Wednesday 21st April 2021

कोई जान सका ना

कविता*अ कीर्तिवर्द्धन




सागर की गहराई,कोई जान सका ना,
छिपे हुये हैं कितने मोती,कोई जान सका ना।।

झरझर झरते मेरे आँसू,सब देख रहे हैं,
दर्द छिपा कहाँ पर कितना,कोई जान सका ना।।

मुझसे मेरी व्यथा पूछते,मेरे घर के अपने,
क्यों जार जार मैं रोया,कोई जान सका ना।।

किसको अपनी पीर बताऊँ,सबके हित हैं,
शुष्क नयन घट भीतर रोता,कोई जान सका ना।।

मेरी पीड़ा मेरी अपनी है,किसको समझाऊँ,
सुख की चाहत डोल रहा जो,कोई जान सका ना।।

लगता जैसे बिखर रहा हूँ,अब रेत कणों सा,
तट पर बैठा प्यासा हूँ, कोई जान सका ना।।

*अ कीर्तिवर्द्धन,मुजफ्फरनगर



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