Wednesday 21st April 2021

डॉ. शिव शर्मा का व्यंग्य ‘एक प्रजातंत्रीय ट्रेजेडी’

डॉ. शिव शर्मा का व्यंग्य ‘एक प्रजातंत्रीय ट्रेजेडी’

व्यंग्य*डॉ. शिव शर्मा

पिछले स्वतंत्रता-दिवस से ही, इस प्रजातंत्र को लेकर उनके मन में गहन आत्मावलोकन चल रहा है। पिछले तीन-चार वर्षो से वे झंडावंदन करते आ रहे थे कि अचानक उनकी पार्टी चुनाव हार गई और वे मंत्री नहीं बन सके। पंद्रह अगस्त पर वे झंडा नहीं फहरा सके और इस बार गली के छोकरों ने उनके घर के सामने हाय-हाय के नारे लगाए। वे अपने घर में छिपे बैठे रहे। यदि इसी प्रकार लोग सरकारें बदलने लगे तो देश रसातल में चला जाएगा। घटिया और पिछड़े लोग सरकार में बैठेंगे और देश का नैतिक और आध्यात्मिक स्तर गिर जाएगा। पूर्व मंत्रियों की इसी प्रकार खिल्ली उड़ती रही तो कौन मंत्री बनना पसंद करेगा ?



चूँकि वे शुद्ध दूध के विक्रेता रहे हैं, अतः उनका शरीर तो इतना सक्षम और बलिष्ठ हो गया है कि सीधे-सीधे कोई भी उनसे टकराने में डरता है, किन्तु इन अपढ़ मतदाताओं का क्या करें, जो पव्वा तो हमारा पीते हैं और वोट अपने विरोधी को दे डालते हैं। ईमानदारी में इतनी मिलावट कभी नहीं हुई थी। प्राचीन युग में जो जिसका खाता-पीता था, उसकी ही बजाया करता था। समाज में बेईमानी के काम में कभी इतनी गिरावट नहीं आई थी। बचपन में वे सट्टा खाते थे और जो अंक निकलता, उस पर जिसका जितना बलन बनता, वे पाई-पाई चुकाकर आते थे, किन्तु आज लोग बेईमानी में भी ईमानदार नहीं रहे। उनके साथ यार लोगों ने धोखा किया। कल तक जो चड्डी पहनकर साथ-साथ कबड्डी और खो-खो खेलते थे, उन्होंने ही आउट कर दिया। क्या उनके शुद्ध दूध में मिलावट आ गई थी, जो इन पहलवानों ने भी उनका साथ नहीं दिया, जो सालभर तक मुफ्त में मलाईदार दूध पीते रहे ? उनका चिंतन जारी था।



गत दशहरे पर उन्होंने रावण-दहन भी स्वयं किया था। कई वर्षो से वे रावण-दहन समिति के अध्यक्ष थे। इस बार वे लोग भी पूछने नहीं आए और गली के छोकरों ने रावण-दहन कर लिया। जब वे पिछले दशहरे पर मंत्री थे, तो भगवान राम बने मास्टर ने उनके पैर छू लिए थे और गाँव से शहर में ट्रांसफर की अर्जी हाथ में पकड़ा दी थी। आज राम तो क्या, रावण तक हँस रहा था। कोई उन्हें बुलाने तक नहीं आया और उनके बिना ही रावण-दहन संपन्न हो गया। कल तक गली के जो छोकरे उनकी जय-जयकार के नारे लगाते थे, आज वे ही उन्हें देखकर खी-खी कर हँसते हैं। क्या यही प्रजातंत्र है ? क्या मंत्री बनने और चुनाव जीतने पर ही व्यक्ति की पूजा होती है ? उसके पद से हटने के पश्चात् घर-परिवार के लोग भी क्या इसी प्रकार मुँह फेर लेते हैं ? अब तो चमेली की अम्मा भी चिढ़ाने लगी है-’पहलवानजी, आप अब मंत्री-वंत्री नहीं रहे हैं, सो सब्जी-भाजी ख़रीदकर नहीं लाए तो आज खाना पकने वाला नहीं है ?



क्या पूर्व मंत्री को अब कुँजड़े के यहाँ खड़े होकर कद्दू या बैंगन का भाव-ताव करना पड़ेगा ? अगर यही प्रजातंत्र है, तो लानत है ऐसे प्रजातंत्र को। इससे तो राजतंत्र अच्छा। एक बार राजा और मंत्री बने तो जीवन-पर्यन्त कोई हटा नहीं सकता। अगली पार्टी की बैठक में यह संशोधन अवश्य पेश होना चाहिए कि चुनाव-वुनाव बंद किए जाएँ और शारीरिक एवं चारित्रिक योग्यता के आधार पर लोगों को जीवन-पर्यन्त मंत्री बना रहने दिया जाए। उन्हें अपने ऊपर भी गुस्सा आ रहा था। वे तीन वर्ष तक इतने ईमानदार बने रहे। जो भी चंदा-चारा आता, वे पार्टी अध्यक्ष जी की झोली में डाल आते। मुख्यमंत्री जी को दे आते। अपने लिए उन्होंने कुछ भी नहीं रखा। आज परिणाम सामने हैं। वे गंदी गली के पुराने मकान में पुनः निवास करने लगे हैं और दूध की दुकान पर कढ़ाव में से मक्खियाँ निकालने का काम कर रहे हैं। वे पुनः झपकी लेने लगे है।



उन्हें पिछला स्वतंत्रता-दिवस याद आने लगा है। चमचमाती हुई कार में बैठकर झंडावंदन करने गए थे। तब वे प्रभारी मंत्री थे। बड़े-बड़े अफसर उनके आगे पीछे चल रहे थे। परेड ने उनको सलामी दी थी। उनकी जय के नारे लगाए थे। ये ही मोहल्ले के आवारा छोकरे तब उनके पास आए थे और बोले थे- ’भैयाजी, आपको हमारी गली का झंडावंदन भी करना होगा। हमें गर्व है कि हम आपकी गली में रहते हैं।’ तब उन्होंने हँसकर टाल दिया था। क्या गली-नुक्कड़ों के झंडावंदन भी अब हमें ही करना पड़ेंगे ? क्या छुटभैया नेता सब मर गए हैं ? जिले का प्रभारी मंत्री तो जिला मुख्यालय पर ही झंडावंदन करेगा। तब वे इन छोकरों पर हँसे थे। आज वे गली के छोकरे उन पर हँस रहे हैं।



दो-तिहाई बहुमत से उनकी पार्टी जीती थी। हमारे प्रदेश की जनता जिसे चाहती है, उसे दिल खोलकर वोट देती है। फिर वह यह भी नहीं देखती कि किसे और क्यों दे ? जब देना है तो दिल खोलकर देना। कंजूसी की बात नहीं। हमारे पहलवान भैया को भी पार्टी वालों ने पकड़ लिया था। हुआ यह कि वे दूध बेचा करते थे। इस कारण कस्बे-भर के लोग उन्हें अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने कभी दूध में पानी नहीं मिलाया था। इसी कारण उनकी ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं था। वे उस्ताद कालूराम के अखाड़े में दंड-बैठक लगाया करते थे। इस कारण लोग उन्हें आदर की दृष्टि से देखते थे। महिलाओं को भी उन पर भरोसा था। वे कभी आँख उठाकर भी उनकी ओर नहीं देखते थे। बालकों के लिए वे रामभक्त हनुमान थे। कुल मिलाकर कस्बे वालों ने उन्हें अपना आदर्श नेता मान लिया था और भारी बहुमत से चुनकर विधानसभा में भेज दिया।



विधानसभा में भी उनके सदाचारी आचरण के कारण वे सम्मानित हो गए। उन्होंने कभी भाषण नहीं दिया। अधिक-से-अधिक उन्होंने ’भाइयों और बहनों’ कहा और मुस्कराकर अपनी सीट पर बैठ गए। वे बोलने में नहीं, कर्म में विश्वास करते थे। अतः आज विधानसभा में उन्होंने विपक्षियों की ठुकाई कर दी। विपक्षी आज कुछ ज्यादा ही गाली-गलौच कर रहे थे। जिन मुख्यमंत्री को वे अपना भगवान मानते थे, विपक्षी नेता उन पर झूठे तथा गंदे आरोप लगा रहे थे। बस उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने गुरू कालूराम उस्ताद का पुण्यस्मरण कर विपक्षी नेता की विधानसभा में ही जूतों से पिटाई कर दी। पार्टी ने प्रसन्न होकर उन्हें युवा तथा खेलकूद विभाग का मंत्री बना दिया।



उनको एक झंडी लगी कार, एक पी.ए.तथा एक सुंदर स्टेनो मिली। उन्होंने तो नहीं चाहा, किंतु मोहल्ले वालों ने मिलकर तीन-चार सफारी तथा एक जोधपुरी सूट भी सिलवा दिए। वे दिल्ली तथा फॉरेन भी हो आए। कबड्डी तथा खो-खो को अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धा में एंट्री दिलाने हेतु उन्होंने विश्व ओलंपिक कमेटी में भी प्रस्ताव भिजवा दिया। लेकिन उन्हें अब अपने बंद मकान की गंदी गली में रहने में शर्म आने लगी। मंत्री पद होता ही इतना खराब है कि उसके मिलते ही नेता का मस्तिष्क भी खराब लगता है।



वे अक्सर सर्किट हाउस में रहने लगे थे तथा रात्रि-विश्राम अपनी धर्मपत्नी को भी वहाँ बुलवा लिया करते थे। पिछली बार जब वे अपनी माताजी के श्राद्ध में भाग लेने हेतु अपने घर और गली में गए थे, तब हेयर कटिंग सेलूनवाले मास्टर लालूराम ने कैची और कंघी हिलाते हुए व्यंग्य कसा- ’क्यों भैया, भूल गए अपनी गली और अपना घर ! अब क्यों याद रखोगे हमें। लेकिन याद रखना, एक दिन फिर यहाँ आना पड़ेगा। काम हमसे ही पड़ेगा भैया !’ थानेदार ने डंडा घुमाकर लालूराम को चुप कराया था। दो घंटे उसे थाने में बंद रखा था। गली वालों ने माफी मँगवाकर पुलिस से उसे छुड़वाया था। तबसे गली वाले उनसे भिन्ना ही रहे थे। लेकिन अब वे क्या करें ? अब झंडी लगी कार में से, किसी नाई या दर्जी की दुकान में गले मिलने तो जा नहीं सकते।



इस तरह तीन वर्ष कब गुजर गए, उन्हें पता तक नहीं चला। उनकी कार छिन गई। उनका बँगला, दूसरे मंत्री को ’अलाट‘ हो गया। उन्होंने सोचा था कि चुनाव के पहले अपन बँगला बना लेंगे। इसी कारण सारा चंदा पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को भेंट करते रहे थे। लेकिन पहलवान यहाँ चूंक गए। वे नौसिखिए निकले, गच्चा खा गए। वरना आज वे भी अपने नेताओं की तरह बँगले में रहते और अपनी कार में घूमते । प्रजातंत्र की यही तो बहुत बड़ी ’ट्रेजेडी‘ है।

(प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ शिव शर्मा का जन्म 25 दिसम्बर 1938 को राजगढ़ (ब्यावरा) नामक एक में हुआ उन्होने उज्जैन को अपनी कर्मस्थली बनाया। यहीं माधव कालेज में शिक्षा ग्रहण कर अध्यापन किया एवं प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत हुए। वर्ष 1970 के दशक से व्यंग्य-लेखन में सक्रिय डॉ शिव शर्मा ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना परचम फहराया। डॉ शिव शर्मा का पहला व्यंग्य उपन्यास ‘बजरंगा’ था और दूसरा व्यंग्य उपन्यास ‘हुजूर-ए-आला’ (शिव शर्मा-रोमेश जोशी) 2016 में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ जो काफी चर्चित हुआ और उपन्यास श्रेणी में वर्ष का बेस्ट सेलर उपन्यास घोषित हुआ। उज्जैन में मालवा की हास्य व्यंग्य संस्कृति को समर्पित प्रसिद्ध आयोजन अखिल भारतीय टेपा-सम्मेलन के संस्थापक अध्यक्ष रहकर 49 वर्षो से सफल आयोजन किया। बीमारी के चलते 80 वर्ष की आयु में 22 मई 2019 को आपका देहांत हो गया)



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