Wednesday 21st April 2021

राजभवन के तख्त पर सियासत की फांसी

राजभवन के तख्त पर सियासत की फांसी

*नवेन्दु उन्मेष

मुझे देर रात राज्यपाल महोदय का फोन आया। उन्होंने कहा कि तुम फौरन राजभवन में चले आओ। मैं सोचने लगा कि आखिर राज्यपाल महोदय ने आधी रात के वक्त मुझे क्यों तलब किया है। गोयाकि मैं एक साधारण आदमी ठहरा। दौड़ा-दौड़ा मैं अपने आवास के नीचे सीढ़ियों से उतरा और स्कूटी निकाली और बीरान रास्ते पर फर्राटे के साथ स्कूटी दौड़ाता हुआ राजभवन की ओर चल पड़ा। राजभवन के गेट पर पहुंचते ही सिपाही ने मुझे सलामी ठोकी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह मुझे पहले पहचानता हो। न उसने मुझसे वहां रखी प्रवेश पुस्तिका पर
हस्ताक्षर कराये और न कुछ बोला। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसे टोका-क्या तुम मुझे पहचानते हो। उसने कहा मैं आपको पहचान गया। बोला- राजभवन के अंदर से खबर आयी है कि एक व्यक्ति स्कूटी लेकर आयेगा जिसे रोकना नहीं हैं। आगे कहा कि आधी रात को यहां स्कूटी लेकर कोई नहीं आता। यहां तो दिन में भी लोग कार लेकर आते हैं। इसलिए मैं आपको देखते ही समझ गया कि आप वही शख्स हैं जिसे मुझे अंदर से भेजने को आदेश हुआ है।

मैं राजभवन के अंदर पहुंचा तो देखा राज्यपाल महोदय बरामदे में टहल रहे थे। मेरे वहां पहुंचते ही उन्होंने कहा-मैं चाहता हॅूं कि दिन का सूरज निकलने से पहले तुम्हें सियासत की फांसी पर लटका दूं। मैंने उन्हें कहा आखिर मेरी गलती क्या है जो आप मुझे सियासत की फांसी पर लटकाना चाहते हैं। वे बोले यह कोई मौत की सजा नहीं है। यह तो राजनीति की सजा है। जिसे सिर्फ मैं ही दे सकता हूं। इसलिए तो मैंने तुम्हें यहां बुलाया है। मैंने कहा मैं आपकी बातों को समझ नहीं पाया। वे बोले ‘मैं चाहता हॅूं कि दिन का सूरज निकलने से पहले तुम मुख्यमंत्री पद की शपथ ले लो।‘

मैंने उन्हें इनकार करते हुए कहा- ‘मैं यह काम हरगिज नहीं कर सकता, क्योंकि मेरे पास सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं है। सरकार अकसर बहुमत वालों की बनती है। बिना बहुमत के मैं सरकार कैसे बना सकता हॅूं। अगर मेरी सरकार बन भी गयी तो मैं विधायकों का समर्थन कहां से लाउंगा।‘ उन्होंने कहा ‘मैं अच्छी तरह से जानता हॅूं कि तुम जोड़-तोड़ में माहिर हो। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम दूसरे दलों के विधायकों को तोड़ लोगे। इसके बाद विधानसभा में बहुमत भी हासिल कर लोगे।‘ वैसे भी राजनीति में जिस शख्स को सियासत की फांसी पर लटका कर मुख्यमंत्री बनाया जाता है वह ऐन केन प्रकारेण बहुमत सिद्ध कर लेता है। इसलिए मैं चाहता हॅूं कि तुम सूर्योदय से पहले शपथ ले लो। इसके बाद मैं ने राज्य के कई अपने मित्र विधायकों को सूर्योदय से पहले राजभवन आने का निमंत्रण भेजा।

मेरे आग्रह पर कई विधायक लुंगी और बनियान में राजभवन पहुंच गये। कुछ विधायक तो मुंह में ब्रश दबाये मेरी सियासी चाय का भी इंतजार कर रहे थे। मैं सोच रहा था कि राज्यपाल के कहने पर मैं कहीं गलती तो नहीं कर रहा हॅूं। बगैर बहुमत के कहीं कोई सरकार बनती हैं क्या? लेकिन करता भी क्या राज्यपाल महोदय भी मुझे ही सियासत की फांसी पर लटकाकर राज्य से राष्ट्रपति शासन के कलंक को मिटाने पर अमादा थे। एक बार तो मैंने सोचा कि यहां से निकल भागूं लेकिन अब मैं राजभवन के कब्जे में था। ऐसे में मैं भाग भी नहीं सकता था। शपथ ग्रहण की तैयारी की जा रही थी। राज्यपाल ने मुझसे कहा जैसे मैं शपथ पढ़ता हूं वैसे तुम इसे दुहराते जाओ। उन्होंने कहा-मैं ईश्वर की शपथ लेता हॅूं कि देश के संविधान को अक्षुण्ण रखूंगा। इसके बाद मैं सोचने लगा कि आखिर जिस राज्यपाल ने संविधान की कसम खाकर उसे
अक्षुण्ण रखने की कसमें खायी है वे इसे खुद अक्षुण्ण रख नहीं रहे हैं और मुझे इसे अक्षुण्ण रखने की शपथ दिला रहे हैं।

इतने में बगल में सो रही पत्नी ने मुझे जगा दिया। बोली क्या बड़बड़ा रहे हो। तुम्हें नींद में भी संविधान की कसम खाने की सुझी है। घर में दिनभर तो तुम मुझसे लड़ते रहते हो और रात में सविधान की कसम खाते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। इसके बाद सूर्योदय होने से पूर्व हम दोनों पति-पत्नी के बीच गृहयुद्ध षुरू हो गया। मैं सोचने लगा कि राज्यपाल महोदय ने भी हद कर दी। रातभर तो मुझे सब्जबाग दिखाते रहे और दिन में पति-पत्नी के बीच झगड़ा लगाकर राजभवन में खुद आराम से सो गये। मैं दिल खोलकर पत्नी को रात का वाक्या बता भी नहीं पाया।

*नवेन्दु उन्मेष

सीनियर पत्रकार

दैनिक देशप्राण

रांची, झारखंड

संपर्क-9334966328

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