Wednesday 21st April 2021

एक पठनीय एवं संग्रहणीय कृति :

दोहे पानीदार

समीक्षा

dohe-panidar

पुस्तक : दोहे पानीदार (दोहा-संग्रह) दोहाकार : डॉ. ब्रह्मजीत गौतम प्रकाशक : नैस्ट बुक बडीज़ पब्लिकेशन, नई दिल्ली मूल्य : 200 रु

डॉ. ब्रह्मजीत गौतम हिंदी काव्य-जगत के जाने-पहचाने हस्ताक्षर हैं। मुक्तक, गज़ल, दोहा आदि विधाओं में उन्होंने साधिकार सफल काव्य रचा है, जिसका हिंदी पाठकों और समीक्षकों ने हृदय से स्वागत किया है। समीक्षक के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनायी है। एक बहर पर एक गज़ल नामक गज़ल-संग्रह से उन्होंने काफी प्रतिष्ठा अर्जित की है। हाल ही में उनका दोहा-संग्रह आया है जिसका शीर्षक है- दोहे पानीदार । इसमें विविध विषयों पर कवि के 520 दोहे संगृहीत हैं। विशेष बात यह है कि ये दोहे वर्णक्रमानुसार (संख्या सहित) व्यवस्थित हैं, अर्थात अ से ह तक। यह अभिनव है। ऐसा विधान उर्दू के दीवान में देखने को मिलता है।

एक सजग रचनाकार होने के नाते, दोहाकार ने पुस्तक की भूमिका में दोहे के शिल्प के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। कथ्य में दुहराव, अस्पष्टता, पूर्वापर सम्बंध आदि पर सोदहरण चर्चा है, तो शिल्प की दृष्टि से भी मात्रा-गणना, यति-दोष, ग्यारहवीं मात्रा लघु न होने से लय में बाधा, तुकांत-दोष आदि पर नये रचनाकारों तथा असावधान पुराने दोहाकारों के लिए सोदाहरण उपयोगी जानकारी है। इन्हीं बातों पर केंद्रित उनके कुछ दोहे भी संग्रह में हैं। दो दोहे देखिए—

अगर व्याकरण पंगु है, और शिथिल है छंद ।
तो फिर पाठक सृजन का, लेंगे क्या आनन्द ।।
भाषा, भाव समृद्ध हों, हो सुंदर अभिव्यक्ति ।
कविता रस-निष्पत्ति की, तब पाती है शक्ति ।।
संग्रह में विसंगतिपरक साम्प्रतिक यथार्थ, उद्बोधन, विश्वबंधुत्व, कर्मयोग का महत्त्व, पाखंड पर प्रहार, पर्यावरण-रक्षा आदि विविध विषयों पर एक से बढ़कर एक दोहे हैं। राजनीतिक दाँव-पेंच, अपराधियों को संरक्षण, पूँजीपतियों का स्वार्थ, मानवीय मूल्यों में गिरावट आदि अनेकश: विसंगतियों और विद्रूपताओं के कुछ दोहे देखिए—
कुर्सी पाने के लिए, क्या-क्या होते खेल ।
कोई आता जेल से, कोई जाता जेल ।।
बहस नहीं, बस शोरगुल, या शब्दों के तीर ।
यह है अपने देश की, संसद की तस्वीर ।।
सारी नदियाँ पी गया, फिर भी बुझी न प्यास ।
रे समुद्र ! तू आज का, पूँजीपति है ख़ास।।



दोहाकार के सृजन का उद्देश्य केवल विसंगतियों के चित्रण तक सीमित नहीं है, वह संसार को सुंदर देखने की साध रखता है, जो उसकी सत्य, प्रेम, करुणा, समभाव, विश्वबंधुत्व, आत्म-दर्शन, श्रम की महिमा, जैसी उद्बोधक अभिव्यक्तियों में दृष्टव्य है—
घूमे मंदिर, तीर्थ बहु, मिला नहीं भगवान ।
मन में झाँका तब दिखा, वह जग का सुलतान।।
दु:ख-दर्द जो भी मिले, कर हँसकर स्वीकार ।
चिंता मत कर अंत की, बस कर्त्तव्य विचार।।
श्रम है जिसका देवता, है श्रम ही आराध्य ।
जीवन में उसके लिए, कुछ भी नहीं असाध्य।।
संग्रह में विविध रसों का समावेश है-वह चाहे शृंगार हो, हास्य हो अथवा वीभत्स। व्यंग्यपरक दोहों की तो भरमार है, जिससे पठनीयता समृद्ध हुई है। विभिन्न रसों में पगे अलग-अलग विषयों पर कुछ दोहों का आनंद लें-
प्रियवर ! देखा है तुम्हें, अनुदिन बार हज़ार ।
फिर भी लगता रूप यह, नया-नया हर बार।।
कोई चारा खा रहा, कोई खाता खाद ।
नेताओं के स्वाद की, देनी होगी दाद।।
हरे नोट की ओट में, क्या-ड्ढद्भक्या होती चोट ।
मुर्दा भी चलकर स्वयं, डाल गया निज वोट।।
पीते हैं घी-दूध नित, पत्थर के भगवान ।
शिल्पकार उसके मगर, तजें भूख से प्रान।।



दोहों की भाषा अधिकांशत: तत्सम है लेकिन उसमें उर्दू के बोलचाल के शब्द (आज़ाद, इक, उसूल, ख़ुदग़रज़ी, ख़ुश, ख़ुशामद, ग़रीब, जिहादी, तक़दीर, तदबीर, बेजान, मंज़िल, मंसूबे, मज़हब, लफ़्फ़ाजी, सुलतान आदि‌) इस प्रकार आये हैं कि उनसे लय में वृद्धि हुई है। मुहावरों का प्रयोग भी कहीं-कहीं देखने को मिलता है। दोहाकार ने अग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों से भी परहेज़ नहीं किया है जिससे दोहों में अपेक्षित व्यंजना के साथ सामयिकता का सम्यक समावेश हो सका है, विशेषत: व्यंग्यपरक दोहों में, यथा-
रखिये अंडरवर्ल्ड से, हर पल मेल-मिलाप ।
ये ही तो सरकार के होते, माई-बाप।।
हमको हिंदी मीडियम, उनको है कॉन्वेंट ।
जनता अब अभ्यस्त है, खाने को यह डेंट।।
यद्यपि दोहाकार ने दोहे के पहले और तीसरे चरण की ग्यारहवीं मात्रा लघु होने की बात सशक्त ढंग से की है, तथापि उसने अनेक दोहों में इस नियम का पालन नहीं किया है, परिणामत: लय में बाधा उत्पन्न हो गयी है, जैसे-
अपने दुख में तड़पता, हर कोई इंसान ।
जो तड़पे पर दु:ख में, मानव वही महान।।
छिद्रान्वेषण में हुई, आज अनोखी क्रांति ।
पर-निंदा में मनुज क्यों, पाता मन की शांति।।
डरी-डरी है हर कली, सहमे-सहमे फूल ।
उग आये हैं चमन में, कैक्टस और बबूल।।
कुछ दोहों के चरणों में लयभंग है, जैसे–
कठिन नहीं आसान है, सदाचार की राह।
इस पर चले बिना नहीं, मिटता अंतर्दाह।।
कविता कालजयी वही, देश-काल कर पार।
जो नित प्रासंगिक रहे, दे जीवन को धार।।
कारागार कहें इसे, या फिर कहें मखौल।
क़ैदी को जब प्राप्त हैं, मोबाइल, पिस्तौल।।



इन्हें थोड़े हेर-फेर के साथ आसानी से ठीक किया जा सकता था। कुछ दोहों के कथ्य में अस्पष्टता भी द्रष्टव्य है, जैसे-
तेल-पगी बाती लिए, दीप जले दिन-रात।
दृढ़-संकल्पी को भला, क्या आँधी, बरसात।।
नदी, ताल, पोखर, कुएं, हुए ग्रीष्म में रेत।
हृष्ट-पुष्ट जन को लगे, ज्यों मसान के प्रेत।।
हुईं तुषारापात से, फसलें सभी तबाह।
आजादी के बाद ज्यों, राम-राज्य की चाह।।
निम्नलिखित दोहे के पहले चरण में, बाँचने के स्थान पर देखने का भाव आना चाहिए था—
अंधा बाँचे फ़ारसी, गूँगा भाषण-वीर ।
पंगु कबड्डी खेलता, कुर्सी की तासीर।।
उपर्युक्त छोटी-मोटी कमियों के बावज़ूद संग्रह की उपादेयता कम नहीं हो जाती। संग्रह न केवल पठनीय, मननीय और संग्रहणीय है, बल्कि इसके दोहे, वर्तमान दोहा-साहित्य को समृद्ध करने वाले हैं।

समीक्षक
डॉ.राजेन्द्र वर्मा,लखनऊ



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