Wednesday 4th August 2021

चरणामृत भारतीय विश्वास का सजीव तत्व

चरणामृत भारतीय विश्वास का सजीव तत्व

लेख*अखिलेशसिंह श्रीवास्तव'दादूभाई'

चरणामृत! सभी तो जानते है। इस पर लिखने की क्या आवश्यकता ! इस प्रश्न का उत्तर इन पंक्तियों मे है, ‘वेद पुराण बसिष्ठ बखानहिं। सुनही रामु जदपि सब जानहिं।’ यही भाव आप सभी के लिए हैं। रामधारी सिंह दिनकर की बात से विषय प्रवेश करते हैं- ‘परंपराओं को अंधी लाठी-से मत पीटो इसमे बहुत कुछ है जो जीवित है।’ आस्था और विश्वास के प्रतीक यह परंपराएँ सदियों पुरानी हैं इन्हें अलग नहीं किया जा सकता।



चरणामृत-से पूर्व चरण स्पर्श की विशिष्ट भूमिका देखते हैं। हमारी सनातनी परंपरा मे कई विधियों से चरण स्पर्श किया जाता है। जैसे- सिर टिका के पैर पड़ना, साष्टांग प्रणाम, घुटने के बल बैठ के चरण छूना, खड़े-खड़े दोनों हाथ जोड़ना, कमर-से झुककर हाथों से पैर छूना, आदिवासियों मे दोनो हाथ पीछे कर, घुटने के बल चरणो पर शीश नवाया जाता है। पद्धति सबकी अलग-अलग पर भाव एक समान। चरणस्पर्श के साथ जब सामने वाला सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देता है तब सापेक्ष तरंगों का चक्र पूर्ण होकर सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है। इसी चरण स्पर्श के समीप ईश्वरी हृदय का अमिय-प्रेम भक्तों की भावनाओं को श्रद्धानंद के सागर मे डुबो देता है। यह अद्भुत पदार्थ है, चरणो का अमृत अर्थात चरणामृत। श्री पद-से बहा जल भक्तों के लिए अमृत तुल्य है।

कथा है, वामन अवतार मे श्री विष्णु, राजा बलि-से तीन पग भूमि दान मे माँगते हैं। प्रथम पग मे पाताल, द्वितीय पग मे धरती अधिग्रहित करते हुए जब तृतीय पग ब्रह्मांड मे ले जाते हैं तो ब्रह्मलोक मे ब्रह्मा जी उनके चरणो को धोते हैं और उस जल को अपने कमंडल मे सुरक्षित रख लेते हैं। यही सृष्टि का प्रथम चरणामृत था। जिसने भी श्री विष्णु के चरण-जल को माथ लगाया वह मुक्ति मार्ग को पा गया। पुनर्जन्म के बंधनो से मुक्त होकर श्री हरि के अनंत रूप मे समा गया। इसीलिए चरणामृत देते समय यह मंत्र पढ़ा जाता है- ‘अकाल मृत्यु हरणम, सर्वव्याधि विनाशनम, विष्णो पादोदकं, पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।’ इस पवित्र जल की महिमा ऐसी है कि अधम-निशाचर के हाथ मे दिया जाए तो घड़ी भर के लिए सही वह अपने कुकर्म भूल कर सात्विक भावना-से प्रभु स्मरण करता है मानो लौकिक सुख-से विरक्त, भवमन्यु। यह क्षणिक समाज सापेक्ष परिवर्तन इस लिए होता है क्यों कि हर व्यक्ति कहीं न कहीं धार्मिक भावनाओं से जुड़ा होता है।



सरल भाषा मे चरणामृत अर्थात पूजित या पवित्र जल। जल महात्म मात्र सनातन परंपरा मे ही नही अपितु विश्व के सभी पंथों मे है; जैसे- वैश्विक आदिवासी समुदाय मे जल का बड़ा महत्व है, ईसाइयों मे चर्च का जल पवित्र मान कर सभी पर छिड़का जाता है वहीं मुस्लिम पंथावलंबी आबे ज़म-ज़म को बहुत पवित्र मानते हैं। स्वयंसिद्ध है जल विहीन जीवन कदापि संभव नहीं। इसीलिए भारत मे पाँच तत्वों को प्राणाधार माना गया है; अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश। सभ्यता के प्रथम ग्रंथ वेदों मे जल को आपो देवता रूप में स्वीकार किया है। जल, जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है जितनी प्राण-वायु। चलिए किसी मंदिर मे चलें और विवेक दृष्टि-से चरणामृत के रहस्य को समझने का प्रयत्न करें। विशाल भव्य परकोटों से निर्मित बहुतल वाला देवालय हो अथवा किसी ग्राम की छोटी मढ़िया प्रभु मूरत को स्नान कराने के बाद वह जल एक ताम्र-पात्र मे एकत्रित कर उसमे तुलसी के पत्ते तिल के साथ डाल कर ढाँक के रख दिया जाता है। सभी भक्त जनो को यह जल प्रसाद के साथ दिया जाता है। चरणामृत को दाहिने हाथ-से लेने का विधान है। कहते हैं, चरणामृत लेने के बाद हाथों को तुरंत सिर पर नहीं लगाना चाहिए इससे नकारात्मकता बढ़ सकती है। प्रतीत होता है ताम्र जल को केश स्पर्श-से दूर रखना चाहिए।



यहाँ अत्यंत गंभीरता के साथ विचार करना होगा कि प्राचीन विद्वजनों ने कितनी स्वास्थ वर्धक व्यवस्था बनाई। इस जल मे ताँबे और तुलसी के औषधीय गुण मिल जाते हैं जो बहुत लाभकारी हैं। आज का आधुनिक विज्ञान भी इसके महत्व को स्वीकारता है। एक बात और, प्राचीन काल मे जलपान और विश्राम स्थल मिलना आज के युग जैसा सहज न था अतः मंदिर आने वाले हर व्यक्ति को पीने के लिए जल और खाने के लिए प्रसाद मिलता, साथ ही मंदिर विश्राम स्थली भी थे। आज भी यह सिद्धांत प्रासंगिक है बस नितांत अनिवार्य है जल एकत्रीकरण और पूजा की शुद्धता-स्वच्छता। वर्तमान के वैश्विक महामारी काल मे तो इस पर विशेष ध्यान रखना है।



पुरातन काल मे वैज्ञानिक रूप-से सिद्ध बातों के सार्वजनिक अनुपालन के लिए उन्हें धर्म-से जोड़ कर लोकजीवन मे समाहित किया जाता, जिससे बिना कुतर्क किए लोग इसे अपनाएँ और तार्किक रूप-से सिद्ध लाभ पाएँ। ऐसा मेरा मानना है। चरणामृत भी संभवतः उसी मे से एक है क्योंकि वह काल साभ्यतिक विकास का प्रारंभिक चरण था। धारणाएँ व नियम लोकजीवन मे मान्य होने के बाद परंपरा रूप लेती है और काल-के रथ मे आरूढ़ हो हमारे जीवन का अंग बन जाती है। कुछ उदाहरण और; जैसे- गर्म भोजन मे तुलसी डाल कर भोग लगाना, पादुकाओं को गृह-द्वार पर उतारना, स्नान करते समय पहले पानी पैरों मे डालना फिर मध्य देह मे और अंत मे सिर-से पानी डालना, बहुत गर्म अथवा ठंडा भोजन न करना, भोजन और जल ग्रहण बैठ कर ही करना, भोजनोपरांत बाँई करवट पर लेटना,भोजन पूर्व जल आचमन कर थाली के चारों ओर छोड़ना इत्यादि।



चरणामृत मे आस्था की ऐसी शक्ति है कि इसे अंजलि मे रखते ही हमारे नेत्र श्रद्धा-से बंद हो जाते हैं और मन सत-विचारों से भर उठता है। एक विचार साझा करता हूँ, यदि मनुष्य मनसा-वाचा-कर्मणा पथ-भ्रष्ट हो जाए एवं इस अपवित्रता-से जिस भी माध्यम से उसका उद्धार हो तो क्या वह उसके लिए चरणामृत तुल्य न होगा…? या कुछ यों परिभाषित करें- “वैचारिक और भावों की शुद्धता को सजीवता प्रदान करने वाला तत्व चरणामृत है। आवश्यक नहीं की वह जल ही हो। यह तो चित्त की भावनात्मक अवस्था है; हमे अनुभास करना होगा।” भावों के अनुभास की जब-जब बात चलेगी वह केवट स्मरण आएगा जिसने अपनी काष्ठ-तरणी की सुरक्षा के नाम पर श्री प्रभु के पाँव पखारे। उस वृद्धा को कैसे बिसरा सकते हैं जिसने प्रभु-प्रेम का आचमन झूठे बेर खिला कर किया था ! ऐसे अनेक उद्धरण, संदर्भ हेतु हमारी दृष्टि-वृद्धि के सहायतार्थ उपलब्ध हैं। आवश्यकता है तो बस तृणमूल के कारण को पहचानाने की। अच्छा बताइए, वर्तमान मे शिक्षा को चरणामृत बनाने की आवश्यकता नहीं है…! उसके प्रति पवित्र भावना अपना कर। प्रत्येक शब्द मे जहाँ शब्दार्थ और भावार्थ छिपे होते हैं वहीं दार्शनिक अर्थ भी रहते हैं। संभवतः हमारी आस्था का जल चरणामृत भी ऐसे अनेक अर्थों का उत्स है।



चरणामृत! भारतीय विश्वास का सजीव तत्व; हृदयों को आत्मिक आनंद प्रदान करने वाला; प्रभु चरणों का जल, जिसको माथ-कंठ लगाने से आधि-व्याधि दूर होती हैं, जिसे बिना भेद-भाव के बाँटा जाता है। इस जल-से सीखें कि कैसे स्वयं को इतना सात्विक करें कि काम आ सकें किसी के। रोकें उन स्वार्थियों को जो चरणामृत जैसे वाक्य को अपनी अवसरवादी चाटुकारिता के लिए उपयोग मे लाते हैं। समाज मे ऐसे अनेक नर-सौरभ मिल सकते हैं जो चरणामृत के अस्तित्व को अमान्य कर दें क्यों कि वे तो आधुनिक विज्ञानवादी विद्वान जो ठहरे। सुविधाओं के मार्ग पर दौड़ती सभ्यता के चाकचिक्य मे हमारे पारंपरिक संदर्भो का उपहास न उड़े यह देखना ‘सनातनी पहरुए’ अर्थात हमारा सामूहिक दायित्व है। इसके लिए अतिवादी सिद्धांतवाद के भव्य हर्म्य-से निकल कर अनिवार्य-कटु परिवर्तन स्वीकारना होगा। स्मरण रखना होगा, जन आस्था मे गूँथे शब्दों का दुरुपयोग कदापी क्षंतव्य नहीं।



हमारी धार्मिक (यहाँ धर्म-से आशय पंथ-से नहीं है।) मान्यताएँ हमारी धरोहर हैं, जिनका सम्मान रक्षण हमे अपने कृतित्व-से करना होगा। ‘ईशा वास्य मिदं सर्वं’ अर्थात ईश का वास सर्वस्व है। रत्नगर्भा की सकल जल राशि प्रभु चरण कंवल को समर्पित है। इस मान-से यह समस्त जल चरणामृत ही हुआ जो पवित्र और अमूल्य है। इसका अपमान सृष्टि का अर्थात प्रभु का अपमान है। जल ही जीवन है। वह गीत स्मरण है न आपको! ‘जल नहीं होता तो जग जाता जल…ओ बंधु रे…!’ लेखनी विराम-से पूर्व यही कहूँगा मंदिर के चरणामृत के साथ प्रकृति प्रदत्त चरणामृत- आपः, वाः, कीलालं, तोयं, उदकं, मेघपुष्पं, धनरसः अर्थात जल का भी समभाव आदर करें क्यों कि हर जल कण श्री प्रभु का चरण-अमृत है। पवित्र चरणामृत।

*अखिलेशसिंह श्रीवास्तव’दादूभाई’,सिवनी



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