Wednesday 21st April 2021

केवल उज्जैन में ही मनाई जाती है कालिदास जयंती

केवल उज्जैन में ही मनाई जाती है कालिदास जयंती

लेख*डॉ. देवेन्द्र जोशी

इतिहास संस्कृति और कालिदास साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान स्व.डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने अपनी कृति ‘मध्यप्रदेशं नमामि’ में लिखा है कि ‘कालिदास कहां से आए, कश्मीर या सूरांगनाओं के दर्पण हिमगिरी कैलाश की छाया में रमी अलका से, हम नहीं जानते। पर मध्यप्रदेश को उन्होंने अपना आवास बनाया, इसमें कोई संदेह नहीं है। कश्मीर से बंगाल तक उनकी जन्मभूमि होने का अपना दावा करते हैं। लेकिन कालिदास साहित्य में उज्जयिनी के प्रति जो अनुराग और आग्रह उजागर हुआ है, उससे यह सहज अनुमान लगता है कि उज्जैन से उनका निकट का संपर्क रहा होगा।’
डॉ. भगवतशरण उपाध्ययाय की ही तरह संस्कृत के तमाम मनीषि आचार्य इस बात पर एकमत हैं कि महाकवि कालिदास ने अपने संपूर्ण साहित्य में अपनी जन्मतिथि, जन्म स्थान आदि का कहीं कोई जिक्र नहीं किया । बावजूद इसके उज्जैन में सन् 1958 से प्रतिवर्ष देव प्रबोधिनी एकादशी से सप्तदिवसीय अभा कालिदास समारोह की शुरूआत होती रही है। कालिदास समारोह भारत में और दुनिया के अनेक देशों मनाए जाते रहे हैं। लेकिन कालिदास जयंती 22 जून को विगत 38 वर्षों प्रति वर्ष उज्जैन में ही मनती रही है। जिसमें संस्कृत विद्वान,आचार्य, राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी सम्मिलित होते रहे हैं।



कालिदास जयंती कहीं भी नहीं मनने का कारण यह है कि जब किसी को कलिदास की जन्मतिथि के बारे में ही पता नहीं है तो जयंती मनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। लेकिन उज्जैन में विगत 38 वर्षों से कालिदास जयंती मनाने का आधार यह है कि उज्जैन के संस्कृत विद्वान और ज्योतिषाचार्य पं मोरेश्वर शास्त्री दीक्षित ने अपने गहन शोध और अनुसंधान के बाद यह दावा किया कि कालिदास का जन्म 22 जून को हुआ। इसी को आधार मानकर प्रतिवर्ष उज्जैन मे 22 जून को कालिदास जयंती समारोह पूर्वक मनाई जाती है जिसमें संस्कृत विद्वान, वेदपाठी बटुक आदि उपस्थित होकर कालिदास साहित्य पर चिन्तन मनन कर महाकवि को अपना जयंती प्रणाम अर्पित करते हैं।



पं मोरेश्वर जी का महाकवि की जयंती 22 जून होने का दावा करने वाला यह शीध पत्र कालिदास समारोह की शोध संगोष्ठी में पढा जा चुका है और कालिदास अकादमी में आज भी सुरक्षित है। जिसके प्रकाशन की लगातार मांग उठती रही है। राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत संस्कृत आचार्य डॉ. केदार नारायण जोशी जो कि 22 जून के जयंती आयोजन में लगातार शरीक होते रहे हैं का कहना है कि मोरेश्वर दीक्षित के शोध अनुसंधान के प्रामाणिक होने का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है कि कालिदास समारोह में भाग लेने वाले शोधार्थियों और विद्वानों में से आज तक किसी भी विद्वान ने इसका खंडन नहीं किया।



यह अपने आपमें रोचक और साहसिक है कि जब आज तक महाकवि कालिदास के जन्मस्थान और जन्मतिथि को लेकर कोई संस्कृत विद्वान प्रत्यक्ष परोक्ष कुछ भी नहीं कह पाया, ऐसे में उज्जैन के एक संस्कृत विद्वान ने अपनी ज्योतिषीय गणना के आधार पर आज से करीब अर्धशती पूर्व कालिदास की जन्मतिथि निर्धारित कर समाज के सामने रख दी और उसके आधार पर महाकवि की जयंती मनने लगी। प्रामाणिकता पर भले ही संशय हो लेकिन ऐसे विद्वान के श्रम और साहस को तो प्रणाम किया ही जा सकता है जिसने संस्कृत विद्वानों के बीच अपना दावा प्रस्तुत करने का जोखिम उठाया। जहां तक महाकवि के जन्मस्थान और जन्मतिथि के आधार का सवाल है तो जिस देव प्रबोधिनी एकादशी से कालिदास समारोह की शुरूआत होती है उसका भी महाकवि की जन्मतिथि होने का कोई ठोस आधार नहीं है।



चूंकि कालिदास साहित्य में देव प्रबोधिनी तिथि का बार – बार वर्णन आया है इसलिए इस तिथि को महाकवि की प्रिय तिथि मानकर विद्वानों ने यह अनुमान लगाया कि यही कालिदास की जन्मतिथि होगी। क्योंकि प्रायः व्यक्ति की प्रियतिथि उसकी जन्मतिथि ही होती है। इसी आधार पर इस दिन से कालिदास समारोह की शुरूआत होने लगी। दोनो तिथियों के तार्किक आधार की तुलना करें तो देव प्रबोधिनी एकादशी की तुलना में मोरेश्वर दीक्षित की 22 जून का दावा अधिक तार्किक प्रतीत होता है। क्योंकि यह आषाढस्य प्रथम दिवसे के भी अधिक निकट बैठता है। चूंकि दोनों का कोई ठोस आधार नहीं है इसलिए किसी को भी प्रथमदृष्टया खारिज या स्वीकार नहीं किया जा सकता।



अब थोडी चर्चा कालिदास और उज्जैन के संबंधों को लेकर करें तो वहां भी स्थिति ऐसी ही मिलती है। कालिदास के रघुवंश में अवंतिनाथ, उनके प्रासाद, महाकाल,शिप्रा और उसके तटवर्ती उद्यान आदि का सुन्दर वर्णन मिलता है। मेघदूत में उज्जयिनी को स्वर्ग का चमकता हुआ टुकड़ा बताया गया है। शिप्रा की तरंगों को स्पर्श कर बहते पवन में घुलती सारस की क्रेंकार, महाकाल की संध्या आरती, उस समय हाथ में चंवर लिए चूडियां खनकाती गणिकाएं, शिव की भुजाओं से छनता प्रकाश, गंधवती के जल की कसैली गंध से महमहाता उद्यान, अभिसारिकाएं आदि कितने ही दृश्य मेघदूत में कालिदास की कलम से प्रकट हुए हैं।



महाकवि की कल्पना में यह नगरी ऐसी लगती है मानो स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने वाले,पुण्य समाप्त होने के पूर्व ही अपने बचे हुए पुण्य के साथ स्वर्ग का एक चमकीला टुकड़ा धरती पर उतार लाए हों। महाकवि कालिदास ने इस नगरी की मालिनों और वणिकों का बड़ा मनोरम वर्णन किया है।कालिदास के अनुसार यहां के बाजारों में इतनी मोतियों की मालाएं ,रत्न, शंख सीपियां और नीलम के ढेर दिखाई देते हैं कि लगता है जैसे यहाँ के वणिक समुद्र से सबकुछ निकाल कर उज्जयिनी में ले आए हों।अब बेचारे समुद्र में केवल पानी ही शेष रह गया है।
उज्जैन के इस सटीक वर्णन से विद्वानों की यह धारणा पुष्ट हुई कि कालिदास उज्जैन के ही होंगे। महाकवि कालिदास से लेकर पाणिनी, भास,राज शेखर, लक्ष्मीधर भट्ट, वाल्मीकि, शूद्रक,बाण भट्ट, भोज और विक्रमादित्य तक सभी ने उज्जैन का वर्णन किया है। लेकिन कालिदास ने जिस सूक्षमता और नजदीकी से उज्जयिनी को शब्दों में रूपायित किया है, उससे यह सहज अनुमान लगता है कि कवि ने जो देखा उसे अपनी रचनाओं में लिपिबद्ध कर दिया।

*डॉ. देवेन्द्र जोशी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद् है)
मो 9977796267



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