Wednesday 21st April 2021

कपटी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार ही नीतिधर्म

कपटी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार ही नीतिधर्म

लेख*डॉ विवेक चौरसिया

लोक में महाभारत की प्रतिष्ठा भले युद्ध-काव्य के रूप में हो लेकिन सच तो यह है कि प्रायः हर प्रसङ्ग में युद्ध की बात करते हुए भी महाभारत हरसंभव युद्ध का निषेध करती है। ऐसा न होता तो कुल अठारह पर्वो में विभक्त इस महान महाकाव्य के पहले ही भाग आदिपर्व में युद्ध की नौबत आने पर महामना विदुर लोभी, कामी और नेत्रहीन धृतराष्ट्र से भला क्यों कहते कि ‘यश्च साम्नैव शक्यते कार्ये साधयितुं नृप। को दैवशप्तस्तत् कार्ये विग्रहेण समाचरेत्।’ अर्थात महाराज! जो काम शांतिपूर्वक समझाने से ही सिद्ध हो सकता है, दैव का मारा कौन मनुष्य होगा जो उसी को युद्ध के द्वारा सिद्ध करना चाहेगा!
इस समय देश की विशेषकर उत्तर-पूर्वी सीमा पर जब युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं तब अनायास ही महाभारत के अनेक प्रसङ्ग प्रासंगिक हो गए हैं। जो संकेत देते हैं कि युद्ध सदा ही लोभ और कामनाओं से भरे अंधे चित्त व चरित्र की ऐसी दु:खदायी प्रतिक्रिया होता है जिसकी कीमत न केवल ‘अंधा राजा’ चुकाता है अपितु पूरे समाज, राष्ट्र और मानवता मात्र को पीढ़ियों तक चुकाना पड़ती है। भारतीय वाङ्गमय के दो प्रमुख महाकाव्यों रामायण और महाभारत दोनों में युद्ध का वर्णन है। वाल्मीकि रामायण में तो आदिकवि ने पृथक युद्धकाण्ड ही रचा है लेकिन श्रीराम-रावण का युद्ध जहाँ स्पष्टत: अधर्म के विरुद्ध धर्म का युद्ध है वहीं महाभारत का युद्ध अधर्म और अर्द्ध धर्म का युद्ध है। श्रीराम कथा के नायक श्रीराम की तरह महाभारत के विजेता पांडव धर्म की कसौटी पर पूरे खरे नहीं हैं। अपने चचेरे भाई कौरवों से उनकी लड़ाई धर्म रक्षा से अधिक राज्य के लिए है। इसीलिए रामायण की तुलना में महाभारत का युद्ध सम्बन्धी चिंतन और विवरण दांवपेंच भरा है, जिसमें शत्रु पक्ष पर विजय के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद सभी नीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है।



आधुनिक संसार में दो देशों के बीच होने वाले युद्ध भी महाभारत के जैसे होते हैं, रामायण जैसे नहीं। इसीलिए इन युद्धों में जय के लिए दोनों पक्ष सभी परम्परागत नीतियों के साथ समकालीन युद्ध नीतियों और तकनीकों का उपयोग करते हैं। यह जानते हुए कि युद्ध से केवल विनाश और जनसंहार होता है, तब भी जब लोभ और अहंकार पराकाष्ठा पर पहुँच जाए तब प्रायः इन दुर्गुणों में अंधा हुआ पक्ष विनाशकारी युद्ध की रणभेरी फूँक ही देता है। ठीक वैसे ही जैसे इस समय अपनी सीमाओं के विस्तार को व्याकुल लोभी और अहंकारी हमारा पड़ोसी राष्ट्र चीन युद्ध पर आमादा नज़र आ रहा है।
ऐसी स्थिति में राष्ट्र की रक्षा के कर्तव्य को महाभारत राजधर्म और राष्ट्रधर्म के रूप में सविस्तार व्याख्यायित करती है। यूँ महाभारत के सभापर्व में इन्द्रप्रस्थ का राज्य सम्भालने के बाद युधिष्ठिर और नारद संवाद तथा उद्योगपर्व के धृतराष्ट्र और विदुर संवाद में राजधर्म के बहाने राजा के कर्तव्यों का विशद वर्णन हैं लेकिन सबसे कीमती संवाद शांतिपर्व में निहित है। जहां शरशय्या पर लेटकर इच्छा मृत्यु का वरण करने के लिए उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा करते हुए महामना भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश दिया है। कितना अद्भुत है कि पर्व का नाम ‘शांति’ है जो महायुद्ध के ठीक बाद की कथा का भाग है और बात युद्धकाल में नीतियों की कही-समझाई-सिखाई गई है। मानो कि युद्ध के लिए शांति और शांति के लिए युद्ध अनिवार्य होकर एक अर्थ में एक-दूसरे के पूरक बन जाया करते हैं।



तीन उपपर्वों में विभक्त शांतिपर्व के प्रारम्भिक 130 अध्याय राजधर्मानुशासन पर्व के रूप में राजधर्म की शिक्षा देते हैं। कहीं राष्ट्र की रक्षा और उन्नति के लिए राजा की आवश्यकता पर जोर है तो कहीं राजा के लिए मित्र और अमित्र की पहचान बताने के नीतिगत नुस्खें हैं। प्रजा से कर लेने तथा कोश संग्रह के उपाय भी हैं तो सैन्य संचालन की रीति-नीति का विवरण भी हैं। सार-सूत्र कुछ यूँ हैं कि ‘जिस सेना के योद्धा और वाहन मन में प्रसन्न और उत्साहयुक्त होते हैं, उनकी विजय ही सुनिश्चित होती है।’
एक स्थान पर भीष्म कहते हैं, ‘जब तक सन्धि सम्भव हो तब तक युद्ध से बचना चाहिए। पहले साम नीति, फिर भेदनीति और फिर दान नीति अपनाना चाहिए। इन तीनों उपायों के सफल न होने पर ही अंत में युद्ध का आश्रय लेना चाहिए। ‘सान्त्वभेदप्रदानानां युद्धमुत्तरमुच्यते!’ राष्ट्र पर संकट की घड़ी में उसके निवासियों का राजा पर विश्वास और परस्पर सहयोग विजय के लिए अनिवार्य है। एक अध्याय में भीष्म कहते हैं देश पर आक्रमण की स्थिति में राजा को प्रजा से धन माँगने में संकोच नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़े तो राजा प्रजा से आव्हान करे कि ‘जैसे बलवान बैल दुर्गम स्थानों में भी बोझ ढोकर पहुँचा देते हैं उसी प्रकार आप लोग देश पर आई विपत्ति के समय कुछ भार वहन करे। जब यह भय दूर हो जाएगा तब यह सारा धन मैं आप लोगों को लौटा दूंगा। ‘प्रतिदास्ये च भवतां सर्वे चाहं भयक्षये!’ भीष्म स्पष्ट कहते हैं, ‘राष्ट्र की रक्षा वहीं राजा कर सकता है जो बुद्धिमान और शूरवीर होने के साथ दण्ड देने की नीति को जानता हो। जो दण्ड देने में संकोच करता है वह नपुंसक और बुद्धिहीन नरेश कदापि राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकता।’



साधो! शांति पर्व के प्रवचन सामान्य शत्रु के लिए हैं, चीन सरीखे कपटी के लिए नहीं। ऐसे शत्रु से निपटने के लिए विदुर जैसे साधु भी कपट की वकालत कर बैठते हैं। उद्योगपर्व में विदुर की वाणी ही इस समय शत्रु के प्रति राष्ट्र की नीति होना चाहिए। प्रसिद्ध विदुर-नीति कहती है, ‘यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्म:। मायाचारो मायया वर्तितव्य: साध्वाचार: साधुना प्रत्युपेय:।।’ अर्थात जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण व्यवहार करें और अच्छा व्यवहार करने वाले के साथ साधुभाव वाला सद्भाव रखे। यही नीतिधर्म है!

*डॉ विवेक चौरसिया
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पौराणिक साहित्य के अध्येता है)



Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES
TAGS

COMMENTS

Wordpress (1)
  • comment-avatar

    रामायण और महाभारत महाकाव्यों के माध्यम से युद्ध नीति, राजनीति और नीतिधर्म के बारे में सारगर्भित जानकारी देने के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ. विवेक चौरसिया जी। बहुत-बहुत साधुवाद।

  • Disqus (0 )