Wednesday 21st April 2021

भगवान करे ऐसा कोरोना आता रहे

लघुकथा*राहुल शर्मा




जैसी सुबह सुबह दरवाजे की सकल बजी तो आंखे मसलती हुई सत्तर वर्षीय माँ दरवाजा खोलते हुए चौक गयी…
अरे!!! बेटा तू!!! इतना बोलकर आंखे छलकी ही थी कि, साथ मे बहु औऱ पोते को देखकर वो आँखे झर झर बहने लगी…
माँ तीनों को बारी बारी से गले लगाने के बाद माँ बोली कि बेटा तू…इस वक्त??
सब ठीक तो है ना?
तू तो डेढ़ साल बाद आने वाला था ना?
शुभम- माँ वो…
चल छोड़ अंदर आ…सब हाथ मुह धो लो मैं चाय बनाकर लाती हूँ।
इधर आंगन में दातुन करते हुए पिताजी भी चौक कर खड़े हो गए…बोले बेटा तू अचानक यहां कैसे???
नौकरी में सब ठीक तो चल रहा है ना?
शुभम बोला जी पिताजी सब खैरियत है… आप कैसे है? शुभम ने पूरक प्रश्न कर दिया…
हमे क्या होगा बेटा हम तो एक दम मजे में है,….देख जैसा एक साल पहले तू छोड़कर गया था वैसे ही है(पिताजी हँसते हुए बोले)
वही सुबह से गौ सेवा,थोड़ा सा खेत खलिहान घूम लेते है और तुम्हे याद करते रहते है बस…
लेकिन तू बता तुम सब अचानक यहां कैसे?
क्योंकि तूने तो ठीक ढाई साल बाद आने का बोला था?
पिताजी.. वो आपको पता नही है पूरी दुनिया मे एक कोरोना वायरस आया है जिसके कारण सब लोग अपने अपने घर आये हैं।
अरे!!! वाह!!!
कैसे??? क्या???
छोड़िए ना पिताजी वो तो ऐसे ही है… शुभम पिताजी का हाथ पकड़ कर उनके साथ खटिया पर आकर बैठ गया…
औऱ मन ही मन सोचने लगा कि एक वो परदेस की चमचमाती दुनिया जहाँ आज सब मास्क लगाकर प्रकृति से अपनी जान की भीख मांग रहे है औऱ एक तरफ गांव की यह स्वाभाविक जिंदगी जिसमे न किसी प्रकार का भय है ना ही किसी प्रकार का अतिरिक्त तनाव…अगर है तो बस असीमित उल्लास औऱ अल्हडतायुक्त जीवन…
इतने में माँ चाय लाती हुई बोली कि भला हो इस कोरोना का जो मेरे बेटे बहु घर आ गए…भगवान करे ऐसा कोरोना आता रहे….

*कवि राहुल शर्मा,उज्जैन(म.प्र.)


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