Wednesday 21st April 2021

मैं निर्भया !

*नवगीत * अशोक आनन*

मैं मर गई और वह सिर उठाकर जी रहा है ।
मेरा परिवार रोज़ अपमान के घूंट पी रहा है ।
जिसे देखो वही –
राजनीति की रोटियां सेंक रहा है।
समाज का ठेकेदार –
मेरे चरित्र पर कीचड़ फेंक रहा है ।
अंधे कानून के समक्ष –
न्याय भी अपना मुंह सी रहा है ।

तुमने मुझे निर्भया तो नाम दे दिया –
पर मैं अभी भी डरी हुई हूं ।
दुष्कर्मियों के चक्रव्यूह में –
मैं आज़ भी घिरी हुई हूं
मेरे पक्षकारों के मुंह में –
अगली दुर्घटना तक जमा दही रहा है ।

मैं निर्भया , मैं न्याय के लिए –
आज़ भी दर- दर भटक रही हूं ।
मैं सफ़ेदपोशों की आंखों में –
आज़ तिनके की तरह खटक रही हूं ।
दुष्कर्म के वक्त ज़माना सो रहा था –
सिर्फ़ ईश्वर ही साक्षी रहा है ।

*अशोक आनन 
मक्सी – 465106 शाजापुर (म.प्र.)
मो नं : 9981240575

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