Wednesday 21st April 2021

बाल वेश्यावृति वैश्विक दंश है

बाल वेश्यावृति वैश्विक दंश है

लेख *डॉ. निरुपमा वर्मा

बाल यौन शोषण आजकल किसी एक समाज , क्षेत्र अथवा देश की समस्या नहीं रह गई है । बल्कि इससे तो सारा विश्व किसी न किसी रूप में प्रभावित है ।अंतर केवल इतना है कि विकसित देशों में शिक्षा के प्रसार तथा मानवाधिकार की जागरुकता के कारण बाल यौन शोषण का संगठित स्वरुप दिखाई नहीं देता ।जहाँ तक भारत का प्रश्न है , प्रत्येक छोटे बड़े शहरों में ‘रेड एरिया’ के नाम से स्थानों में देह व्यापार चलता है । भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देह व्यापार में प्रति  वर्ष 75, हज़ार लड़कियाँ धकेल दी जाती हैं ।और हर रोज़ 200 लड़कियाँ देह व्यापार की दुनिया में फँस जाती है ।देह व्यापार में 15 प्रतिशत उन बालिकाओं का है जिनकी उम्र 15 वर्ष से कम है । और इस देह व्यापार में आने वाली 71 प्रतिशत लड़कियाँ अशिक्षित है , 86 प्रतिशत बाल वेश्यावृत्ति औसत कर्नाटक , तमिलनाडु ,पश्चिम बंगाल ,महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश है । जबकि राजधानी दिल्ली तो अन्तरराष्ट्रीय गढ़ है ।

वेश्यालय से मुक्त एक मासूम बच्ची ने बताया , कि कोठे की  मालक़िन के दलाल ने पहले उसके साथ बलात्कार किया । फिर जब छापा पड़ा और उसे पुलिस हिरासत में रखा गया तो सिपाही ने भी उसके साथ बलात्कार किया । उस बच्ची का नाम मोहिनी था  लेकिन क्या फर्क पड़ता है कि उसका नाम क्या है???– जितनी बार वह बिस्तर पर मसली गई उतनी ही बार उसके नाम का वजूद खोता गया और रह गया –ढाई अक्षर की पहचान ——“ वेश्या “…..। 

बाल वेश्यवृत्ति के अंधेरे में कितनी ही मासूम बेटियाँ दम तोड़ रही हैं ।ग़रीबी, धर्म के नाम पर बाबाओं पर अंध भक्ति , सामाजिक मूल्यों में गिरावट , पर्यटन उद्योग से जुड़े होटल , ढाबों , जुआघर ही बालवेश्यावृत्ति को बढ़ावा देती हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 2 करोड़ सेक्स वर्कर हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस धंधे में शामिल हैं। देश के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया देश के महानगर सोनागाछी (कोलकाता) को माना जाता है। यहां लगभग 3 लाख महिलाएं देह व्यापार से जुड़ी हैं। दूसरे नंबर पर मुंबई का कमाठीपुरा है जहां 2 लाख से अधिक सेक्स वर्कर हैं। फिर दिल्‍ली की जीबी रोड, आगरा का कश्‍मीरी मार्केट, ग्‍वालियर का रेशमपुरा, पुणे का बुधवर पेठ हैं। छोटे शहरों की बात करें तो वाराणसी का मडुआडिया, मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्‍थान( आंध्र प्रदेश के पेड्डापुरम व गुडिवडा, सहारनपुर का नक्‍कासा बाजार इलाहाबाद का मीरगंज नागपुर का गंगा जुमना और मेरठ का कबाड़ी बाज़ार भी इसी बात के लिए प्रसिद्ध है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में रोजाना लगभग 2000 लाख रुपये का देह व्यापार होता है। 

कैसे पहुंचती है यह बालिकाएं

देश में देह व्यापारियों का व्यापक और सुनियोजित तंत्र फैला हुआ है इन्होंने अपने कार्य क्षेत्र को अच्छी तरह से पहचाना हुआ है यह गांव में अपने व्यक्तियों के जरिए ‘शिकार ‘ पर नजर रखते हैं फिर ‘शिकार ‘ के संबंधियों को बच्ची बेचने के लिए प्रेरित करते हैं यह संबंधी भी नाम मात्र की राशि पर बच्ची को दलाल के हाथों सौंप देते हैं।

इन खरीदी हुई बच्चियों को दलाल पास के नगर या कस्बे में ले आते हैं ,उसके बाद वहां से यह अपने ‘हेड क्वार्टर’ में इन बच्चियों को लाते हैं । यहां इनके साथ तब तक बलात्कार होता है जब तक वह अपने खरीदार के सामने बेबस नहीं हो जाती । बुरी तरह से हताश और मानसिक रूप से टूटी हुई इन बच्चियों को बाद में देश के अन्य हिस्सों में भेजा जाता है जो आर्थिक दृष्टि से समृद्ध है। जहाँ इन दलालों को ऊंची की कीमत मिल जाती है । मासूम बच्चियां शारीरिक रूप से सेक्स के काबिल नहीं होती तो दलाल इन बच्चियों के गुप्तांगों को डंडों , गर्म पानी की ट्यूब या अन्य अमानवीय तरीकों से विकसित करने की कोशिश करते हैं और इस प्रक्रिया में कई बच्चियां मर भी जाती है।कई बार 7 से 10 वर्ष की मासूम बच्चियों को स्त्री हार्मोन के इंजेक्शन लगाकर समय से पूर्व ही आकर्षक युवतियों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है और इसके बाद उन्हें पर्यटक के आगे धकेल कर खुले हाथों धन बटोरा जाता है यह कल्पना नहीं बल्कि कड़वी हकीकत है, काम पिपासु भूखे भेड़िए और धन के भूखे व्यापारी जी खोलकर और निर्भीक होकर नन्ही बालिकाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं ।उनके लिए न किसी कानून का प्रतिबंध है और न किसी नैतिकता का। कुछ समय पूर्व तक ये अवधारणा थी कि बच्चियों को बहला-फुसलाकर इस धंधे में धकेल दिया जाता है । किंतु अब एक भयानक सच और सामने आया है, वह यह कि अधिकतर निर्धन अभिभावक ही अपनी बेटियों को बेचने लगे हैं ताकि वे शहरों में जाकर धंधा करें और पैसे कमा कर उन्हें भेजें ।

‘एड्स’ के भय के कारण भी नाबालिग और कुँआरी बच्चियों की मांग देह व्यापार की मंडियों में बढ़ने लगी है। कुछ लोगों का यह भी मानना है ‘ बाल मजदूरी ‘ से मुक्त कराई गई बच्चियां भी अपने परिवारों के सदस्यों के लालच की प्रवृत्ति की बलि चढ़ जाती है , उनके लिए उनकी संतान कमाने वाली मशीन होती है इसलिए जब एक कमाई का जरिया बंद हो जाता है तो कमाई के दूसरे जरिए की लालसा में वह अपनी बेटियों को देह व्यापार के दलालों को सौंप देते हैं या स्थाई रूप से बेच देते हैं।

बाल वेश्यावृत्ति के क्षेत्र में विदेशी पर्यटकों को लुभाते हुए विदेशी मुद्रा कमाने वाले लोगों का बहुत बड़ा गिरोह सक्रिय है उनकी पहुंच तथा शक्ति काफी घातक है क्योंकि अक्सर पुलिस कानून , प्रशासन तथा समाज भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते और वे लोग समाज में खुलेआम घूमते रहते हैं। फलस्वरूप अबोध बालिकाओं का जीवन इस असमय के यौनाचार से नारकीय बन जाता है। त्रासदी पूर्ण बात यह है कि भारत में बाल देह व्यवसाय की मंडी पूरी तरह विकसित हो चुकी है, समाज के ऊंचे तबके के लोग भी इसमें शामिल रहते हैं तथा पहुंचे हुए दलालों की देखरेख में यह अनैतिक धंधा अमानवीयता की सीमा पार करते हुए खूब चल रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग की “लॉस्ट चाइल्ड ” -रिपोर्ट ने खुलासा किया कि पुलिस तंत्र के नीचे देह- व्यापार कैसे फल-फूल रहा है –उदाहरण के लिए – मान लें कि 10 नाबालिग बच्चियों का एक कोठा बनाने पर पुलिस 50 हजार रुपये वसूल करती है ।20 लड़कियों पर एक लाख । 50लड़कियों की संख्या पहुंचने पर लगभग 3 लाख रुपये वसूले जाते हैं । रोजाना एक ग्राहक से यदि 55 वसूलने पर 10 रुपये पुलिस को जाते हैं । कॉन्स्टेबल से इंस्पेक्टर तक रेट बढ़ता जाता है । (रुपये की संख्या सिर्फ एक उदाहरण है -किंतु प्रक्रिया यही है । ) दलाल इस व्यापार को धड़ल्ले से चला रहे हैं रिपोर्ट के मुताबिक दलाल लड़कियों का पर आकर कोठी मालिकों को भेजते हैं और फिर वह राजनीतिज्ञों से लेकर अधिकारियों तक और कारपोरेट मैंनेजर्स से लेकर रेस्टोरेंट तक मे इन मासूम बच्चियों की सप्लाई करते हैं। 

क्या कहता है कानून

भारतीय दंडविधान’ 1860 से ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक’ 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। इस कानून के अनुसार, वेश्याएं अपने व्यापार का निजी तौर पर यह काम कर सकती हैं लेकिन कानूनी तौर पर जनता में ग्राहकों की मांग नहीं कर सकती हैं। इस कानून का उद्देश्य भारत में यौन कार्यों के विभिन्न कारणों को रोकना और धीरे-धीरे वेश्यावृत्ति को खत्म करना है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भी भारत में वेश्यावृत्ति अवैध है। अगर कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकत करते पाया जाता है तो भी उसके खिलाफ सज़ा का प्रावधान है। अनैतिक आवागमन (रोकथाम) अधिनियम – आईटीपीए 1986 वेश्यावृत्ति को रोकने के लिए बनाया गया है। अनैतिक तस्करी (निवारण) अधिनियम सन 1986 में पारित किया गया था और यह ‘एसआईटीए’ का एक संशोधित रुप है। इस कानून के अनुसार वेश्याओं द्वारा अपनी सेवाओं के लिए दूसरों से आग्रह करने या फिर लोगों द्वारा उनको गलत रास्ते पर ले जाने के लिए गिरफ्तार किया जाएगा। एक तरह से देखा जाए तो, यौनकर्मी को अपने फोन नंबर को सार्वजनिक बनाने की अनुमति भी इस कानून में नहीं दी गई है और यदि वे ऐसा करती हैं तो उन्हें वित्तीय जुर्माने के साथ-साथ 6 महीने की जेल भी हो सकती है।

जो ग्राहक वेश्याओं के साथ संबंध रखते हैं या फिर सार्वजनिक क्षेत्र में 200 गज की दूरी के अन्दर वेश्यावृत्ति से सम्बन्धित किसी भी प्रकार की गतिविधियों में शामिल होते हैं, तो उन्हें उसका जुर्माना भरना पड़ेगा और उन्हें कम से कम 3 महीने की सजा भी हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति 18 साल से कम उम्र की किसी लड़की के साथ ऐसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो ऐसे मामले में उसे (महिला या पुरूष) 7 से 10 साल की सजा हो सकती है। वेश्याओं की जो दलाली करते हैं, वे उनके द्वारा अर्जित की गई आय पर ही निर्भर रहते हैं, इसलिए उनको भी इन मामलों में बराबर का दोषी माना जाएगा। उसी मामले के लिए, यदि कोई वयस्क पुरुष किसी वेश्या के साथ निरन्तर रह रहा है तो उसे भी दोषी माना जा सकता है। अगर वह खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाता है तो उसे 2 से 4 साल तक की सजा हो सकती है। वास्तव में आवश्यक है कि बाल वेश्यावृत्ति को कठोरता से और जड़ से समाप्त किया जाए । अपहरण के अपराधियों के लिए वैसे ही दंड की व्यवस्था हो जो हत्यारों के लिए होती है वेश्याओं की लड़कियों  को आवश्यक और कानूनी रूप से उनसे दूर रखा जाए। आज जब नागरिकता के रजिस्टर को लेकर बहस , समर्थन और विरोध चल रहे हैं , तब ऐसा लगता है कि इन मासूम अबोध बच्चियों की दर्दनाक वेदना , उनके आंसू , उनके शरीर की चोटों , बंद दरवाजों के पीछे घुटती उनकी चीखों का लेखा जोखा क्या कभी रखा जाएगा ? 

*डॉ. निरुपमा वर्मा
  एटा -उत्तर प्रदेश

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    Pramode Mishra 1 year

    मासूम अबोध बच्चियों की दर्दनाक वेदना , उनके आंसू , उनके शरीर की चोटों , बंद दरवाजों के पीछे घुटती उनकी चीखों का लेखा जोखा,का विवरण दिल को झकझोर देती हैं.

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