Tuesday 18th May 2021

राहुल शिवाय के नवगीत

नवगीत

सिर्फ विज्ञापन कहता है

होगा विकसित देश
सिर्फ विज्ञापन कहता है
राम भरोसे भोजन, कपड़ा
शिक्षा औ आवास
अर्थ-शास्त्र भी औसत धन को
कहने लगा विकास
सम्मानित समुदाय
जेठ को सावन कहता है
जब-जब बात उठी है
बस्ती कब होगी मोडर्न
तब-तब मुद्दा बनकर आया
पिछड़ा और सवर्ण
क्या हालता है,
मुद्रा-दर का मंदन कहता है
जिसने सपने कम दिखलाए
हुआ वही कमजोर
तकनीकों ने संध्या को भी
सिद्ध किया है भोर
सब हल होगा,
बार-बार आश्वासन कहता है

कैसे हो सुनवाई

आँगन में दलदल फैली है
दीवारों पर काई
घर ही घर का दोषी हो जब
कैसे हो सुनवाई
पूरे घर में हरा-भरा है
बस तुलसी का पत्ता
चार रोटियाँ का पाया है
घर ने जीवन भत्ता
आह-रुदन में बदल गई है
तुलसी की चौपाई
झुकी कमर ले पड़ी हुई है
उधड़ी खाट पुरानी
हँसी ठहाके उत्सव लगते
बीती एक कहानी
शहर गई खुशियों की आखिर
कौन करे भरपाई
जो कल छत थे, नई मंजिलों
को वे ढ़ाल रहे हैं
नए-नए सपनों को आँखों में वे
पाल रहे हैं
और नीव दब रही बोझ से
झेल रही तन्हाई

मुझको दिखी नदी

थककर चूर पड़ी कोने में
मुझको दिखी नदी
जिसमें मन्नत के दीपों को
जलते देखा है
पालिथीन उसको ही आज उगलते
देखा है
भूल गये आखिर कैसे हम
नेकी और वदी
काट नदी की सौ बाहों को
कहां हृदय रोया
विजय नदी पर पायी लेकिन
क्या-क्या ना खोया
कब पिसने का दर्द समझते
रचते बस मेहँदी
नई सदी विकसित होने की
ओर बढ़ रही है
उन्नति के जो नित्य नए सोपान
चढ़ रही है
लेकिन क्या सच देख पा रही
कैसे बढ़ी सदी

निकलते रहे पिता

दुख की रातें कैसे आतीं
मेरे जीवन में
जब सूरज बन मुझमें रोज
निकलते रहे पिता
माना वे दिखते कठोर हैं
पर मन से हैं कोमल
पीड़ाओं ने दस्तक दी जब,
रहे हिमालय का बल
बनने को गंगाजल, खुद ही
गलते रहे पिता
मैं मिट्टी था, जिसे उन्होंने
इक मूरत में ढाला
उनके पग के छालों से ही
मिली जीत की माला
मुझे ढालने को जीवनभर
ढलते रहे पिता
रहे बांटते सबको हरदम
मगर नहीं वे रीते
मेरे सुख की चिंता में ही
देखा उनको जीते
रुके नहीं जीवन के पथ पर
चलते रहे पिता।
*राहुल शिवाय
सरस्वती निवास, चट्टी रोड, रतनपुर, बेगूसराय, बिहार-851101
मो.  8240297052, 8295409649
ईमेल : rahulshivay@gmail.com
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