Wednesday 21st April 2021

शांति और पुण्य का ही दूसरा नाम अपरिग्रह है

शांति और पुण्य का ही दूसरा नाम अपरिग्रह है

लेख*डॉ विवेक चौरसिया

कभी ग़ौर कीजिए, आप पाएंगे कि जब हम यात्रा में होते हैं तब एक या अधिकतम दो बैगों में हमारे पास वह सब सामान होता है जिसकी हमें ज़रूरत पड़ती है। कपड़े-लत्ते, ठंड हो तो स्वेटर-शॉल आदि और नित्य कर्म के लिए छोटे-से टॉयलेट बैग में शेविंग किट से लेकर टूथब्रश, पेस्ट, साबुन समेत सब कुछ। दो-चार किताबें, फाइलें, दवाइयां जैसी उपयोगी चीज़ें भी उन्हीं एक-दो बैगों में समा जाती है। महिलाएं हो तो सम्भव है बैग या सूटकेस के साइज़ थोड़े बड़े हो जाए मगर इतना तो तय है कि सफ़र के दौरान हमारी आवश्यकता का समूचा संसार साथ और पर्याप्त रहता है। भोजन को छोड़ बमुश्किल ही कुछ ऐसा होता है, जिसकी कमी अखरती है। अन्यथा काम कहीं अटकता नहीं, सफ़र पूरा होने तक उतना ही सामान जीवन को सुचारू चलाकर हमें वापस घर ले आता हैं।

इससे उलट हमारे घर देखिए, सामानों से उबरा रहे हैं। कपड़ों की आलमारियां भरी हैं और जूतों का ढेर लगा है। दर्ज़नों चादरों से बिस्तर पेटी की सांस फूल रही है और अनगिनत बर्तनों से चौकों का दम घुँट रहा है। निर्धन को छोड़ दीजिए किन्तु औसत आय वाले बहुसंख्यक गृहस्थों के घरों की यही दशा है। जीवन में ज़रूरत अत्यल्प की है लेकिन जब-तब ख़रीद कर या इधर-उधर से जुगाड़ कर हमने अधिकतम का संग्रह कर रखा है। निश्चित ही घर-गृहस्थी में अनेक चीज़ें जो सफ़र में साथ नहीं ले जाती मगर घर पर काम आती है, बावज़ूद इसके बहुत सारा सामान वो है जो हम केवल अपनी संग्रह वृत्ति के कारण बेवजह और गैर ज़रूरी इकट्ठा कर लेते हैं, करते रहते हैं।

कहने को जीवन एक यात्रा है और हम सब यात्री। यात्रा में कम से कम सामान यात्री को हल्का और यात्रा को आनन्ददायी रखता है मगर हम है कि जानते-बूझते सामानों का बोझ सिर पर लादे जीवन यात्रा को बोझिल बना लेने पर आमादा है। हमारे शास्त्र कहते हैं वस्तुओं के परिग्रह की यही आदत मनुष्य के दुःखों की सबसे बड़ी जड़ है। वस्तुओं के प्रति आकर्षण और मोह की पराकाष्ठा यह है कि आदमी को यदि संसार का सारा धन, सारी भूमि, सारी बहुमूल्य वस्तुएँ और यहाँ तक कि सारी स्त्रियाँ भी मिल जाए तब भी उसकी तृष्णा को तृप्ति नहीं मिलेगी। यह भी पढ़ें- जहाँ बुजुर्गों का मान वहीं विजय

इसीलिए भर्तृहरि से लेकर बुद्ध और महावीर तक अपरिग्रह का मर्म जान वस्तुओं से भरे महल छोड़ अपनी मुक्ति का भाव लिए सब कुछ त्याग कर निकल पड़ते हैं। कबीर ग़रीब और गृहस्थ होकर भी इसलिए मस्ती में गा पाते हैं क्योंकि अपरिग्रह का मंत्र साध लेते हैं। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग की पहली सीढ़ी ही यम है और सामाजिक नैतिकता व अनुशासन के सोपान यम के पाँच सूत्रों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य के साथ अपरिग्रह जोड़ा गया है। इसलिए कि सब साधकर भी यदि मनुष्य परिग्रह में जुटा रहा तो योगमार्ग का यात्री कैसे बन सकेगा। वह जुटाई गई वस्तुओं में ही उलझ कर रह जाएगा। यही पाँच सूत्र जैन धर्म के पंच महाव्रत हैं। तभी तो जैन साधु प्रारम्भिक चार के साथ अपरिग्रह को साधकर त्याग का परम प्रतिमान उपस्थित कर जगत पूज्य बन पाते हैं। यह भी पढ़ें- शब्द प्रवाह डॉट पेज

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि महाभारत कथा में दुर्योधन के मन में जूएँ का कुविचार इसी कारण पनपा क्योंकि इंद्रप्रस्थ की स्थापना के समय युधिष्ठिर को मिले उपहारों में प्राप्त वस्तुएँ देख वह बौरा गया था। राजसूय यज्ञ में उपहार में प्राप्त वस्तुओं को संभाल कर व्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी युधिष्ठिर ने ‘घर का आदमी’ जान दुर्योधन को सौंपी थी। वस्तुओं के उन्हीं भंडार ने भाई के मन में भाई के प्रति मैल पैदा कर दिया, जिसकी परिणति पहले द्युत पर्व के रूप में हुई और अंत युद्ध में विनाश के साथ हुआ।

जब युद्ध खत्म हुआ तो विजेता होकर भी युधिष्ठिर दुःख और ग्लानि से भरे घण्टों विलाप करते रहे। जब बोले तो यही बोल फूटे कि ‘मया निसृष्टं पापं हि परिग्रहमभीप्सता। जन्मक्षयनिमित्तं च प्राप्तुं शक्यमिति श्रुति:।।’ अर्थात मैंने परिग्रह ( धन और वस्तुओं के संग्रह ) की इच्छा रखकर केवल पाप बटोरा है, जो जन्म और मृत्यु का मुख्य कारण है। तब जबकि श्रुति कहती है कि परिग्रह से केवल पाप की ही प्राप्ति होती है, मैं श्रुति के कथन के विपरीत परिग्रह ही करता रहा।

महाभारत की समूची कथा भूमि, धन और वस्तुओं के लोभ में सर्वनाश की कटु कथा है। जिसकी प्राप्ति में विजयी होकर भी विलाप और अशांति है, सुख और आनन्द तो है ही नहीं। यह भी कि जिस धन के लिए महाभारत की रणभूमि भाइयों के रक्त से लाल हो गई, वह धन तो युधिष्ठिर को युद्ध जीतकर भी न मिल सका। युद्ध में वीरगति को प्राप्त परिजनों के श्राद्ध तक के लिए पांडवों को धन के लाले पड़ गए थे। महाकाव्य का आश्वमेधिक पर्व प्रमाण है कि युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करना चाहा तो हस्तिनापुर की तिजोरी खाली थी। तब महर्षि वेदव्यास की सलाह पर पाँचों भाई हिमालय जाकर मरुत्त का गढ़ा धन लाए थे और यज्ञ का व्यय व दान सम्भव हो सका था।

साधो! हम सब परिग्रह के चक्कर में अपने जीवन को कुरुक्षेत्र बनाए हुए हैं। वस्तुओं के लगाव और लालच में ही घर-घर भाई-भाई के बीच महाभारत छिड़ी हुई है। तब जबकि हम जानते हैं कि हमें क़ायदे से उतने ही सामान की ज़रूरत है जितना सफ़र में साथ लिए चलते हैं। आदमी दिगम्बर आता है और दिवंगत हो दिगम्बर ही लौट जाता है मगर जीवन भर परिग्रह में पड़कर जीवन को नरक बनाए रखता है। अशांति का नाम परिग्रह और पाप है जबकि शांति और पुण्य का ही दूसरा नाम अपरिग्रह है। जो जानते हुए भी नहीं मानते थे उन्हें कोरोनाकाल ने अपरिग्रह का मंत्र कितने तरीके से सिखाया है, यह हम सब जानते हैं। सार यह कि ज़रूरत से ज़्यादा जो कुछ है वह ज़हर है और ज़हर जीवन के लिए घातक है। जिन्हें अमृत की चाह है उनके लिए एक ही मार्ग है अपरिग्रह। फिर वे संन्यासी हो या गृहस्थ, मुक्ति के मार्ग पर अपरिग्रह ही मन्त्र है, दूसरा कुछ नहीं। कतई नहीं।


*डॉ विवेक चौरसिया
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पौराणिक साहित्य के अध्येता है)

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES
TAGS

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )