Wednesday 4th August 2021

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष-

बहुआयामी विलक्षण व्यक्तित्व के धनी श्रीकृष्ण

बहुआयामी विलक्षण व्यक्तित्व के धनी श्रीकृष्ण

लेख*सरिता सुराणा

श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है। सम्पूर्ण ब्रजमंडल, ‘नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की, हाथी-घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की’ जैसे जयघोषों व लोकगीतों से गुंजायमान हो जाता है। और हो भी क्यों नहीं, श्रीकृष्ण साधारण जनमानस के बीच उतने ही लोकप्रिय थे जितने कि राजपरिवार में। उनके द्वारा किए गए सभी कार्य जनकल्याण की भावना से ओत-प्रोत थे।
कहने को तो श्रीकृष्ण का जन्म राजकुल में हुआ, लेकिन उनके जन्म के समय उनके माता-पिता मथुरा नरेश कंस के बंदी थे। राजकुमारी देवकी के विवाह के समय पर हुई आकाशवाणी से घबराकर कंस ने अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को कारागार में डाल दिया था। वहां पर एक-एक करके उसने देवकी की 6 संतानों को पैदा होते ही मौत के घाट उतार दिया। सातवीं संतान बलराम जी के गर्भ में आने से देवताओं द्वारा उसका हरण करने से वसुदेव जी की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ से उनका जन्म हुआ। अब उसे देवकी की आठवीं संतान की प्रतीक्षा थी, जो उसका काल बनकर जन्म लेने वाली थी। इसी वजह से माता देवकी बहुत भयभीत हो रही थी कि अगर मेरी इस आठवीं संतान को भी अत्याचारी कंस ने मार डाला तो उसके अत्याचारों से प्रजा को मुक्ति कौन दिलाएगा?
परन्तु कहा जाता है कि होनहार को कौन टाल सकता है, जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालक है उसे धरती पर जन्म लेने से कौन रोक सकता है? ऐसा ही श्रीकृष्ण के जन्म के समय हुआ। वह कृष्ण पक्ष की काली अंधेरी अष्टमी की रात थी, जब माता देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। उनकेे तेजोमय व्यक्तित्व का प्रभाव ही ऐसा था कि उनके जन्म के समय सारे द्वारपाल और प्रहरी निद्रामग्न हो गए, कारागृह के बंद द्वार अपने आप खुल गए। उस वक्त बहुत तेज बारिश हो रही थी, यमुना नदी उफान पर थी। उस बारिश में ही वसुदेव ने नवजात कृष्ण को एक टोकरी में रखा और उस टोकरी को लेकर वे जेल से बाहर निकल आए। कुछ दूरी पर ही यमुना नदी थी, उन्हें उसके पार जाना था अपने मित्र नंद के घर। लेकिन इस घनघोर बारिश में यमुना नदी को पार करके कैसे जाऊंगा, यही प्रश्न उन्हें व्यथित कर रहा था। तभी चमत्कार हुआ, यमुना के जल ने भगवान के चरण छुए और फिर उसका जल दो हिस्सों में बंट गया और इस पार से उस पार एक रास्ता बन गया। उसी रास्ते से होकर वासुदेव यमुना नदी को पार करके नंद गांव अपने मित्र के घर पहुंचे। मित्र नंद तो जैसे उनकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी पत्नी ने उसी समय एक कन्या को जन्म दिया था और वे अभी तक अचेतावस्था में थीं। नंद बाबा ने बिना देर किए अपनी नवजात कन्या को लाकर वसुदेव को सौंप दिया और श्रीकृष्ण को यशोदा मैया के पास लिटा दिया। वासुदेव का मन नहीं कर रहा था कि अपनी संतान की रक्षा हेतु वे किसी और की संतान की बलि दें। लेकिन नंद के समझाने पर वे उस कन्या को लेकर मथुरा लौट आए। उनके लौटते ही सब कुछ यथावत हो गया और द्वारपाल ने जाकर कंस को सूचना दी कि देवकी की आठवीं संतान जन्म ले चुकी है। वह दौड़ा-दौड़ा आया और जब उसे पता चला कि यह कन्या है तो उसे इस बात का विश्वास नहीं हुआ। उसने वसुदेव और देवकी को बहुत डराया-धमकाया लेकिन उन्होंने कहा कि इस बार कन्या ने ही जन्म लिया है, इसलिए वे उसे जीवित छोड़ दें। लेकिन कंस ने उसका भी वध कर दिया।
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पूतना वध और कालिया नाग का दमन
अब उसे शक हो गया कि वसुदेव और देवकी ने अपनी आठवीं संतान को कहीं छिपा दिया है इसलिए उसने उस समय जन्मे हुए सभी बच्चों को मारने का आदेश दे दिया और कृष्ण को मारने के लिए पूतना राक्षसी को भेजा। लेकिन उन्होंने शिशु अवस्था में भी अपनी शक्ति से उसका वध कर दिया। तब से उनकी ख्याति और भी बढ़ गई। अब कंस उन्हें मारने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाने लगा। तब उसके डर से नंद और यशोदा कृष्ण को लेकर वृंदावन चले गए। इसी बीच कृष्ण ने कालिया नाग के अत्याचारों से प्रजा को मुक्ति दिलाई। तालवन में रहने वाले धनुक नामक अत्याचारी राक्षस को मारकर प्रजा में व्याप्त भय को दूर किया। इसी कड़ी में उन्होंने यमलार्जुन, शकटासुर, प्रलंब और अरिष्ट जैसे दुष्टों का नाश किया।

गोवर्धन पर्वत को एक अंगुली पर उठाना
कृष्ण हमेशा ग्वालबालों के साथ पले-बढ़े। वे भी अन्य चरवाहों के साथ अपनी गायें चराने जंगल में जाते थे। जब वर्षा के लिए गांववासियों ने इन्द्र देव की पूजा के लिए तैयारियां की तो उन्होंने उनको ऐसा करने से रोक दिया। तब क्रुद्ध होकर इंद्र ने मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। पूरा ब्रज क्षेत्र डूबने लगा तो कृष्ण ने सबकी रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी एक अंगुली पर उठा लिया और जब तक वर्षा नहीं रुकी तब तक सबको शरण प्रदान की। इससे वहां के ग्वालों और गोपियों में कृष्ण के प्रति भक्ति भाव और बढ़ गया। उनकी इस असाधारण क्षमता के किस्से कंस ने भी सुने। अब तो उसे यह दृढ़ विश्वास हो गया कि हो न हो यही बालक देवकी का आठवां पुत्र है। इसकी शक्ति में और वृद्धि हो उससे पहले ही मुझे इसे समाप्त कर देना चाहिए।

श्रीकृष्ण का मथुरा आगमन
श्रीकृष्ण की वीरता के बारे में सुनकर उसने उन्हें सम्मानित करने का बहाना बनाकर मथुरा आमंत्रित किया, ताकि वहां पहुंचने पर उनका वध किया जा सके। उसने मदोन्मत्त हाथी को उनके सामने छोड़ दिया यह सोचकर कि वह उन्हें कुचल देगा लेकिन वह उनके एक इशारे से ही शान्त हो गया। अपना दांव खाली जाता देखकर कंस ने कृष्ण और बलराम दोनों को मल्ल युद्ध के लिए ललकारा। पूरी प्रजा स्तब्ध थी कि चाणूर और मुष्टिक जैसे पहलवानों के साथ ये सुकुमार बालक मल्ल युद्ध कैसे करेंगे? यह तो सरासर अन्याय है। मल्ल युद्ध तो बराबर के योद्धाओं में होना चाहिए। लेकिन इन दोनों भाइयों ने चुनौती स्वीकार कर ली और सभी योद्धाओं को परास्त कर दिया। अब बारी थी मामा कंस की, उसने बहुत कोशिश की कृष्ण को मारने की लेकिन कहते हैं कि साक्षात् भगवान के अवतार को कौन मार सकता था। थोड़ी ही देर में कंस को धराशायी कर दिया। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ गई। चारों ओर कृष्ण-बलराम की जय-जयकार होने लगी।

महाराज उग्रसेन को पुनः राजा बनाना
कंस वध के तुरन्त बाद कृष्ण और बलराम ने अपने नाना महाराज उग्रसेन को कारागार से मुक्त किया। तत्पश्चात अपने माता-पिता को भी बंदीगृह से मुक्त किया और महाराज उग्रसेन का पुनः राज्याभिषेक किया। अब एक तरह से उनका अज्ञातवास समाप्त हो गया था। सारी दुनिया उनके बारे में जान चुकी थी तब उनके पिता और नाना दोनों ने ही इन दोनों भाइयों की शिक्षा-दीक्षा के लिए इन्हें ऋषि सांदीपनी के आश्रम में भेज दिया।
वहां पर दोनों भाइयों ने गुरू से विधिवत दीक्षा लेकर शास्त्र ज्ञान के साथ-साथ शस्त्र विद्या का ज्ञान भी प्राप्त किया। इनके साथ सुदामा भी शिक्षा ग्रहण करता था, वहीं कृष्ण और सुदामा की मित्रता हुई। यह इस बात का प्रतीक है कि कृष्ण ने कभी स्वयं को उच्च और किसी अन्य को निम्न नहीं समझा। उनके लिए ग्वाल बालों से लेकर सुदामा तक और अर्जुन आदि मैत्री में सब बराबर थे।
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जरासंध का मथुरा पर आक्रमण
जब कृष्ण ने कंस का वध कर दिया तो इससे उसका श्वसुर जरासंध अत्यंत क्रोधित हो गया और बार-बार मथुरा पर आक्रमण करने लगा। उसने 17 बार आक्रमण किया लेकिन हर बार उसे विफल कर दिया गया। तब उसने कालयवन के साथ मिलकर भयंकर आक्रमण की योजना बनाई। कालयवन की सेना ने मथुरा नगरी को चारों ओर से घेर लिया। जरासंध ने मथुरा नरेश को संदेश भेजा और कालयवन को युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। तब श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि युद्ध केवल कालयवन और उनके बीच में ही हो। निर्दोष प्रजा को उसमें क्यों घसीटा जाए?तो कालयवन ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। दोनों में घमासान युद्ध हुआ, कृष्ण युद्ध भूमि छोड़कर भागने लगे क्योंकि यह उनकी रणनीति थी। भागते-भागते वे एक गुफा में घुस गए, वहां पर इक्ष्वाकु वंश के महाराजा मांधाता के तपस्वी और प्रतापी पुत्र राजा मुचकुन्द सो रहे थे। कालयवन ने उन्हें कृष्ण समझकर लात मारकर उठा दिया और उनकी नजर पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया। दरअसल ऐसा उस वरदान के कारण हुआ कि जो भी राजा मुचकुन्द को नींद से उठाएगा, उनके देखते ही वह भस्म हो जाएगा।
कालयवन के मारे जाने की खबर सुनकर जरासंध बौखला गया, अब जरासंध के साथ-साथ कालयवन के कबीले वाले भी कृष्ण के शत्रु हो गए तो अपनी प्रजा की भलाई एवं रक्षा के लिए उन्होंने मथुरा नगरी को छोड़ने का निर्णय लिया। महाराज उग्रसेन सहित अक्रूर जी, बलराम एवं उनके 18 कुल के सजातीय मथुरा नगरी छोड़ कर रैवत पर्वत के समीप कुशस्थली पुरी (द्वारिका) में जाकर बस गए। (महाभारत मौसल पर्व 14.43-50) कृष्ण के वहां से चले जाने के बाद मथुरा पर जरासंध का राज हो गया। द्वारिका नगरी में कुछ वर्षों तक कृष्ण ने सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। द्रौपदी के स्वयंवर में पांडवों से उनकी मुलाकात हुई और यहां से ही उन्होंने हस्तिनापुर की राजनीति में अपनी गतिविधियां बढ़ानी शुरू कर दी।

जरासंध का वध
इंद्रप्रस्थ के निर्माण के बाद महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का निश्चय किया और इसके लिए कृष्ण से परामर्श लिया। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि यज्ञ से पहले अत्याचारी राजाओं की सत्ता को नष्ट करना होगा। उसमें जरासंध और शिशुपाल प्रमुख थे। जरासंध का वध करने के लिए उन्होंने उसे मल्ल युद्ध के लिए ललकारा और भीम के साथ मल्ल युद्ध करते हुए वह मारा गया। इसी प्रकार यज्ञ में कृष्ण का 100 से ज्यादा बार अपमान करने पर उन्होंने शिशुपाल का वध कर दिया। इस तरह पांडवों के दो बड़े शत्रुओं का नाश हो गया।
वनवास और अज्ञातवास की समाप्ति के पश्चात जब दुर्योधन ने पांडवों को उनका राज्य लौटाने से इन्कार कर दिया तो कृष्ण ने बहुत से शान्ति प्रस्ताव रखे लेकिन दुर्योधन के अस्वीकार करने से महाभारत का युद्ध हुआ। इस युद्ध में उन्होंने पांडवों का साथ दिया। उन्होंने स्वयं तो शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की लेकिन वे अर्जुन के सारथी बने।

महाभारत युद्ध और गीता का उपदेश
युद्ध शुरू होने से पहले ही जब अर्जुन ने युद्ध करने से इन्कार कर दिया तो श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया। उन्होंने धर्म की विजय के लिए युद्ध में कूटनीति का सहारा लिया। उनकी नीतियों से ही पांडवों की विजय हुई और कौरवों का नाश हुआ। तभी महारानी गांधारी ने उन्हें श्राप दिया कि जिस तरह तुमने कुरु वंश का नाश किया, उसी तरह तुम्हारे यदुवंश का भी नाश हो जाएगा। उसी श्राप के परिणामस्वरूप महाभारत युद्ध के बाद यदुवंश का विनाश हो गया और द्वारिका नगरी नष्ट हो गई।
इस प्रकार श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन की घटनाओं को समग्रता से देखें तो हम पाएंगे कि श्रीकृष्ण साधारण से साधारण जनमानस के साथ उतनी ही सहृदयता और प्रेम से रहते थे, जितने कि राजपरिवार के साथ। वे गोपियों के लिए मटकी फोड़ने वाले नटखट कान्हा थे तो अपने बाल सखाओं के लिए माखनचोर। स्वयं सम्पन्न होते हुए भी वे नंद गांव के घर-घर में जाकर माखन चोरी करते थे, इसलिए कि उनका मानना था कि इस माखन पर सबसे पहला अधिकार बालकों का है। सुदामा की चावलों की पोटली छीनकर खाने वाले द्वारकाधीश के पास क्या अन्न-धन की कमी थी, परन्तु यह सुदामा के प्रति उनका प्रेम था। जिन्हें पाने के लिए, जिनकी विराट छवि के दर्शन करने के लिए संत-महात्मा वर्षों ध्यान लगाते हैं, वे नंदलाल तो यशोदा मैया के पालने में झूला झूल रहे हैं। जो ज्ञानी-ध्यानी योगियों के लिए दुर्लभ हैं, वे महाभारत युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं। कर्मयोग और सांख्य योग में जिनका कोई सानी नहीं है, वे अर्जुन के सारथी बनकर रथ हांकते हैं। तभी तो वे स्वयं कहते हैं कि मुझे जो जिस रूप में भजता है, मैं भी उसे उसी रूप में भजता हूं। ऐसे विराट व्यक्तित्व के धनी महामानव, दार्शनिक, चिंतक, कुशल राजनीतिज्ञ एवं कूटनीतिज्ञ श्रीकृष्ण सम्पूर्ण मानव जाति के लिए वंदनीय हैं।

*सरिता सुराणा
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार है)

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