Wednesday 21st April 2021

लग रहा था कि घर में तन्हा हूँ

ग़ज़ल *बलजीत सिंह बेनाम

लग रहा था कि घर में तन्हा हूँ।
मैं तो लेकिन नगर में तन्हा हूँ।।

साथ मेरे है क़ाफ़िला फिर भी।
है तआज्जुब सफ़र में तन्हा हूँ।।

चाहने वाले तो हज़ार मगर।
हर किसी की नज़र में तन्हा हूँ।।

बुझ चुका इक चराग़ हूँ गोया।
कौन सा मैं असर में तन्हा हूँ।।

मिल ही जाएगा हाँ मुक़ाम मुझे।
गर यक़ीनन हुनर में तन्हा हूँ।।

*बलजीत सिंह बेनाम
   हाँसी

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