Wednesday 21st April 2021

हसरतों के जो पंछी हमने पाल रक्खे हैं।

ग़ज़ल *सत्यवान "सत्य"

 
इस  लिए  रवानी  कुछ आ गयी है शेरों में
क़ाफ़िए में ख़्वाब उनके हमने ढाल रक्खे हैं।
 
क्या कहें हसीनों के ज़िक्र और अदाओं को
अंग अंग में अपने क्या कमाल रक्खे हैं।
 
नाचती है अब दुनिया उनके ही इशारों पर
इक ना इक नया हर दिन जो वबाल रक्खे हैं।
 
दूँ जवाब उसको तो लाज़िमी है रुसवाई
सामने  मेरे  उस  ने जो सवाल रक्खे हैं।
 
हैं रकीब उलझन में और यार हैं चुप चुप
ऐसे उस ने मुद्दे कुछ फिर उछाल रक्खे हैं।
 
*सत्यवान “सत्य”
जैतपुर झज्जर
हरियाणा
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