Wednesday 21st April 2021

भीष्म नहीं,बाह्लीक हैं महाभारत के वयोवृद्ध योद्धा

भीष्म नहीं,बाह्लीक हैं महाभारत के वयोवृद्ध योद्धा

लेख*डॉ विवेक चौरसिया

महाभारत युद्ध के बारे में आम धारणा है कि इसमें दोनों पक्षों की ओर से लड़े योद्धाओं में सबसे उम्रदराज पितामह भीष्म थे मगर यह उतना ही गलत है जितना लोगों का यह अंधविश्वास मिश्रित भ्रम कि महाभारत की पोथियाँ घर में रखने या पढ़ने से भाइयों में लड़ाई हो जाती है। निश्चित ही दस दिनों तक कौरवों के सेनापति रहे भीष्म युद्ध के वयोवृद्ध योद्धा थे किंतु सच्चाई यह है कि उनसे भी अधिक आयु के एक और योद्धा कुरुक्षेत्र की रणभूमि में लड़े थे और वह भी इतना जबरदस्त कि पाण्डव सेना की नाक में दम कर दिया था। ये भीष्म के ताऊ महावीर बाह्लीक थे जो अपने पुत्र और पौत्रों के साथ प्रायः हस्तिनापुर में ही रहते थे।

यूँ समझिए कि कुरुवंशी राजा प्रतीप के शिबि देश की राजकुमारी सुनन्दा से कुल तीन पुत्र हुए थे। पहले देवापि, दूसरे बाह्लीक और सबसे छोटे शांतनु। प्रतीप के जीते जी ज्येष्ठ पुत्र देवापि ने बहुत ही कम उम्र में संन्यास ले लिया और वन में चले गए। तब हस्तिनापुर का राज्य बाह्लीक को मिला लेकिन कुछ ही दिनों में बाह्लीक अपने ननिहाल चले गए और उनकी सहमति से अनुज शांतनु को हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बैठा दिया गया। इस तरह दो बड़े भाइयों की दावेदारी अलग-अलग कारणों से ख़त्म हुई और शांतनु हस्तिनापुर के निर्विरोध शासक हो गए।

इन्हीं शांतनु की पहली पत्नी गङ्गा से देवव्रत जन्मे जो आगे चलकर भीष्म कहलाए और दूसरी पत्नी सत्यवती से विचित्रवीर्य और चित्रागंद का जन्म हुआ। चित्रांगद जवानी में ही मारे गए और विचित्रवीर्य की ही सन्तानों में राज्य के लिए महाभारत मची।

बात बाह्लीक की है जो भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि की तरह महारथी थे और महाभारत की लगभग सभी प्रमुख घटनाओं के गवाह थे। कुल के अन्य बूढ़ों की तरह वे भी हर हाल में कौरव-पांडवों के बीच बैर के ख़िलाफ़ थे। भाइयों में फूट न पड़े इसलिए उन्होंने राज्य के बंटवारे का समर्थन किया था और दुर्योधन को हस्तिनापुर जबकि युधिष्ठिर को खांडवप्रस्थ दिलवाया था। कौरव सभा में जूएँ के समय वे अपने पुत्र सोमदत्त और तीन पोतों के साथ मौजूद थे। जब भरी सभा में द्रौपदी को घसीटा गया तो बाह्लीक भी बहुत दुःखी हुए थे मगर भीष्म आदि की तरह इन्होंने भी परिवार सहित दुर्योधन का अन्न खाया था, इसलिए समर्थ होते हुए भी अनाचार का विरोध न कर सके।

बाह्लीक महाभारत युद्ध के पक्ष में नहीं थे। जब श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे तो कौरवसभा में सबके साथ बाह्लीक भी उपस्थित थे और श्रीकृष्ण के सम्मान में आसन से खड़े हुए थे। वे चाहते थे कि दुर्योधन श्रीकॄष्ण की बात मानकर हठ छोड़ दे मगर धृतराष्ट्र का कपूत शकुनि और कर्ण की शह पर कुरुकुल के इस सबसे बूढ़े व्यक्ति की भली सीख को घोलकर पी चुका था। जिसके परिणाम में अन्ततः रणभूमि सजी।

जब महायुद्ध का अशुभ मुहूर्त निकला तब कौरव सेना के प्रयाण की घड़ी दुर्योधन ने बाह्लीक को एक अक्षौहिणी सेना का नायक नियुक्त किया। ये उन ग्यारह महारथियों में शामिल थे जिन्हें कौरव पक्ष की कुल ग्यारह अक्षौहिणी सेना का नेतृत्व सौंपा गया था।

वयोवृद्ध बाह्लीक के रणकौशल का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भीष्म जहाँ दस दिन में शरशय्या पर आ गए थे, वहीं बाह्लीक 14 दिन तक लड़ते रहे। उन्होंने धृष्टकेतु, श्वेत, सात्यकि, द्रुपद, शिखंडी जैसे पाण्डव पक्ष के योद्धाओं को नाकों चने चबवाए तो भीम और घटोत्कच सरीखे दुर्जेय महावीरों तक से लोहा लेने में न हिचके।

महाभारत युद्ध के 14 वें दिन की रणभूमि बाह्लीक, उनके पुत्र सोमदत्त और तीन पौत्रों भूरि, भूरिश्रवा और शल के अदम्य पराक्रम की साक्षी बनी। इसी दिन तीन पीढ़ी के इन पाँच प्रतिनिधियों की लाशें कुरुक्षेत्र की रक्त कीच में गिरी और महात्मा प्रतीप के वंश की मंझली रेखा हमेशा-हमेशा के लिए मिट गई।

युद्ध का 14 वां दिन परस्पर खून की होली से लबरेज़ था। एक दिन पहले कौरव पक्ष के छह महारथियों ने युद्ध नियमों की धज्जियाँ बिखेरते हुए अर्जुननन्दन अभिमन्यु की निर्ममता से हत्या कर दी थी। अर्जुन ने दुर्योधन के जीजा जयद्रथ को मारने की सौगंध खाई थी, अन्यथा अग्नि समाधि ले लेने की प्रतिज्ञा कर ली थी। इससे श्रीकृष्ण सहित पूरा पाण्डव पक्ष भारी तनाव और दबाव में था। प्रायः शांत रहने वाले युधिष्ठिर के तेवर तीखे थे, भीम साक्षात यमराज बने हुए थे तो सात्यकि, सेनापति धृष्टद्युम्न और घटोत्कच सहित अन्य पाण्डव और पांचाल काल का चोला पहन समर में उतरे थे।

इस दिन कौरवों ने जयद्रथ की प्राण रक्षा में जान झोंक दी थी। अपरान्ह काल में युद्ध चरम पर पहुँच चुका था। तभी एक मोर्चे पर सात्यकि और बाह्लीक के पौत्र महारथी भूरिश्रवा में इतना भयंकर युद्ध छिड़ा कि देखने वाले हक्के-बक्के रह गए। उस समय भूरिश्रवा सात्यकि को मार डालते, यदि अर्जुन ने हस्तक्षेप कर बाण संधान से उनकी दाहिनी भुजा न काट दी होती। अर्जुन ने दो योद्धाओं के बीच नियम विरुद्ध बाण चलाया और भूरिश्रवा का हाथ पाँच मुँह वाले साँप की भाँति कटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। इससे भूरिश्रवा जितना तड़पे उससे ज़्यादा अर्जुन पर बरसे। पार्थ पर वाग्बाणों की वर्षा कर प्राण त्याग के उद्देश्य से हस्त खंडित भूरिश्रवा रणभूमि में ही आमरण अनशन पर बैठ गए। तभी गुस्से में आगबबूला सात्यकि ने शस्त्र त्याग चुके भूरिश्रवा की गर्दन तलवार मारकर उड़ा दी। लगभग इसी समय दूसरे मोर्चे पर भूरिश्रवा का छोटा भाई शल द्रौपदी पुत्रों से घिरकर मार डाला गया था। इस निंदनीय घटना के कुछ ही समय बाद श्रीकृष्ण की कृपा से गाण्डीवधारी अर्जुन ने जगप्रसिद्ध जयद्रथ-वध को अंजाम दिया था।

जयद्रथ को प्रतिज्ञाबद्ध अर्जुन द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने से पाण्डव पक्ष का मानसिक बोझ तो हल्का हो गया मगर दुर्योधन अपने सेनापति द्रोण पर इस कदर बरसा कि द्रोण ‘अब मैं समस्त पांचालों को मारे बिना कवच नहीं उतारूंगा’ कहते हुए सूर्यास्त के बाद भी संग्राम के लिए निकल पड़े।

महाभारत युद्ध में 14 वां दिन कौरव पक्ष के जयद्रथ, दुर्योधन के दस भाई और शकुनि के पाँच भाई व पाण्डव पक्ष के घटोत्कच, द्रुपद, विराट समेत अनेक योद्धाओं की लाशें गिरने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इसलिए भी कि इस दिन पूरी रात युद्ध चला। तब तक जब अगले यानी 15 वें दिन की शाम धृष्टद्युम्न ने द्रोण का सिर न काट लिया। इसी रात्रि युद्ध में बाह्लीक का पराक्रम और प्राणांत महायुद्ध में एक बूढ़े रण बाँकुरे के शौर्य की अनुपम गाथा है।

भूरिश्रवा और शल के मारे जाने से दोनों के पिता सोमदत्त और दादा बाह्लीक का गुस्सा सातवें आसमान पर था। इसी बीच सात्यकि से सोमदत्त का सामना हुआ और दोनों में प्रचंड रण छिड़ गया। एक तरफ भीम और सात्यकि थे तो दूसरी तरफ सोमदत्त और उसके पिता बाह्लीक। दोनों ओर से रात्रि के अंधकार में जारी बाण वर्षा के बीच अचानक भीम ने सोमदत्त के माथे पर नूतन, सुदृढ़ एवं भयंकर परिघ का प्रहार किया। सोमदत्त लगभग भीष्म के समवयस्क थे। बलशाली भीम के पूरी ताकत से चलाए परिघ और साथ ही सात्यकि के धनुष से ठीक उसी पल निकले अग्नि सम तेजस्वी बाण सोमदत्त की छाती पर गिरे और बूढ़े सोमदत्त गश खाकर युद्धभूमि में गिर पड़े।

अब बाह्लीक का आक्रोश देखने लायक था। अपने पुत्र के मूर्छित होने पर बाह्लीक ने बादलों के समान सात्यकि पर बाण वर्षा की जिसने सात्यकि के होश उड़ा दिए। शुक्र था कि भीम मदद के लिए पास ही थे, जिन्होंने सात्यकि को कमजोर पड़ता देख बूढ़े बाह्लीक पर एक के बाद एक नौ बाण चलाए और बाह्लीक के वृद्ध शरीर से रक्त के सोते फूट पड़े। मगर बाह्लीक कब चुप बैठने वाले थे! उन्होंने घावों की परवाह किए बगैर अत्यंत कुपित हो भीमसेन की छाती में अपनी शक्ति इसी तरह धँसाई मानो देवराज इंद्र ने किसी पर्वत पर वज्र मारा हो।

यह बाह्लीक का अंतिम वार था। शक्ति से आहत भीम काँप उठे और कुछ पलों के लिए मूर्छित हो गए, मगर शीघ्र ही सचेत हुए और आक्रोशित होकर अपनी गदा से बाह्लीक पर इतना भरपूर प्रहार किया कि वज्र के मारे हुए पर्वतराज की भाँति महायुद्ध के इस सर्वाधिक वरिष्ठ योद्धा का सिर उड़ गया।

बाह्लीक की मौत का बदला लेने आए दुर्योधन के दस भाइयों और शकुनि के पाँच भाइयों को भी चंद मिनटों में भीम ने गदा मार-मारकर मौत की नींद सुला दिया। इसी रात सात्यकि ने पहले सोमदत्त को यमलोक का यात्री बनाया और फिर कुल के अंतिम चिराग सोमदत्त के सबसे बड़े भूरि की भी जान ले ली। मानो कोई दस घण्टे के भीतर बाह्लीक, उनका बेटा और तीनों पोते गृह कलह की आग में राख हो गए। यह भी पढ़ें- शांति और पुण्य का ही दूसरा नाम अपरिग्रह है

यह कथा महाकाव्य के द्रोण पर्व की है। द्रोण वध पर्व के 192 वें अध्याय के 64 वें श्लोक में ‘वयसाशीतिपञ्चक’ कहकर महर्षि वेदव्यास ने आचार्य की आयु चार सौ वर्ष से अधिक बताई है। स्वभावतः भीष्म आचार्य से 50 से 100 साल बड़े और भीष्म के मुकाबले उनके ताऊ बाह्लीक इतने ही वर्ष बड़े रहे होंगे। अनुमान लगाया जा सकता है कि बाह्लीक की आयु हर हाल में 500 बरस पार तो थी ही। निश्चित ही संयम, सादगी, साधना से बाह्लीक ने इतनी दीर्घायु पाई मगर अधर्म का साथ देकर पुत्र-पौत्रों सहित हिंसक मृत्यु पाई। यह भी पढ़ें- शब्द प्रवाह डॉट पेज

महाभारत में अनेक स्थानों पर लिखा है कि दुर्योधन भीष्म, द्रोण, कृप, विदुर और धृतराष्ट्र के साथ पूरी ढिठाई से बाह्लीक और सोमदत्त की भी उपेक्षा करता था। वह ताल ठोककर कहता था कि मैंने पांडवों से दुश्मनी बाह्लीक और भीष्म के दम पर नहीं बल्कि स्वयं और कर्ण के बूते पाली है लेकिन उस मूर्ख ने मौका पड़ने पर घर के इन्हीं बूढ़ों को एक-एक अक्षौहिणी सेना की कमान देकर रणभूमि में मरने के लिए छोड़ दिया।

साधो, सार यह है कि औलाद नालायक निकल जाए तो बुजुर्गों का बुढ़ापा बिगाड़ देती है। तब बुजुर्गों को चाहिए कि समय रहते ही बेकाबू बैल की तरह बेकाबू औलाद को भी बलपूर्वक काबू करने में कतई संकोच न करें। अन्यथा उनकी दशा बाह्लीक जैसी ही होती है। महर्षि वेदव्यास हमें यह समझाना चाहते थे इसीलिए उन्होंने बाह्लीक की कथा को सविस्तार लिखा है, वरना क्यों लिखते!

*डॉ विवेक चौरसिया
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पौराणिक साहित्य के अध्येता है)

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES
TAGS

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )