Sunday 18th April 2021

देश के भविष्य को स्वयं अपने निर्माण का अधिकार चाहिए

देश के भविष्य को स्वयं अपने निर्माण का अधिकार चाहिए

लेख*अभिजीत आनंद

युवा वह अवस्था होती है जब कोई लड़का बचपन की उम्र को छोड़ धीरे-धीरे वयस्कता की ओर बढ़ता है। इस उम्र में अधिकांश युवा लड़कों में एक जवान बच्चे की जिज्ञासा और जोश तथा एक वयस्क के ज्ञान की उत्तेजना होती है। किसी भी देश का भविष्य उसके अपने युवाओं पर निर्भर होता है। इस प्रकार बच्चों का सही तरीके से पोषण करने पर बहुत जोर दिया जाना चाहिए ताकि वे एक जिम्मेदार युवा बन सकें।युवा कल की आशा हैं। वे राष्ट्र के सबसे ऊर्जावान भाग में से एक हैं और इसलिए उनसे बहुत उम्मीदें हैं। सही मानसिकता और क्षमता के साथ युवा राष्ट्र के विकास में योगदान कर सकते हैं और इसे आगे बढ़ा सकते हैं।
 
आज का युवा
मानव सभ्यता सदियों से विकसित हुई है। हर पीढ़ी की अपनी सोच और विचार होते हैं जो समाज के विकास की दिशा में योगदान देते हैं। हालांकि एक तरफ मानव मन और बुद्धि समय गुज़रने के साथ काफी विकसित हो गई है वही लोग भी काफी बेसब्र हो गए हैं। आज का युवा प्रतिभा और क्षमता वाला हैं लेकिन इसे भी आवेगी और बेसब्र कहा जा सकता है। आज का युवा सीखने और नई चीजों को तलाशने के लिए उत्सुक हैं। अब जब वे अपने बड़ों से सलाह ले सकते हैं तो वे हर कदम पर उनके द्वारा निर्देशित नहीं होना चाहते हैं।
युवा पीढ़ी आज विभिन्न चीजों को पूरा करने की जल्दबाजी में है और अंत में परिणाम प्राप्त करने की दिशा में इतना मग्न हो जाता है कि उन्होंने इसका चयन किस लिए किया इसकी ओर भी ध्यान नहीं देते हैं। हालांकि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, गणित, वास्तुकला, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों में बहुत प्रगति हुई है पर हम इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते हैं कि अपराध की दर में भी समय के साथ काफ़ी वृद्धि हुई है। आज दुनिया में पहले से ज्यादा हिंसा हो रही है और इस हिंसा के एक प्रमुख हिस्से के लिए युवा जिम्मेदार हैं।बच्चों के स्वस्थ विकास और वृद्धि के लिए एक सुरक्षित और सुखी परिवार के माहौल की आवश्यकता होती है। भारत में, बच्चों पर शिक्षा और शिक्षकों द्वारा डाला गया दबाव पारंपरिक तनाव का एक प्रमुख कारण है। पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए माता-पिता द्वारा बच्चों पर डाला गया असामान्य दबाव अधिकांशता अधिक रहा है। अन्य देशों के विपरीत, भारतीय छात्र के संकट में साथियों द्वारा दबाव नहीं डाला जाता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि परिवार से आने वाले शिक्षकों में विशिष्टता की जरूरत है, क्योंकि बच्चों से किया गया खराब व्यवहार उनके मनोबल को कमजोर कर देता है और यह उनके विफल होने का एक प्रमुख कारण बनता है।अधिक कमाई वाले कारोबार के रूप में खेल और मनोरंजन के उदय के साथ, अधिकांश भारतीय लोगों का पारंपरिक कैरियर के रूप में इन क्षेत्रों में ध्यान आकर्षित हुआ है। हालांकि, अधिकांश भारतीय माता-पिता, बच्चों के लिए शिक्षक की आवश्यकता को दूर करने में असमर्थ हैं। भारत के सबसे प्रसिद्ध क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने, कई माता-पिता को यह बताकर सोंचने पर मजबूर कर दिया कि उनके माता-पिता ने उनके शिक्षकों को अभ्यास के दौरान होने वाली गलतियों पर पिटाई करने की अनुमति दी थी। और अब, किसी भी खेल या मनोरंजक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, माता-पिता अपने बच्चों को ऑल राउंडर्स बनने के लिए प्रेरित करते हैं, इसमें बच्चों की कहानी अक्सर सफल कहानी के बजाय एक पीड़ित कहानी के रूप में खत्म होती है।
 



 
बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव
भारत में 15 से 29 साल की उम्र के किशोरों और युवा वयस्कों के बीच आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। परीक्षा में विफलता देश में होने वाली आत्महत्याओं के शीर्ष 10 कारणों में से एक है जबकि पारिवारिक समस्या शीर्ष तीन में है। शुरू मे, खराब मानसून वाले क्षेत्रों के किसानों को सबसे कमजोर समूह माना जाता था, हाल ही में 2012 और 2014 के बीच किये गये अध्ययन से पता चला है कि शहरी इलाकों में अमीर और शिक्षित परिवारों के युवा वयस्कों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति अधिक है। 2014 में जारी एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में परीक्षाओं में असफल होने के बाद 2,471 छात्रों ने अपनी जान गवां दी थी, 2012 में, यह संख्या 2,246 पर आंकी गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर आत्महत्याओं का कारण पढ़ाई के लिए बच्चों पर माता-पिता का दबाव और अच्छे रिजल्ट की उम्मीद है, जो छात्रों के कौशल या हितों के अनुरूप नहीं है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश ने इस क्षेत्र में सबसे खराब प्रदर्शन दर्ज कराया है। कई मामलों में बच्चों के मन में आत्महत्या करने की भावना नहीं होती है, माता-पिता द्वारा इस प्रकार का अनुचित दबाव डाला जाता है, इसमें बच्चों के खराब पालन पोषण और देखभाल के आरोप शामिल हैं जो कई प्रकार के मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण बनते हैं। यह समस्या युवा और वयस्कता के विभिन्न चरणों में प्रकट होती है।
 
शिक्षक बनाम खेल बनाम कला
यह बच्चे की सीखने की अक्षमताओं की पहचान करने में असमर्थता और जीवन के अंत में शैक्षणिक विफलता पर विचार करने में असमर्थ हैं। जबकि छात्रों और बच्चों पर बढ़ते दबाव के लिए सरकारा द्वारा चलाई गयी नीति को भी दोषी ठहराया जाता है इसमें 8 वीं कक्षा तक किसी बच्चे को फेल नहीं किया जाता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि दबाव का एक बड़ा हिस्सा माता-पिता की तरफ से आता है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु इसका उदाहरण हैं जहाँ बच्चों पर उनके माता-पिता द्वारा हाई स्कूल में विज्ञान और गणित लेने के लिए बाध्य किया जाता है, ताकि वह आगे चलकर डॉक्टर या इंजीनियर बन सकें। बच्चों के वाणिज्य या कला में रुचि के विकल्प को नकार दिया जाता है।
बच्चों की वृद्धि के लिए खेल और शारीरिक गतिविधियां जरूरी हैं, यह उनके तनाव को कम करने में काफी सहायता प्रदान करती हैं। बच्चों में खेल संबंधी गतिविधियां उत्पन्न करने की आवश्यकता है लेकिन माता-पिता द्वारा डाला गया अनुचित दबाव बच्चों में खेल के प्रति घृणा उत्पन्न करता है। प्रतिस्पर्धात्मक अभिभावकों द्वारा बच्चों की लगातार तुलना और शर्मिंदा करने की प्रवृत्ति ने इस स्थिति को और भी बदतर कर दिया है।
बच्चों की रचनात्मकता को उत्तेजित करने के लिए नृत्य, संगीत, कला और अन्य गतिविधियां उत्कृष्ट विकल्प हैं। इसमें वह अनुशासन, ध्यान केन्द्रित करने और टीम वर्क जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों को सीखते हैं, इससे उनको किताबी दुनिया से बाहर आकर अपनी क्षमताओं को पहचानने में मदद मिलती है। अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बच्चों पर अभिभावकों द्वारा डाले गये दबाव ने इन सुखद गतिविधियों को प्रतिस्पर्धी घटनाओं में बदल दिया है। इसने बच्चों को भारी तनाव में डाल दिया है।
 


 
 
तनाव के लक्षण
उदासीनता तनावपूर्ण बच्चे के सबसे बड़े लक्षणों में से एक है।अध्ययन, खेलने का समय, टेलीविजन और मनोरंजन या बाहरी गतिविधियों में दिलचस्पी का अभाव आदि इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि कुछ सही नहीं है। जब आप इन कारणों की जाँच करें तो असाधारण थकान, भूख की कमी, नींद के अशान्त तरीके आदि पर भी ध्यान दें।
बच्चों के बार-बार बीमार होने पर भी ध्यान दें यह तनाव का एक आम लक्षण है। अक्सर सिरदर्द, पेट में दर्द और जी मिचलाना आदि आने के कुछ मायनों में एक बच्चा सामान्यतः किसी विशेष गतिविधि के संबंध में भय या चिंता से निपट सकता है।
जब बच्चों की मानसिक स्थिति की बात आती है तो नकारात्मकता और नकारात्मक व्यवहार उनकी गतिविधियों से स्पष्ट होता है। नकारात्मक व्यवहार में अस्थिर मनोदशा, आक्रामकता, सामाजिक अलगाव या साथियों से बातचीत न करना और घबराहट आदि शामिल हैं।
किशोरों के मामले में अभिभावकों द्वारा डाले गये अत्यधिक दबाव से तनाव में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जब छात्र अभिभावक के अनुचित दबाव से निपटने में असमर्थ हो जाते हैं तब वह धूम्रपान, नशीली दवाओं का सेवन और विद्यालयों में बेकार घूमने आदि जैसी अनदेखी गतिविधियों का अभ्यास करने लगते हैं।
जिन गतिविधियों में बच्चे आमतौर पर भाग लेना अधिक पसंद करते हैं, वह कार्य करने के लिए रोकर जिद कर सकते हैं। बच्चों पर शिक्षकों या अभिभावकों द्वारा डाला गया अत्यधिक दबाव उनके उस क्षेत्र में भी प्रदर्शन को खराब कर देता है जिसमें वह स्वाभाविक रूप से निपुण होते हैं।
 
अभिभावकों की सकारात्मकता
आत्मनिरीक्षण – आत्मनिरीक्षण माता-पिता का एक महत्वपूर्ण तत्व है। लंबे दिन के बाद अपने माता-पिता को अपने बच्चों से बातचीत करनी चाहिए। क्या आपने पारस्परिक प्रभावों पर ध्यान दिया है या आपके बच्चे को असहमति का अधिकार है? क्या आपके व्यवहार में उसको समझाने और प्रेरणा देने की बजाय मजबूर किया जा रहा है?
 
प्रोत्साहित करें– माता-पिता द्वारा बच्चे को प्रोत्साहित करना, उसकी सफलता का एक मूल मंत्र हो सकता है। आप अपने बच्चे के जीवन में एक प्रमुख खिलाड़ी हैं उसको आत्मविश्वास, कड़ी मेहनत और उत्कृष्टता सिखाना आप पर निर्भर करता है। यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है कि आपका बच्चा आपकी हर बात को दिल से स्वीकार करे। विफलता नए अवसरों की तलाश करने और शोक का एक अवसर नहीं है।
 
बातचीत करें– आपके बच्चे के साथ बिताए जाने वाले कुछ सबसे अच्छे पल वह होते हैं जब आप खेल रहे हों और मस्ती या मनोरंजन की गतिविधियों में खुशी से भाग ले रहे हों। इन पलों को गहरी मित्रता और दोस्ती बनाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करें। आपके द्वारा दी गयी कोई भी वह सलाह जो उसको आज्ञा या दबाव न लगे, बच्चे के व्यक्तित्व को मजबूत करने में बहुत सहायता करेगी।
 
सहायता प्राप्त करें– आपको और आपके बच्चे के लिए लगातार सहायता मांगना वर्जित नहीं है। वास्तव में परिवार परामर्श के लिए जीवन का एक जरूरी हिस्सा है, जिससे हम आगे बढ़ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं को नकारात्मक व्यवहार संबंधी गतिविधियों की पहचान करने और उन्हें अलग करने में आपकी सहायता करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
बच्चों के स्वस्थ विकास और वृद्धि के लिए एक सुरक्षित और सुखी परिवार के माहौल की आवश्यकता होती है। भारत में, बच्चों पर शिक्षा और शिक्षकों द्वारा डाला गया दबाव पारंपरिक तनाव का एक प्रमुख कारण है। पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए माता-पिता द्वारा बच्चों पर डाला गया असामान्य दबाव अधिकांशता अधिक रहा है। अन्य देशों के विपरीत, भारतीय छात्र के संकट में साथियों द्वारा दबाव नहीं डाला जाता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि परिवार से आने वाले शिक्षकों में विशिष्टता की जरूरत है, क्योंकि बच्चों से किया गया खराब व्यवहार उनके मनोबल को कमजोर कर देता है और यह उनके विफल होने का एक प्रमुख कारण बनता है।अधिक कमाई वाले कारोबार के रूप में खेल और मनोरंजन के उदय के साथ, अधिकांश भारतीय लोगों का पारंपरिक कैरियर के रूप में इन क्षेत्रों में ध्यान आकर्षित हुआ है। हालांकि, अधिकांश भारतीय माता-पिता, बच्चों के लिए शिक्षक की आवश्यकता को दूर करने में असमर्थ हैं। भारत के सबसे प्रसिद्ध क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने, कई माता-पिता को यह बताकर सोंचने पर मजबूर कर दिया कि उनके माता-पिता ने उनके शिक्षकों को अभ्यास के दौरान होने वाली गलतियों पर पिटाई करने की अनुमति दी थी। और अब, किसी भी खेल या मनोरंजक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, माता-पिता अपने बच्चों को ऑल राउंडर्स बनने के लिए प्रेरित करते हैं, इसमें बच्चों की कहानी अक्सर सफल कहानी के बजाय एक पीड़ित कहानी के रूप में खत्म होती है।
 



 
बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव
भारत में 15 से 29 साल की उम्र के किशोरों और युवा वयस्कों के बीच आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। परीक्षा में विफलता देश में होने वाली आत्महत्याओं के शीर्ष 10 कारणों में से एक है जबकि पारिवारिक समस्या शीर्ष तीन में है। शुरू में, खराब मानसून वाले क्षेत्रों के किसानों को सबसे कमजोर समूह माना जाता था, हाल ही में 2012 और 2014 के बीच किये गये अध्ययन से पता चला है कि शहरी इलाकों में अमीर और शिक्षित परिवारों के युवा वयस्कों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति अधिक है। 2014 में जारी एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में परीक्षाओं में असफल होने के बाद 2,471 छात्रों ने अपनी जान गवां दी थी, 2012 में, यह संख्या 2,246 पर आंकी गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर आत्महत्याओं का कारण पढ़ाई के लिए बच्चों पर माता-पिता का दबाव और अच्छे रिजल्ट की उम्मीद है, जो छात्रों के कौशल या हितों के अनुरूप नहीं है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश ने इस क्षेत्र में सबसे खराब प्रदर्शन दर्ज कराया है। कई मामलों में बच्चों के मन में आत्महत्या करने की भावना नहीं होती है, माता-पिता द्वारा इस प्रकार का अनुचित दबाव डाला जाता है, इसमें बच्चों के खराब पालन पोषण और देखभाल के आरोप शामिल हैं जो कई प्रकार के मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण बनते हैं। यह समस्या युवा और वयस्कता के विभिन्न चरणों में प्रकट होती है।
 
शिक्षक बनाम खेल बनाम कला
आधुनिक भारत में शिक्षा प्रणाली और माता-पिता की सबसे बड़ी विफलताओं में दो कारण हैं, यह बच्चे की सीखने की अक्षमताओं की पहचान करने में असमर्थता और जीवन के अंत में शैक्षणिक विफलता पर विचार करने में असमर्थ हैं। जबकि छात्रों और बच्चों पर बढ़ते दबाव के लिए सरकारा द्वारा चलाई गयी नीति को भी दोषी ठहराया जाता है इसमें 8 वीं कक्षा तक किसी बच्चे को फेल नहीं किया जाता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि दबाव का एक बड़ा हिस्सा माता-पिता की तरफ से आता है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु इसका उदाहरण हैं जहाँ बच्चों पर उनके माता-पिता द्वारा हाई स्कूल में विज्ञान और गणित लेने के लिए बाध्य किया जाता है, ताकि वह आगे चलकर डॉक्टर या इंजीनियर बन सकें। बच्चों के वाणिज्य या कला में रुचि के विकल्प को नकार दिया जाता है।
बच्चों की वृद्धि के लिए खेल और शारीरिक गतिविधियां जरूरी हैं, यह उनके तनाव को कम करने में काफी सहायता प्रदान करती हैं। बच्चों में खेल संबंधी गतिविधियां उत्पन्न करने की आवश्यकता है लेकिन माता-पिता द्वारा डाला गया अनुचित दबाव बच्चों में खेल के प्रति घृणा उत्पन्न करता है। प्रतिस्पर्धात्मक अभिभावकों द्वारा बच्चों की लगातार तुलना और शर्मिंदा करने की प्रवृत्ति ने इस स्थिति को और भी बदतर कर दिया है।
बच्चों की रचनात्मकता को उत्तेजित करने के लिए नृत्य, संगीत, कला और अन्य गतिविधियां उत्कृष्ट विकल्प हैं। इसमें वह अनुशासन, ध्यान केन्द्रित करने और टीम वर्क जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों को सीखते हैं, इससे उनको किताबी दुनिया से बाहर आकर अपनी क्षमताओं को पहचानने में मदद मिलती है। अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बच्चों पर अभिभावकों द्वारा डाले गये दबाव ने इन सुखद गतिविधियों को प्रतिस्पर्धी घटनाओं में बदल दिया है। इसने बच्चों को भारी तनाव में डाल दिया है।
 
तनाव के लक्षण
उदासीनता तनावपूर्ण बच्चे के सबसे बड़े लक्षणों में से एक है।अध्ययन, खेलने का समय, टेलीविजन और मनोरंजन या बाहरी गतिविधियों में दिलचस्पी का अभाव आदि इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि कुछ सही नहीं है। जब आप इन कारणों की जाँच करें तो असाधारण थकान, भूख की कमी, नींद के अशान्त तरीके आदि पर भी ध्यान दें।
बच्चों के बार-बार बीमार होने पर भी ध्यान दें यह तनाव का एक आम लक्षण है। अक्सर सिरदर्द, पेट में दर्द और जी मिचलाना आदि आने के कुछ मायनों में एक बच्चा सामान्यतः किसी विशेष गतिविधि के संबंध में भय या चिंता से निपट सकता है।
जब बच्चों की मानसिक स्थिति की बात आती है तो नकारात्मकता और नकारात्मक व्यवहार उनकी गतिविधियों से स्पष्ट होता है। नकारात्मक व्यवहार में अस्थिर मनोदशा, आक्रामकता, सामाजिक अलगाव या साथियों से बातचीत न करना और घबराहट आदि शामिल हैं।
किशोरों के मामले में अभिभावकों द्वारा डाले गये अत्यधिक दबाव से तनाव में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जब छात्र अभिभावक के अनुचित दबाव से निपटने में असमर्थ हो जाते हैं तब वह धूम्रपान, नशीली दवाओं का सेवन और विद्यालयों में बेकार घूमने आदि जैसी अनदेखी गतिविधियों का अभ्यास करने लगते हैं।
जिन गतिविधियों में बच्चे आमतौर पर भाग लेना अधिक पसंद करते हैं, वह कार्य करने के लिए रोकर जिद कर सकते हैं। बच्चों पर शिक्षकों या अभिभावकों द्वारा डाला गया अत्यधिक दबाव उनके उस क्षेत्र में भी प्रदर्शन को खराब कर देता है जिसमें वह स्वाभाविक रूप से निपुण होते हैं।
 


 
 
अभिभावकों की सकारात्मकता
आत्मनिरीक्षण– आत्मनिरीक्षण माता-पिता का एक महत्वपूर्ण तत्व है। लंबे दिन के बाद अपने माता-पिता को अपने बच्चों से बातचीत करनी चाहिए। क्या आपने पारस्परिक प्रभावों पर ध्यान दिया है या आपके बच्चे को असहमति का अधिकार है? क्या आपके व्यवहार में उसको समझाने और प्रेरणा देने की बजाय मजबूर किया जा रहा है?
 
प्रोत्साहित करें– माता-पिता द्वारा बच्चे को प्रोत्साहित करना, उसकी सफलता का एक मूल मंत्र हो सकता है। आप अपने बच्चे के जीवन में एक प्रमुख खिलाड़ी हैं उसको आत्मविश्वास, कड़ी मेहनत और उत्कृष्टता सिखाना आप पर निर्भर करता है। यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है कि आपका बच्चा आपकी हर बात को दिल से स्वीकार करे। विफलता नए अवसरों की तलाश करने और शोक का एक अवसर नहीं है।
 
बातचीत करें– आपके बच्चे के साथ बिताए जाने वाले कुछ सबसे अच्छे पल वह होते हैं जब आप खेल रहे हों और मस्ती या मनोरंजन की गतिविधियों में खुशी से भाग ले रहे हों। इन पलों को गहरी मित्रता और दोस्ती बनाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करें। आपके द्वारा दी गयी कोई भी वह सलाह जो उसको आज्ञा या दबाव न लगे, बच्चे के व्यक्तित्व को मजबूत करने में बहुत सहायता करेगी।
 
सहायता प्राप्त करें– आपको और आपके बच्चे के लिए लगातार सहायता मांगना वर्जित नहीं है। वास्तव में परिवार परामर्श के लिए जीवन का एक जरूरी हिस्सा है, जिससे हम आगे बढ़ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं को नकारात्मक व्यवहार संबंधी गतिविधियों की पहचान करने और उन्हें अलग करने में आपकी सहायता करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
देश के भविष्य को स्वयं अपने निर्माण का अधिकार चाहिए
 
*अभिजीत आनंद,देवघर (झारखण्ड)
 



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