Wednesday 21st April 2021

31 जुलाई प्रेमचन्द जयंती विशेष-

मानवीय मूल्यों के उद्घोषक: प्रेमचन्द और गोर्की

मानवीय मूल्यों के उद्घोषक: प्रेमचन्द और गोर्की

लेख*प्रो. हरिमोहन बुधौलिया

भारतीय और विदेशी साहित्यकारों की तुलना कोई नयी बात नहीं है। कालिदास और शेक्सपीयर, वाल्मीकि और होमर, तुलसीदास और मिलटन, बायरन और माखनलाल चतुर्वेदी, गेटे और प्रसाद, हार्डी और प्रसाद, पंत और शैली, निराला और ब्राउनिंग, महादेवी वर्मा और क्रिस्टिना रोजेटी, रामचन्द्र शुक्ल और मैथ्यू आर्नोल्ड, अज्ञेय और इलियट, जैनेन्द्र और मीरीडिथ इन तमाम देशी और विदेशी साहित्यकारों की तुलना आज के सुपरिचित विवेच्य विवेचित विषय है। जहाँ तक मेरा विचार है सुधी समीक्षक का उद्देश्य इन साहित्यकारों में से किसी को छोटा-बड़ा, अच्छा-बुरा, तुच्छ-महान सिद्ध करना नहीं होता अपितु दोनों साहित्यकारों के व्यक्तिगत जीवन संबंधी समान घटनाओं एवं साहित्यिक सर्जना में अभिव्यक्त समानधर्मा बिन्दुओं का अन्वेषण ही प्रधान लक्ष्य हुआ करता है।



यहाँ मुझे इतना ही कहना है कि दोनों साहित्यकारों गोर्की एवं प्रेमचन्द में निहित कतिपत्र समानधर्मी बिन्दुओं को खोजकर दोनों को निकट लाने का यह लघु प्रयास है। निःसंदेह प्रेमचन्द और गोर्की दोनों ही महान कलाकार हैं या यो कहें दोनों ही मूलतः उपन्यासकार है और दोनों ने ही अपने-अपने देश के सम-सामयिक वर्ग विशेष के जन-जीवन के ऐसे हूबहू चित्र खींचे है जो प्रतिभा सम्पन्न कलाकार की तुली से ही संभव है। यदि हम साहित्यकारों के जीवन संबंधी कतिपय घटनाओं पर दृष्टिपात करें तो पता लगेगा कि दोनों के व्यक्तिगत जीवन में काफी साम्य रहा है जिसका स्पष्ट प्रभाव उनके साहित्य में ही नहीं व्यक्तित्व में भी साम्य देखते हैं। वे लिखते है “यदि गौर किया जाय तो प्रेमचन्द जी और मैक्सिम गोर्की बाह्यकृतियों की कई रेखाओं में आश्चर्यजनक साम्य दिखाई देगा। दोनों के चित्र उठाकर दोनों के व्यक्तित्व को मिलाकर देखिए। आप यह देखकर हैरत में पड़ जाएँगे कि दोनों देशों की भौगोलिक परिस्थितियों, सभ्यता और संस्कारों में मूलतः भिन्नता होने पर भी दोनों देशों के आधुनिक साहित्य के दो विशिष्ट स्वर्गीय प्रतिनिधियों के व्यक्तित्व में इतनी अधिक समानता पाई जाती है।“
व्यक्तिगत जीवन में गोर्की को अनेक रूकावटें, असंख्य बाधाएँ और मीत के खौफनाक खतरे उठाने पड़े थे। चार वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु हो गई। दुखिया मां के आश्रित ननिहाल में उसने दरिद्रतापूर्वक जीवन व्यतीत किया। गोर्की का नाना बड़ा ही क्रोधी और क्रूर था। वह अपने पत्नी यानी गोर्की की नानी को बड़ी ही निर्दयता से मारता था जिसकी छाप इनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘द मदर’ यानी ‘माँ’ में, पावेल के पिता माइखेल व्लासोव में स्पष्ट दीखती है। गोर्की की माँ का व्यक्तित्व प्रभावशाली था पर वह भी अपना पुनर्विवाह कर अपने दूसरे शराबी और जुआरी पति की नित्य की मारों से तिल-तिल कर जर्जर हो गई और गोर्की के 6 वर्ष पूरे होने से पूर्व ही चल बसी। माँ की मृत्यु के बाद गोर्की को कितने ही कष्टों और मुसीबतों का सामना करना पड़ा। बर्तन मांजने का कार्य, चपरासगीरी, नानबाई के यहाँ रोटी सेंकने का काम, चिड़िया पकड़कर बेचना, मोची के यहाँ जूते बनाना, नक्शानवीस के यहाँ नौकरी, घाट मजदूरी और रेल्वे चैकीदारी आदि सभी कार्यों को करने के लिए बाध्य होना पड़ा। एक बार निराश होकर हैमिग्वे की भांति गोर्की ने भी अपने को गोली का निशाना बना लिया लेकिन वह भाग्यवश मृत्यु के मुँह में जाकर वापस लौट आया।



रोजमर्रा की जीवन-संघर्ष की विसंगतियों और तिक्त घुटन को गोर्की अपने भीतर आत्मसात करता रहा। गोर्की से किसी दूसरे की यातना सहहन न होती थी। निम्नलिखित छोटी-सी घटना ने उसकी जीवनधारा ही बदल दी। एक दिन उक्रेन ग्राम में गोर्की ने एक घोड़ा गाड़ी में एक तरफ घोड़ा और दूसरे घोड़े के स्थान पर एक नग्न औरत को जुते देखा, जिसको कोचवान के स्थान पर बैठा उसका पति बड़ी ही क्रूरता से कोड़ों से मार रहा था। कुछ लोगों की भीड़ भी साथ थी जो खडी बेहयाई से शोरगुल और खुशी मना रही थी। गोर्की यह देखकर हक्का-बक्का रह गया और पूछने पर ज्ञात हुआ कि प्रत्येक बदचलन स्त्री के साथ यहाँ ऐसा सलूक किया जाता है। वह सहन न कर सका और उन जाहिल लोगों के मुकाबले डट गया और उन्होंने गोर्की को इतना मारा कि मरते-मरते बचा।

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उसने अपनी आत्मा की छटपटाहट को इन शब्दों में व्यक्त किया – “मैं संघर्षों में पला हूँ। मैंने बाल्यावस्था से ही लोगों की असहय घृणा और कुविचारपूर्ण निष्ठुरता को सहा है। कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता था यह देखकर कि कोई तो कष्टों से जर्जर, मुसीबतों का मारा है और कोई प्रचुर वैभव में खेल रहा है। मैंने बहुत छोटी उम्र में ही इस बात को समझ लिया था कि वो आदमी अपने को न जाने क्या समझते है और उनका असली रूप तो तब दिखाई देता है जबकि वे गरीब मेहनतकशों से जी-तोड़ काम लेते है, उनकी भत्र्सना करते है। यह सब मुझे सुहाता न था। मेरे दिल में चिंनगारियाँ सी जलती थी। कभी-कभी में क्रोध और प्रतिशोध की भावना से पागल हो उठता था। मुझे प्रतीत होता मानो सघन वन में मैं अपना मार्ग भूल गया हूँ, काँटों में उलझा हुआ हूँ। ऐसे झाड़-झंखाड़ में जा फँसा हूँ, जहाँ से मेरा निकलना कठिन हो गया है।



लगभग इसी प्रकार का संघर्षपूर्ण जीवन प्रेमचन्द का रहा। आठ वर्ष की अवस्था होने पर इनकी माता की मृत्यु, 12 वर्ष के होते-होते दादी की मृत्यु और 16 वर्ष का पूरा करने के कुछ ही माह बाद पिता अजायबलाल की मृत्यु ने इन्हें अकेला छोड़ दिया। प्रेमचन्द की चाची (विमाता, पिता की दूसरी पत्नी) का व्यवहार इनके साथ कभी भी अच्छा नही रहा। कई बार तो इनका मन घर से इतना ऊब जाता था कि घर से भाग जाने की इच्छा होने लगती थी।
प्रेमचन्द को अपने पिता की गलतियों का दण्ड एक साथ भुगतना पड़ा। पिताजी के पुनर्विवाह का तथा अपने अनमेल विवाह का। पिताजी की मृत्यु के पश्चात् घर का पूरा बोझ प्रेमचन्द पर आ पड़ा था और घर में आए दिन कलह होती रहती थी। अत्यन्त निर्धनता और मुसीबतों से इन्होंने दिन काटे। ये उद्गार उन्हीं के हृदय के तो है जो उन्होंने धनिया द्वारा व्यक्त कराए हैं –

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“फिर वह बैन कहकर रोने लगी, इस घर में आकर उसने क्या नही झेला, किस तरह पेट-तन नही काटा, किस तरह एक-एक पैसा प्राणों की तरह संचा, किस तरह घर-घर को खिलाकर आप पानी पीपर सो रही।“ निःसंदेह ये पंक्तियाँ प्रेमचन्द की अपनी आर्थिक कठिनाइयों का दिग्दर्शन कराती है।
प्रेमचन्द के चित्रों में कौतूहल, विवशता, दारिद्रय और दीनता की गहरी निराशा है। दीन, दुर्बल, निरीह-निर्धन, फटेहाल, कुदाल चलाते हुए अथवा हल जोतते हुए भोले-भाले विगना देहाती, जो निर्जीव श्रम में अनवरत पिसते रहने के कारण दुरावस्था में और कितने ही अभावों में से गुजर रहे है। प्रेमचन्द ने भारतीय जनता की जिन्दगी, उनकी समस्याएँ और संघर्षों का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है तो गोर्की रूसी राजनीति की आतंकवादी परम्परा का सर्वाधिक कुशल चितेरा है। खून-पसीना और आँसुओं के सम्मिश्रण से उमड़ा अन्तर का हाहाकार, उबलता जोश, कसकती वेदना, टीस, जीवन की असीम थकान और बैचेनी इन दोनों साहित्यकारों के चिंतन की ठोस आधार भूमि बनी।



हिन्दी के औपन्यासिक सम्राट प्रेमचन्द के हृदय में भी किसानों और मजदूरों के प्रति ऐसा ही असीम स्नेह छलछलाता हुआ प्रवाहित हो रहा है। ठीक गोर्की के ही भाव उनकी निम्नलिखित पंक्तियों में प्रतिध्वनित हो रहे है – “आपके मजूर बिलों में रहते है, गन्दे बदबूदार बिलों में – जहाँ आप एक मिनट भी रह जाए तो आपको कै हो जाए, कपड़े जो वे पहनते हैं, उनसे आप अपने जूते भी न पोछंेगे। खाना जो खाते है आपका कुत्ता भी न खाएगा।
भारत के कोसों दूर रूस में मोलोतफ ने जो कुछ गोर्की के बारे में लिखा है, वहीं आज प्रेमचन्द पर भी हूबहू लागू होता है। गोर्की की महत्ता इस में है कि वह जनता का सच्चा कलाकार है। उसमें मानवीय शक्तियों का पूर्णरूपेण प्रस्फुरण हुआ है। संघर्षों की कड़ी चोट से उसकी कृतियाँ सजग हो उठी है। उसकी आत्मा में सबलता आ गई है, धमनियों में स्फूर्ति भर गई है। उसके उपन्यास गरीबी की गीता है। उनमें किसानों और मजदूरों की करूण आहें और चीत्कार छिपे हैं। इस प्रकार उसने सर्वसाधारण को जीत लिया है और उन्हें अपना मित्र और सच्चा हितैषी बना लिया है। प्रेमचन्द की भांति गोर्की यह कहते हुए मानव को मानवीय मूल्यों की याद दिलाते हैं – “हमने जिस जीवन का निर्माण किया है, उसमें रंग और बू नहीं है, आओ कोशिश करें, कल्पना की मदद से मनुष्य शायद एक पल के लिए जमीन से उठ सके और अपनी असली जगह पा सके जो उसने खो दी है।“

*प्रो. हरिमोहन बुधौलिया
(लेखक हिंदी साहित्य के विद्वान है)

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