Tuesday 2nd March 2021

रिश्ते 

कविता *सरिता सुराणा


रिश्ते अब तो 
रिसने लगे हैं 
कभी – कभी तो 
टीसने भी लगे हैं 
आजकल इतने 
बनावटी औऱ खोखले 
हो गए हैं रिश्ते कि 
ऊपर से कछुए जैसी
मोटी खाल का मुखौटा लगा 
परत – दर – परत 
सुनहरे मेकअप का 
मुलम्मा चढ़ा 
चट करने लगे हैं 
अपनों को ही 
अंदर ही अंदर 
दीमक की तरह 
परिणाम ……….
चटकने लगे हैं 
आईने विश्वास के 
टूटने लगी है 
मजबूत डोर 
परस्पर प्यार की 
रह गई हैं मात्र 
औपचारिकताएं ! 
दिखावे भर को सीमित 
बर्थडे , मैरिज एनिवर्सरी या 
फिर होली – दीवाली पर 
‘ हाय – हैलो ! कैसी हो ? ‘
यहाँ पर सब अच्छे हैं ।
जैसे वाक्यांशों में सिमटी 
एक फोन कॉल तक 
या फिर एक एसएमएस तक 
न रहा राखी का नेग 
न तीज का सिंजारा 
न मेंहदी – मोली औऱ 
न ही ओढ़नी – कांचली 
ज्यादा हुआ तो 
कैश डिपॉजिट करवा दिया 
ऑनलाइन यूअर अकाउंट में 
औऱ हो गई 
कर्त्तव्य की इतिश्री 
तभी तो ना रही अब 
रिश्तों में वो गरमाहट 
न ही एक दूसरे की 
चिन्ता में रात – रात भर जागना 
औऱ वो सांसों का 
ऊपर – नीचे उठना 
रह गए हैं बस 
ये मशीनी उपकरण 
एक दूसरे का 
हाल जानने को 
अपना असली चेहरा छिपा 
अच्छा बनने का ढ़ोंग रचने को ।
 
*सरिता सुराणा
  सिकंदराबाद
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )