Wednesday 21st April 2021

कोरोना का कहर – प्रधानमंत्री की लहर

कोरोना का कहर – प्रधानमंत्री की लहर

लेख*दीपक अवस्थी 'बंसीधर'

गजगामिनी सी मदमाती चाल से चली जा रही ज़िन्दगी में रविवार को अचानक सन्नाटे का ब्रेक लग गया। इसी दिन अचानक सूर्यास्त से कुछ समय पहले उस सन्नाटे को चीरती हुई घण्टे, शंख और थाली-ताली की आवाजों से गली मोहल्ले गुंजायमान हो गए। और इसी के साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष ने राष्ट्र प्रधान को अपना संदेश सुनाया कि स्थिति कैसी भी हो राष्ट्रहित में हम आपके साथ हर कार्य करने के लिए तत्पर हैं।


कोरोना के भारत आने से भले ही सरकार और चिकित्सकों सहित भारत का एक वर्ग चिंतित और इससे बचाव के लिए प्रयासरत था। परन्तु भारत का आम नागरिक इस वायरस को नजरअंदाज कर अपनी मस्ती में जीवन जी रहा था। लेकिन एक शाम भारतीय प्रधानमंत्री के कोरोना वायरस से सम्बन्धित राष्ट्र के नाम सम्बोधन ने भारत को गम्भीर ही नही बल्कि एकजुट भी कर दिया। दरअसल जब से नोटबन्दी का सम्बोधन प्रधानमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के द्वारा किया है, तबसे भारत का हर आम और खास प्रधानमंत्री के प्रेस कॉन्फ्रेंस और उसमें की गई घोषणाओं के प्रति संजीदा रहता है।


जब प्रधानमंत्री ने लोगों से रविवार को घर से बाहर न निकलने और उसी शाम ताली-थाली-घण्टी बजाने की अपील की तो कथित राजनीतिक विरोधी एवं उन विरोधियों के समर्थकों ने बहुत तरह से अपील को खारिज कर दिया। सोशल मीडिया पर मामले को खूब ट्रोल किया। कहीं न कहीं मुझे भी शक था कि कोरोना के कहर से जूझ रहे विश्व को नजरअंदाज कर कुछ दिन पहले होली की मस्ती में डूबे लोगों से प्रधानमंत्री ने ये कैसी अपील की है! ये लोग नही मानेंगे। और खासकर इस समय ऐसी भयावह परिस्थिति में ताली-थाली-घण्टी बजाने की अपील तो कत्तई नही मानेंगे। लेकिन फिर रविवार को सुबह से ही पूरे भारत मे जो नज़ारा दिखा वो नमन करने योग्य था। कुछ जरूरतमंद और जिम्मेदारों को छोड़कर भारत अपने किवाड़ों में बन्द था। सभी भारतीयों ने जनता कर्फ्यू का पालन कर पूरे विश्व को ये संदेश दिया कि हम भारतीय सिर्फ वायरस से लड़ने के लिए एकजुट ही नही बल्कि अपने राष्ट्र प्रधान एवं राष्ट्र के प्रति पूर्णतया समर्पित हैं। दिन ढलने के साथ ही इस बात पर मुहर लग गयी कि जनता कर्फ्यू महज एक जबरदस्ती थोपा गया आदेश मात्र नही था। देशवासियों ने इसे सहजता से स्वीकार किया था। इस बात की पुष्टि सभी स्थानों से आ रही ताली, थाली, घण्टे-घड़ियाल, शँख आदि की आवाजों ने की। इस सन्नाटे और बोझिल माहौल को समाप्त करते हुए इन ध्वनियों ने स्पष्ट कर दिया कि हम एकजुट है, और मन से एकजुट हैं।



एक वायरस के खिलाफ ही सही लेकिन एक बार फिर विश्व ने वो भारत देखा जो वास्तव में भारत है। जहाँ एक ओर विश्व के तमाम देशों को इस स्थिति से निपटने के लिए सेनाएं लगानी पड़ रही हैं वहीं भारतवासी अपने राष्ट्र प्रधान की एक आवाज पर एकजुट है। और सही मायने में कोरोना या इस जैसे और भी राष्ट्र विरोधी कई तत्वों पर हमारी यही असली जीत है कि हर स्थिति में हम राष्ट्र के साथ खड़े हैं।



इस एक दिन के जनता कर्फ्यू ने भारत को और भी बहुत कुछ एहसास दिलाया है। व्यस्त भारत ने एक दिन जब अपने परिवार और सगे सम्बन्धियों के साथ बिताया तो पता ही नही चला कि एक दिन कैसे बीत गया। बच्चों को माता-पिता, दादा-दादी एवं अन्य सदस्यों का प्यार एक साथ मिला। एक दूसरे के सुख-दुख लोगों ने सुने। कई लोगों ने धार्मिक एवं साहित्यिक पुस्तकें पढ़ कर समय बिताया तो कुछ लोग बागबानी या घर के अन्य कार्यो में व्यस्त रहे। वहीं शाम को जहाँ बड़े-बुजुर्गों ने शंखनाद किया वहीं बच्चों के हिस्से में थाली-चम्मच और घण्टी आयी। हर व्यक्ति अपने कार्यों में व्यस्त और मस्त था। मुहल्ले के कई घरों से चम्मच द्वारा थाली बजाने की आवाज साफ-साफ सभी जगह सुनी गई। सालों पहले भोजन के समय चम्मच से बजाई जाने वाली जो थाली छीन ली जाती थी, वही थाली आज बच्चों को चम्मच के साथ सहर्ष प्रस्तुत की गई।



ख़ैर…
दुनिया मे तबाही मचा चुके इस आतंक रूपी वायरस का अंत भारत मे निश्चित है, इसका अंदाजा भारत के ताजा हालातों से लगाया जा सकता है। ताजा स्थितियों के अनुसार यदि भारत के प्रधानमंत्री को ऐसा लगता है कि, जनता कर्फ्यू की अवधि और बढ़ाई जाए, तो कुछ मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के बाद इस अवधि को सरकार थोड़ा और बढ़ा सकती है। इसमें भारतवासी सहयोग करेंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है। क्योंकि किसी गीत में एक पंक्ति आती है “ये भारत है, भारतवासी हर जान की कीमत जानते हैं” और ये सच है कि भारतवासी हर जान की कीमत जानते हैं।

*दीपक अवस्थी ‘बंसीधर’
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश


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