Wednesday 21st April 2021

वसंत उदास है

वसंत उदास है

लेख *अलका 'सोनी'



“सखि वसंत आया
 भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया
 किसलय- वसना -नव-वय-लतिका
 मिली मधुर प्रिय उर- तरु पतिका 
 मधुप -वृन्द बन्दी 
 पिक-स्वर नभ सरसाया 
 सखि वसंत आया “
 
निराला जी की इन पंक्तियों में ऋतुराज वसंत का मनभावन वर्णन हमें बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता है ।मन एक मधुर स्वप्न में डूब जाता है। वसंत यानी स्वर्णिम पीत आभा लिए महकता-बहकता मौसम।आम्र-मंजरियों की सुवासित सुगंध के बीच वाग्देवी मां सरस्वती का आगमन।ऋतुओं का राजा वसन्त बड़ी सौम्यता से  मानव -मन पर दस्तक देता है। जब उपवन  केसर, कदंब ,कचनार के फूलों से सज उठता है और पूरी प्रकृति अमलतास के फूलों से भरी रहती है।वसंत के मदमाते रूप पर हर युग में कवियों और रचनाकारों की लेखनी चली है। अनगिनत रचनाएं हुई हैं। वसंत हमारे मन में सुंदर भावनाओं का जागरण करता है। देवदार के वृक्षों की छाया और सघन हो जाती हैं। अंगूरों की लता रस से युक्त हो जाती है। बूटी बूटी अपने चरम सौंदर्य पर होती है। चारों तरफ प्रकृति अपने यौवन पर होती है ।पत्ते बैगनी आभा लिए कोंपलों से युक्त हो जाते हैं ।एक अद्भुत सुवासित सुगंध हर तरफ अनुभव होने लगती है। वसंत ऋतु का एक अत्यंत गौरवमय इतिहास रहा है ।जब राज भवनों में वसंतोत्सव ,मदनोत्सव का भव्य आयोजन पूरे ठाट- बाट से किया जाता था ।युवतियाँ और राज प्रसाद की स्त्रियां पूरे श्रृंगार के साथ इसका स्वागत किया करती थी ।



जाने क्यों अब वसंत कुछ उदास -सा लगता है ।एक अनचाहे मेहमान की तरह आता है ,ठिठकता है और चुपचाप चला जाता है । इस मशीनी युग में उसके इस आने-जाने की पदचाप तक लोग नहीं सुन पाते हैं। तकनीकी प्रगति के साथ लोगों की सौंदर्य बोध की क्षमता भी कम हो गई है । अब मन भावों की उस तरलता से भींजता नहीं है।
अब वह एक पर्व ना होकर बस एक मौसम बनकर रह गया है । बसंत में ज्ञान की देवी सरस्वती की आराधना रिश्तों को नव संस्कार देती है। वसंत कहता है कि हम देवी-देवताओं की तरह आकर्षक और चिर यौवन बने रहें , किंतु इस चरम आकर्षण में भी अपना देवत्व ,अपनी पवित्रता संजोए रखें ।यह आनंद हमारे भीतर -बाहर समान रूप से प्रवाहित हो ।इस ऋतु में आज की “ग्लोबलाइजेशन” के फलस्वरूप एक पश्चिमी संस्कृति ने भी अपना स्थान बना लिया है या कहें तेजी से बनाता जा रहा है। “वैलेंटाइन डे” इसका आगमन भी वसंत में ही होता है। वैलेंटाइन डे मतलब दौड़ते -भागते, येन – केन प्रकारेण प्रेम की उन्मुक्त अभिव्यक्ति । हम वसंत की पूरे 1 मास की मधुरता को भूलकर, इस 1 दिन की उन्मुक्तता की ओर आकर्षित होते जा रहे हैं । प्रकृति की सुंदरता के साथ अपने पवित्र प्रेम का सामंजस्य छोड़, दिखावे की ओर प्रवृत्त होते जा रहे हैं। ” रोज डे” से लेकर ” वैलेंटाइन डे ” पर जाकर रुकने वाले ,इस विदेशी त्यौहार का अंधानुकरण करने से पहले जरा यह भी सोचें कि यह क्या संस्कार दे रही है, हमारी नई पीढ़ी को?? क्या यही प्रेम का उदात्त रूप है!! एक चॉकलेट या टेडी बेयर देकर प्रेम को स्थायित्व दिया जा सकता है!! उसे राधा कृष्ण के स्वरूप में बांधा जा सकता है ?प्रेम अपने पवित्र रूप में सबसे सुंदर लगता है ।हमारे देश में विवाह जैसी संस्था है, जिसका धार्मिक और सामाजिक मूल्य है। उसे छोड़ इस प्रपंच में हम क्यों पड़ते जा रहे हैं ? हम जिनसे प्रेम करते हैं ,उनके लिए इस दिखावे की क्या आवश्यकता है? प्रेम सच्चे मन से किया जाता है , मन की गहराइयों में उतर कर ।



शायद आज की पीढ़ी प्रेम के असली मायने को जानने में जरा भी उत्सुक नहीं है । एक सुंदर और सजीला मौसम हमारे सामने से गुजर जाता है और हमें इतनी भी फुर्सत नहीं कि उसकी सुगंध हम अपने अंतर्मन में उतार सके । ऐसे में वसंत उदास ना हो तो क्या करे ? 
 
*अलका ‘सोनी’
बर्नपुर, पश्चिम बंगाल



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