Wednesday 21st April 2021

कहीं सूखा कहीं बारिश कहीं तूफान गिरते हैं

ग़ज़ल*राज जौनपुरी




कहीं सूखा कहीं बारिश कहीं तूफान गिरते हैं
चले जो काफ़िला तेरा कई शैतान गिरते हैं

गुनाहों के समंदर का अकेला बादशा तू है
तेरे कदमों के साहिल पे कई भगवान गिरते हैं

कहाँ ईमान, इज़्ज़त, सादगी की बात करते हो
जहाँ सिक्का खनकता है कई इंसान गिरते हैं

सियासत के घिनौना खेल से बचता कहाँ कोई
चले जब मज़हबी आँधी कई नादान गिरते हैं

गरीबी आग है ऐसी मिटा देती है इंसां को
उठे जब भूख की आँधी कई अरमान गिरते हैं

अमीरी की हवस इंसान को पागल बनाती है
जहाँ दौलत नज़र आये तो फिर ईमान गिरते हैं

खुदा भी सिर झुकाता है जहाँ तेरी इबादत में
उन्हीं कदमों में आकर माँ सभी बलवान गिरते हैं

भले हो या बुरे बच्चे सभी प्यारे उसे होते
दुआओं में लबों से माँ के बस वरदान गिरते हैं

रदीफ़ो काफ़िया ही बस नहीं अंदाज़े-बयां भी है
पढ़े ग़ज़लें हमारी जो सुख़नवर जान गिरते हैं

हमेशा ‘राज’ बेबाकी में सच तुम बोल देते हो
इसी आदत पे दुश्मन के कई फ़रमान गिरते हैं

*राज जौनपुरी
प्रयागराज(उ. प्र.)



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