।
 
खिले खिले से होंगे, बागों की डाली
महकती हवा होगी, रौनक मन मतवाली।।
 
सरसो की फूल होगी, आमो की बगिया
कोयल की कूक होगी, प्यारी प्यारी सखिया।
 
है बात यह प्रकृति की,मन होता मतवाला
पुष्प पराग का मौसम, चाहे कोई हो रखवाला।।
*आशुतोष
पटना बिहार
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )