Wednesday 21st April 2021

विश्व शाकाहार दिवस 1 अक्टूबर 2020 पर विशेष-

भारतीय धर्म और परम्पराएँ शाकाहार की पक्षधर हैं

भारतीय धर्म और परम्पराएँ शाकाहार की पक्षधर हैं

लेख-डॉ. दिलीप धींग

कुछ सालों पहले अखबारों में एक खबर छपी थी कि भारत अब मांसाहार प्रधान देश हो गया है। इस खबर का आधार बना भारत के महापंजीयक (रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया) द्वारा करवाया गया एक सर्वेक्षण। सर्वे के तहत बताया गया कि भारत में लगभग 70 फीसदी लोग मांसाहारी हैं। सर्वे के अलग-अलग राज्यों के सांख्यिकीय आँकड़े भी दिये गये। उन आँकड़ों के अनुसार राजस्थान में शाकाहारियों की आबादी सर्वाधिक लगभग 75 प्रतिशत हैं। इसी प्रकार तेलंगाना को 98.70 प्रतिशत के साथ मांसाहार में अव्वल बताया गया है। शाकाहार

‘राजस्थान पत्रिका’ के 16 जून 2016 के अंक के अनुसार यह सर्वे देश के 21 राज्यों के 14680 लोगों में करवाया गया, जिसमें 883 शहरी व ग्रामीण क्षेत्र सम्मिलित किये गये। पहला सवाल तो यह है कि क्या इतने बड़े देश के इतने-से लोगों और क्षेत्रों के बीच करवाये सर्वे को पूरे भारत के शाकाहारी व मांसाहारी लोगों की आबादी का निष्कर्ष निकालना सही व तर्कसंगत है? दूसरा सवाल यह है कि अचानक इस प्रकार के सरकारी सर्वेक्षण की कहाँ जरूरत पड़ गई थी?

पूरी दुनिया जानती है कि भारत सदियों-सदियों से मूलतः और मुख्यतः शाकाहार-प्रधान मुल्क है। उष्ण कटिबंधीय भारतवर्ष की जलवायु और आबोहवा भी शाकाहारी जीवनशैली के अनुकूल है। भारतीय धर्म और परम्पराएँ भी शाकाहार की पक्षधर हैं। मौजूदा समय का उल्लेखनीय तथ्य है कि देश-दुनिया में शाकाहार के पक्ष में उत्साहवर्धक वातावरण बन रहा है। पशु-पक्षियों के प्रति करुणा और नैतिकता के अलावा शाकाहार का अच्छी सेहत, स्वच्छ पर्यावरण और पारिस्थितिकी सन्तुलन से भी गहरा नाता है। यही कारण है कि परम्परागत मांसाहारी व्यक्ति, समुदाय और देश भी शाकाहार के बहुआयामी महत्व को समझकर मांसाहार में कटौती करने लगे हैं।

इस सन्दर्भ में शाकाहार के प्रति बढ़ते वैश्विक रुझान का एक और समाचार चीन का है। 22 जून 2016 को राजस्थान पत्रिका, चेन्नई के अन्तिम पृष्ठ (12) पर प्रकाशित समाचार का शीर्षक है – ‘शाकाहार के जरिये ग्लोबल वार्मिंग से लड़ेगा चीन’। समाचार के अनुसार जलवायु-परिवर्तन रोकने के लिए चीन ने देश में शाकाहार को बढ़ावा देने का फैसला किया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी देश में मांस की खपत को 50 प्रतिशत तक कम करने की योजना बना रही है। ऐसा करने से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा। चीन की 1.3 अरब आबादी के लिए चीन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने नये दिशा-निर्देश तैयार किये हैं। दिशा-निर्देशों के अनुसार एक चीनी नागरिक प्रतिदिन 40 से 75 ग्राम मांस ही खा सकेगा। यह भी पढ़े- ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिये शाकाहार जरूरी

जहाँ तक भारत की बात है, शाकाहार भारत का मुख्य भोजन है। शाकाहार के पक्ष में चल रही हवा से मांस व्यवसाय से जुड़े लोग चिन्तित भी हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में पौल्ट्री फॉर्म धंधे का उदाहरण लें। भारत में अण्डों की खपत बढ़ाने के लिए अण्डे को शाकाहार और निर्जीव के रूप में प्रचारित करने की कुत्सित व्यावसायिक चाल चली गई। प्रचार माध्यमों और विज्ञापनों के जरिये अण्डे के शाकाहार होने का महाझूठ और अवैज्ञानिक तथ्य फैलाया गया। फिर अण्डे और दूध की बेतुकी, अतार्किक तुलना से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की गई। भारत में सदियों से सुस्थापित शाकाहार-प्रधान जीवनशैली होने के कारण यहाँ मांसाहार को बढ़ावा देने और मांस-व्यवसाय के विस्तार के लिए अनेक ऐसे प्रलोभन दिये गये और भ्रम फैलाये गये, जिन्हें समझना लोगों के लिए बेहद मुश्किल हुआ। ऐसा करके देश के समतामय शाकाहारी सामाजिक ढाँचे को नुकसान पहुँचाने की कुटिल कोशिशें की गईं। चूंकि अब शाकाहार की श्रेष्ठता अनेक दृष्टियों से सिद्ध हुई और होती जा रही है तो हो सकता है मांस-व्यवसाय से जुड़े लोग या मांस में आसक्ति रखने वाले चिंतित हों। उपर्युक्त अविश्वसनीय सर्वेक्षण के पीछे ऐसे लोगों की ज्ञात-अज्ञात या प्रकट-अप्रकट दिलचस्पी हो सकती है। यह भी पढ़े-शाकाहार क्रांति का अर्थ है कोरोना से मुक्ति

भारत के सन्दर्भ में ही देखें तो जो सर्वेक्षण किया गया, वह तथ्यों को भ्रामक तरीके से प्रस्तुत करता है। हो सकता है कि भारत में मांसाहारी अधिक हों, लेकिन भारत में मांसाहार अधिक नहीं है। भारतीय ऋषियों और विचारकों ने मांसाहार को व्यसन (कुटेव) और तामसिक (बुरा) आहार माना है। यह तामसिक आहार और कुव्यसन जितना घटेगा, उतनी ही मानव की खुशियाँ बढ़ेंगी और बहुगुणित होंगी। भारत में मांसाहार के प्रति ऐसी धारणा रही कि कोई व्यक्ति यदि कभी-कभार भी मांस का सेवन करता है तो उसे मांसाहारी माना जाता है। ऐसा मानना बिल्कुल ठीक है। मामूली या कभी-कभी मांसाहार करने मात्र से ही किसी व्यक्ति को ‘मांसाहारी’ की श्रेणी में डालने या मानने की भारतीय पद्धति में शाकाहार का गौरव दीप्तिमान है। यह बात कुछ वैसी लगती है जैसे घड़ाभर अमृत में कोई एक बून्द भी विष मिला दे तो पूरा घड़ा ही विषैला मान लिया जाता है। यह भी पढ़े-शब्द प्रवाह डॉट पेज

मांसाहारी शाकाहार करता है, कर सकता है, लेकिन शाकाहारी के लिए मांसाहार पूर्ण निषिद्ध होता है। इसलिए भारत में शुद्ध शाकाहारी तो करोड़ों मिल जायेंगे, लेकिन शुद्ध मांसाहारी बिल्कुल नहीं मिलेंगे। यही स्थिति पूरी दुनिया की है। एक अनुमान के अनुसार दुनिया में मात्र दो प्रतिशत लोग ही शुद्ध मांसाहारी हैं। वे लोग बर्फीले ध्रुवीय क्षेत्र में रहते हैं। उन्हें एस्किमो या इनुइत कहा जाता है। उनकी स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण उन्हें शाकाहार नसीब नहीं होता है। उन लोगों की संख्या अल्प है और आयु भी। उन थोड़े-से लोगों को छोड़कर देश और दुनिया के सभी मांसाहारी किसी न किसी प्रकार का शाकाहार करते ही है। सच्चाई यह है कि सभी मांसाहारी मिश्रित-आहारी होते हैं। इसके विपरीत शाकाहारी सिर्फ शाकाहारी होते हैं। कुछ दिन विशेष में थोड़ा-सा मांसाहार करने वालों को भी ‘मांसाहारी’ मानने के कारण से मांसाहारियों की संख्या अधिक हो जाती है। लेकिन इस तथ्य से मांसाहार की अधिकता सिद्ध नहीं होती है।

वस्तुतः मानव मूलतः शाकाहारी प्राणी है। शाकाहार मानवमात्र का कुदरती भोजन है। इसलिए मांसाहारी भी शाकाहार करते ही हैं। स्वास्थ्य और शारीरिक कारणों से उनका शाकाहार करना जरूरी भी है। शाकाहार करने के कारण ही मांसाहारी लोग मांसाहार के अनेक दुष्प्रभावों से बचे रहते हैं। सन्तुलित शाकाहार में सभी प्रकार के पोषक तत्व पाये जाते हैं। मांसाहार के साथ ऐसा नहीं है। मसलन, किसी भी प्रकार के मांसाहार में विटामिन सी और भोजन-तंतु (डाइटरी फाइबर) का सर्वथा अभाव होता है। ऐसे आवश्यक तत्व शाकाहार से ही प्राप्त किये जा सकते हैं।

अतः मांसाहारी तो शाकाहारी होते हैं, लेकिन शाकाहारी मांसाहारी नहीं होते हैं। यदि वे होते हैं तो उन्हें मांसाहारी माना जाता है। भारत में अनेक मांसाहारी व्यक्ति, परिवार और समुदाय कुछ अवसर विशेष पर ही मांस का सेवन करते हैं। श्रेणी की दृष्टि से वे मांसाहारी तो हैं, लेकिन उनकी मांस-खपत शाकाहार की तुलना में अत्यन्त कम होती है। यानी मांसाहारी होने और कहलाने के बावजूद उनकी जीवनशैली शाकाहार-प्रधान ही है। हवाओं का रूख यह भी है कि परम्परागत मांसाहारी अपने आहार में शाकाहार को बढ़ावा देने लगे हैं। यहाँ तक वे पूर्ण शाकाहारी जीवनशैली भी अपनाने लगे हैं।

इसी प्रकार कुछ परम्परागत शाकाहारी व्यक्तियों के जीवन और परिवार में भी किसी रूप में मांसाहार ने प्रवेश कर लिया है। वे कुछ प्रकार के मांस का सेवन कथित स्वास्थ्य, शौक या आधुनिकता के नाम पर करने लगे हैं। परिणामस्वरूप वे व्यक्ति या परिवार भी मांसाहारी की श्रेणी में चले गये। ऐसे ‘नये मांसाहारी’ कभी-कभी कुछ प्रकार का सीमित मांसाहार ही करते हैं। गौर करें तो अभी भी उनका जीवन शाकाहार-प्रधान ही है।

शाकाहार-शाकाहारी और मांसाहार-मांसाहारी के अनुपात को देखने के लिए हम उदाहरण लेते हैं। माना कि एक व्यक्ति दस दिन में एक दिन मांसाहार करता है तो मोटे तौर पर वह नब्बे प्रतिशत से भी अधिक शाकाहार करता है। यहाँ ‘अधिक’ इसलिए कहा गया है कि जिस दिन वह व्यक्ति मांसाहार करता है, उस दिन भी पूर्ण रूप से शुद्ध मांसाहार नहीं करता है। वह मिश्रित आहार करता है। उसकी सामिष थाली भी शाकाहार-प्रधान होगी या हो सकती है। कभी-कभी मामूली मांस-सेवन के कारण अथवा पूर्ण शाकाहारी नहीं होने के कारण वह व्यक्ति भी मांसाहारी की श्रेणी में माना जाता है। जबकि उसकी भोजन-थाली और जिन्दगी मुख्यतः शाकाहार-प्रधान ही है।

इस उदाहरण को अन्य रूप में भी देख सकते हैं। एक व्यक्ति अपनी दैनिक दस भोजन इकाइयों में-से यदि एक इकाई मांसाहार करता है तो वह नब्बे प्रतिशत शाकाहारी होने के बावजूद ‘मांसाहारी’ की श्रेणी में रखा जायेगा। बेशक, इन उदाहरणों में प्रयुक्त अनुपात घट-बढ़ सकता है। लेकिन उसकी भोजन-थाली या जिन्दगी शाकाहार-प्रधान ही है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार के वास्तविक आधारों पर सर्वेक्षण करवाया जाए तो भारत में शाकाहार की प्रधानता/अधिकता स्वयं ही सिद्ध हो जायेगी। साप्ताहिक पत्र ‘श्रमण भारती’, आगरा (17-24 अप्रेल 2017) ने इस प्रकार के सर्वेक्षण को बिलकुल गलत ठहराया है। पत्र ने लिखा कि भारत के मांसाहारी व्यक्ति भी 90 से 95 प्रतिशत शाकाहार करते हैं। वस्तुतः भारत मांसाहार-प्रधान नहीं, शाकाहार-प्रधान देश ही है। बढ़ते प्रदूषण, आतंक और कोरोना महामारी के बाद अब तो पूरी दुनिया तेजी से शाकाहारी जीवनशैली की ओर अग्रसर है। मानव, मानवता और दुनिया को बचाने के लिए शाकाहार की ओर अग्रसर होना बिल्कुल वाज़िब और बेहद जरूरी है।

*डॉ. दिलीप धींग
(लेखक अंतरराष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन व शोध केन्द्र, चेन्नई के निदेशक है)

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