Sunday 18th April 2021

भूल गए हम गाँव गली

गीत*लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव




भूल गए हम अब गाँव गली,
न मिल रहे हमें पुराने संस्कार।
बड़ो को देख पैर झट से छूते,
अब तो हैलो हाय का प्रचार।।

चौके में पीढ़े पे बैठ रोटी खाना,
दूध दही घी छाँछ और अचार।
छोटे भाई बहन का रूठ जाना,
बापू की डांट माँ का वह प्यार।।

अपने दोस्तों संग पेड़ों पे चढ़ना,
बागों में जो बहे मंद मंद बयार।
खेतों की मिट्टी की सोंधी महक,
दादा दादी का जो मिला दुलार।।

शहरों में हम घर में हो गए कैद,
मिलने को नही होते रिश्तेदार।
समय नही घर जाएं किसी के,
न हम करते हैं अब इंतजार।।

घर में हम मोबाइल से चिपके,
साथ खाने का न रहा व्यवहार।
बच्चे भी टीवी में खेल रहे गेम,
कुश्ती दंगल का न रहा प्रचार।।

आधुनिकता के नाम पर अब,
होते जा रहे हैं हम कर्जदार।
चाची चाचा हुए आंटी अंकल,
प्रीत के न रहे अब न मनुहार।।

*लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
  ग्राम-कैतहा[उत्तर प्रदेश]



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