Sunday 18th April 2021

डोंगर देव बाबा के द्वारे…

डोंगर देव बाबा के द्वारे…

फ़ीचर लेख*अखिलेश सिंह श्रीवास्तव

भारत विश्व में एक ऐसा देश है जहाँ देव स्थापना नगर मध्य निर्मित विशाल भव्य मंदिर से ले कर ऊँचे शैल शिखरों पर, पातल छूती कंदिराओं में और गहन वन काननों में मिल जाती है। ऐसे ही एक वन देव का पता मुझे तब चला जब सिवनी आज़ाद वार्ड के पार्षद, मेरे अनुज, अभिषेक दुबे सपरिवार वहाँ गए और कुछ तस्वीरें साझा करीं। मध्यप्रदेश के छिंदवाडा जिले की चौरई तहसील के वन ग्राम सांग के घनें वन में साँय-साँय करती वायु ध्वनि के बीच चट्टानों से निर्मित सुरम्य नैसर्गिक पहाड़ी-मंदिर पर एक वन देव विराजे हैं जिन्हें डोंगर देव बाबा के नाम से जाना जाता है। वैसे मूल रूप-से डोंगर देव बाबा आदिवासी समुदाय के आरध्य हैं जिन्हें लोग स्वतंत्र देव मानते हैं, पर कुछ श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह शिव ही हैं। मान्यता जो भी हों पर यह अकाट्य सत्य है कि श्रद्धा के भाव सभी के एक रूप हैं। मैं साक्षी हूँ, डोंगर देव बाबा के प्रति आदिवासी भाइयों के आलावा अन्य समुदाय के लोग भी श्रद्धा के साथ आस लिए झोली फैलाते हैं और देव द्वारा सभी कष्टों का परित्राण किया जाता है। आस्था की यह शक्ति ही भक्ति का प्रथम द्वार है।



डोंगर देव का अर्थ और संबोधन :
डोंगर नाम के प्रति पाठकों को जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि इन्हें डोंगर देव क्यों कहा जाता है? जैसा हम जानते हैं कि यह मूल रूप-से अदिवासी जनजाति के देव हैं अतः इनके संबोधन भी उसी प्रकार सीधे-सरल होते हैं। शाब्दिक अर्थ को समझें तो पाएँगे डोंगर शब्द से तात्पर्य छोटी पहाडी; टीला या चट्टानों से निर्मीत छोटा पहाड़ इत्यादी है। डोंगर शब्द का उपयोग छत्तीसगढ़ में भी बहुधा दिखाई देता है। राजधानी रायपुर के समीप के जिला दुर्ग के अंचल में देवी जी का एक तीर्थ है जो मध्यप्रदेश के मैहर की देवी अथवा उत्तरप्रदेश की विंध्यवासिनी देवी जैसे ही लोक आस्था का केंद्र है। चूँकी यह स्थान एक मध्य ऊँचाई वाले पहाड़ पर है इसीलिए संभवतः इसे डोंगर गढ़ नाम मिला और यहाँ विराजीं माँ भवानीं डोंगर गढ़ की देवी के नाम से जग प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र के सीमांत प्रदेशों में डोंगर देव वन आश्रित क्षेत्रों में विराजे मिल जाएंगे। अप्रैल दो हज़ार उन्नीस में मैं सपरिवार माँ नर्मदा की परिक्रमा में निकला था इस दौरान मध्यप्रदेश और गुजरात के समीप मुझे पेड़ के नीचे कुछ आदिवासी पूजा के साक्ष्य मिले, जब आस-पास लोगों से जानकारी ली तो पता चला यह डोंगर देव बाबा द्वारा पूरी की गई मन्नतों के चढ़ावन हैं। इसी प्रकार सांग के सुनसान जंगल में पेंच नदी के तट पर एक डोंगर पर विराजे देव, डोंगर देव बाबा के नाम से जाने जाते हैं।



ऐसे पहुँचें डोंगर देव :
छिंदवाड़ा-से अथवा सिवनी-से आनें पर चौरई-सिवनी मार्ग में माँ कपुरदा के प्रवेश मार्ग के ठीक सामनें से डामर रोड सीधा छापरा, खैरी टोला, खेररांजी, सांग तथा इसके बाद वनमार्ग द्वारा डोंगर देव पहुँचा जाता है। प्रमुख राज्य मार्ग-से यहाँ की दूरी लगभग बारह किलोमीटर की है। पूरा मार्ग खेत-खलियानों और लिपे-पुते ग्रामों के बीच से होता हुआ जाता है; मार्ग मध्य जहाँ गाँवों में सुंदर पुष्पों से लदे पेड़ दिखते हैं वहीं सुनसान स्थानों में जंगली फूलों के समूह भी प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करते दिख जाते हैं। सोचिए! यही जंगली फूल यदि अकेले हों तो कौन उन्हें देखेगा, पर जो ये झुण्ड में खिल गए तो बगिया-सी सुंदरता पा लिये। हमारा जीवन भी तो ऐसा ही है, सुसंगठित हो के रहें तो शक्ति और सौंदर्य बोध अन्यथा परित्यक्त-सा एकाकी, अर्थहीन जीवन। बीच-बीच में एक दो स्थानों पर मोड़ और सह मार्ग होनें के कारण मार्ग भ्रम संभव है अतः अंदाज़ के स्थान पर सथानीय लोगों से पूछ कर बढ़ाना ठीक होगा। हम कह सकते हैं मानों यहाँ भारत के सुरीले ग्राम्य जीवन का सुंदर चित्र प्रस्तुतीकरण हो ।



कुछ ध्यान रखनें योग्य बातें :
आप जब भी यहाँ आएँ (मेला अवसर छोड़ कर) तब भोज्य पदार्थ, पेय जल,ऑडोमॉस अथवा अन्य इनसैक्ट रिपलेंट साथ लाएँ शायद आपको इसकी आवश्यकता पड़े और यह वस्तुएँ यहाँ न मिल पाएँ। साथ में एक अच्छा कैमरा साथ रखें जिससे यहाँ की सुंदर स्मृतियों को आप अपनें पास चित्र रूप में सुरक्षित रख सकें।



लोग कहते है :
डोंगर देव बाबा मंदिर के पुजारी भैयालाल उइके-से जब बाबा की स्थापना संबंधी प्रश्न पूछे तो उन्होनें बताया कि उनके पूर्वज भी इस मंदिर की स्थापना के विषय में नहीं जानते थे। हाँ कालांतर में लोगों नें अपनी-अपनी श्रद्धा अनुरूप यहाँ शिव मंदिर, शारदा मंदिर, श्री हनुमान मंदिर के साथ भोमका बाबा मंदिर इत्यादि निर्मित करवाए हैं। प्रवेश पर इंसानों की प्रतिमाएँ भी भोमका बाबा के साथ पेड़ के नीचे चबूतरे पर मढ़ी दिखीं जिनके विषय में उत्तर अप्राप्त ही रहे, पुजारी जी ने बताया अंग्रेज़ी काल में पदस्थ एक नाकेदार द्वारा संतान प्राप्ति की मन्नत पूर्ण होनें पर उसनें यहाँ एक दिवसीय मेले का आयोजन किया बाद में यह पाँच दिवसीय लगनें लगा और लोकप्रियता के बढ़ते, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से जैसा देश के अन्य डोंगर देव मंदिरों में आयोजित होता है, इस मेले की अवधि पंद्रह दिवसीय कर दी गई। कार्तिक पूर्णिमा के पाँच दिवस उपरांत यहाँ मेले का भव्य आयोजन होता है। सांग निवासी इकहत्तर वर्षीय दयाराम के झुर्रीदार, अनुभव की आँच में तपे मुख में एक अजीब सी चमक दिखी जब उन्होंने बताया कि उनके पिताजी भी कहते थे कि यह मंदिर कब बना किसी को पता नहीं! इन्होनें बताया यह तो अंग्रज़ों के समय से है। मनहोरी मालवीय और उनकी पत्नी भगवती मालवीय नें भावुक भावों से बताया कि डोंगर देव बाबा सब की मन्नतें पूरी करते हैं इसी लिए दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं। वहीं गाँव के बाल ग्वाल-ग्वालिनों का प्रतिनिधित्व करते, संजू मालवीय और अंशुल श्रीवाती नें चहकते हुए बताया कि मेले के समय पंद्रह दिनों तक ख़ूब रौनक रहती है। स्वादिष्ट पकवान, खेल-खिलौनें, झूले, क़रतब, मनहारी के सुंदर-सुंदर सामान, कपड़ों की दुकानें और भी बहुत कुछ, पूरा शहर बस जाता है हमारे गाँव में। इतनीं आनंदित मुख भंगिमाओं के मध्य ऐसा लगा कुछ कमीं क्यों है…? इतना पुराना मेला होनें से यहाँ प्रतिवर्ष हज़ारों श्रद्धालु आते हैं ऐसे में कुछ प्रश्न सहज ही उठते हैं कि यह स्थान इतना निर्जन, अव्यवस्थित क्यों..? क्यों यहाँ पक्का मार्ग नहीं है…? क्यों यह मूलभूत आवश्यकताओं से भी दूर है…? यह वह प्रश्न हैं जो सवालिया निशान नहीं उठाते बल्कि आस्था की इस पवित्र भूमि के प्रति आशा के ध्वस्त होते मंज़र बयाँ करते हैं! मन्नतें पूरी करनें वाले इस मंदिर में जिसके जैसे कष्ट वैसी उसकी मुरादें…पर जन आस्था की अखंड शिला सभी के मन में समभाव रहती है।



दर्शनीय स्थल :
यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक उपादानों से समृद्ध है। मंदिर कंदिरा-से लगी हूई दो विशाल चट्टानें हैं जिनके नीचे से और सटकर खड़े-खड़े निकलने का महत्व है । ऐसी मान्यताएँ कई स्थानों पर मिल जाती हैं; जैसे- अमरकंटक में नर्मदा उदगम मंदिर में स्थित वराह के नीचे से निकला जाता है, शिव मंदिर में विराजे नंदी के कानों में अपनें मन की बात कही जाती है इसी प्रकार पुरी में पवित्र छड़ी-से सात बार सर पर हल्के से मारा जाता है यह सब शुभ होनें के संकेत हैं। मान्यताओं को मानव जीवन से कभी भी अलग नहीं किया जा सकता। पूरे विश्व में विभिन्न प्रकार की मान्यताएँ मानवीय आस्था की आस्था हैं। ये मान्यताएँ आस्था स्तंभ को अडिग रखनें में सहायक की भूमिका निर्वहन करतीं हैं। डोंगर देव कंदिरा-से थोडा आगे बढनें पर पेंच नदी का विशाल सुंदर तट हमारा स्वागत करता है। यह स्थान पर्यटन और तीर्थाटन का संगम है। दूर-दूर तक विस्तृत भूरी जल चट्टानें और उनके बीच से बहता निर्मल, स्वच्छ जल जो कहीं-कहीं, छोटे-छोटे प्रपात रूप में है जहाँ लोग जलक्रीड़ा का आनंद लेते हैं। इनकी कल-कल ध्वनि सितार के स्वर-से कम नहीं ! चारों ओर फैले विशाल वृक्ष जिनकी जड़ें स्वयं में ना-नाविध रूप धरे हैं, कई वृक्षों की खोह तो इतनी बड़ी हैं कि हम उसमें बैठ जाएँ! इन सब सौंदर्य-आनंद को सहसा विराम तब लगता है जब हमारी दृष्टि वन विभाग द्वारा लिखी सूचना पर पड़ती है, जिसमें स्पष्ट लिखा है नदी में सतर्कता के साथ जाएँ क्यों कि पूर्व के वर्षों में यहाँ कई हृदय विदारक हादसे हो चुके हैं। अतः निर्देशित मर्यादाओं का अनुपालन नितांत अवश्यक है।



दोस्तो! डोंगर देव बाबा के इस अद्भुत संसार को शब्द चित्र देना कठिन है, यहाँ की सुरम्यता, पवित्रता का भान तभी संभव है जब वहाँ जाया जाए। मन्नतों की मिन्नतों से आम और ख़ास कोई भी अछूता नहीं है । हर इंसान कहीं न कहीं दामन फ़ैलाए प्रार्थना करता है, डोंगर देव की इस ड्योढ़ी में जिन्हें आशीर्वाद मिल चुका है वह तो यह तक मानते हैं कि यहाँ बिना सोचे ही माँगें पूरी हो जाती हैं और ऐसा लगता है कि बाबा सामनें हमें साक्षात देख रहे हैं। पूर्ण मन्नतों के चढ़ावन बाबा के सामनें काष्ट अथवा लोह निर्मित बैल, घोड़े और झूले के रूप में देखे जा सकते हैं। भावनाओं को परिभाषित कैसे करें…! लोग कहते हैं यहाँ शक्ति है जो अपनी और खींचती है और हमारे कष्टों का निवारण कर हमें अच्छे काम करनें के लिए प्रेरित करती है। तो आप भी अवश्य पधारिए सघन वन मध्य विराजे वनवासीयों के, आदिवासियों के और अखिल जग के लोक-देव, डोंगर देव बाबा के द्वारे…!


*अखिलेश सिंह श्रीवास्तव(कथेतर लेखक)
सिवनी , मध्यप्रदेश



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