Wednesday 21st April 2021

कोरोना को गांवों तक पहुंचने से रोकना होगा

कोरोना को गांवों तक पहुंचने से रोकना होगा

लेख*सौरभ जैन

इस समय दुनिया जिस महामारी के संकट से जूझ रही है भारत भी इससे अछूता नहीं है। राष्ट्र के नाम संदेश में प्रधानमंत्री ने भी सोशल डिस्टेंसिंग को सबसे जरूरी माना था। विश्व के आंकड़े बताते है कि इस महामारी ने कितनी तेजी से लोगों को संक्रमित किया है। दुनिया के विकसित राष्ट्र स्वास्थ्य संसाधनों की संपन्नता के बाबजूद इस महामारी को रोकने में विफल रहे है। लॉकडाउन की मंशा यहीं है कि यह संक्रमण अधिक लोगों में न फैल पाए और संक्रमण फैलने की कड़ी टूट जाए। इसके लिए जनता की भागीदारी सुनिश्चित होना अति आवश्यक है। देश की स्वास्थ्य सुविधाओं, चिकित्सकों एवं संसाधनों की कमी के चलते भी नागरिकों को यह बात समझनी बेहद जरूरी है। यदि यह संक्रमण गांवों तक पहुंच गया तो हालात सम्हालने बेहद मुश्किल हो जाएंगे।


चिकित्सकों की कमी

भारत में चिकित्सकों की कमी से इंकार नहीं किया जा सकता, शहरों की अपेक्षा गाँवो की स्थिति अत्यधिक दयनीय हैं। शासकीय अस्पतालों में तो चिकित्सकों की कमी एक प्रमुख समस्या है ही किन्तु निजी अस्पताल भी चिकित्सकों की कमी का सामना कर रहे हैं। विदेशी संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में छह लाख से भी अधिक चिकित्सकों की कमी का अनुमान लगाया गया है। निर्धन नागरिको की निर्भरता शासकीय अस्पतालों तक ही सीमित होती है, निजी अस्पतालों में होने वाले व्यय का वहन न कर पाने की क्षमता के चलते वें सरकारी अस्पतालों पर आश्रित रहते है। देश के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 28 राज्यों और नौ केंद्र शासित प्रदेशों में मानकों के मुताबिक कुल 22496 विशेष चिकित्सक होने चाहिए। ये चिकित्सक सर्जन, प्रसूति एवं स्त्री रोग, बाल रोग आदि वर्ग के हैं। परन्तु चौंकाने वाली बात यह है कि जितने विशेषज्ञ चिकित्सकों की आवश्यकता है, उतने पद ही स्वीकृत नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों की माने तो विशेषज्ञ चिकित्सकों के कुल 13635 पद ही सृजित हैं। इसकी तुलना में सिर्फ 4074 चिकित्सक ही कार्यरत हैं। यानी 10051 पद आधिकारिक रूप से रिक्त हैं। इस प्रकार अपेक्षित चिकित्सकों के आंकड़े से तुलना करने पर पता चलता है कि चिकित्सक और जनसंख्या के मानक के अनुसार 18422 विशेषज्ञ चिकित्सकों की आवश्यकता है।



सदन में एक प्रश्न का उत्तर देने के दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने बताया था कि 31 दिसंबर 2018 तक भारत में राज्य चिकित्सा परिषद के अंतर्गत कुल 1146044 एलोपैथी चिकित्सक पंजीकृत हैं। इसमें से 80 प्रतिशत उपलब्धता के पैमाने से अनुमान लगाया जाये तो 9.17 लाख चिकित्सक ही कार्यरत हैं। आंकड़ों के आधार पर 1472 नागरिकों पर मात्र एक चिकित्सक की उपलब्धता हैं। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन एक हजार व्यक्तियों पर कम से कम एक चिकित्सक के मानक की बात करता हैं। एलोपैथी चिकित्सकों के अतिरिक्त देश में 7.63 लाख आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी डॉक्टर भी हैं। इनकी भी 80 प्रतिशत उपलब्धता की बात को स्वीकार किया जाये तो अनुमान है कि लगभग 6.10 लाख आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी (आयुष) चिकित्सक सक्रिय सेवा में मौजूद हैं।


स्वास्थ्य के प्रति नागरिकों की सजगता

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि देश की आबादी का कुल 3.9 प्रतिशत यानी 5.1 करोड़ भारतीय अपने घरेलू बजट का एक चौथाई से ज्यादा खर्च अपने इलाज पर ही करते हैं, जबकि श्रीलंका में ऐसी आबादी महज 0.1 प्रतिशत, ब्रिटेन में 0.5 फीसदी, अमेरिका में 0.8 फीसदी और चीन में 4.8 फीसदी है।भारत में लगभग 23 करोड़ लोगों को वर्ष 2007 से 2015 के दौरान अपनी आय का 10 फीसदी से अधिक पैसा इलाज पर खर्च करना पड़ा। भारत में स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च का 67.78 फीसदी खर्च नागरिकों की जेब से होता है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा मात्र 17.3 प्रतिशत है। यह रिपोर्ट तो इस बात को भी स्वीकारती है कि देश में पूरी जनसंख्या का आधा हिस्सा ऐसा है, जिनके पास स्वास्थ्य सेवा नहीं पहुंच पाती है। चिकित्सकों की अनुपलब्धता एवं स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में छोटी सी बीमारी गम्भीर रोग का रूप धारण कर लेती हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में दाई द्वारा घर पर ही प्रसूति के मामले देखे जाते है। स्वास्थ्य केंद्र या तो हैं नहीं और जहां हैं वहां चिकित्सक न होने से मरीज को शहर ही रेफर किया जाता है। ऐसे में कोरोना संक्रमण की स्थिति में स्थिति को कैसे नियंत्रित किया जा सकेगा?


सेवारत चिकित्सकों पर कार्यभार

चिकित्सकों की कमी उपलब्ध चिकित्सकों के कार्यभार में वृद्धि करने का कार्य करती है। चिकित्सकों की संख्या में तो कमी बनी हुई है किंतु मरीजो की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में उपलब्ध चिकित्सक कार्यभार के बोझ तले दबे हुए है। नतीजा यह हैं कि भारत में चिकित्सक औसतन महज दो मिनट ही अपने मरीजों को देखते हैं। इस बात की पुष्टि भी एक वैश्विक अध्ययन में की गई है। अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया के 15 देश जहां विश्व की आधी आबादी निवास करती है, वहां प्राथमिक चिकित्सा परामर्श पांच मिनट या इससे भी कम होता है। ब्रिटेन की चिकित्सा पर आधारित पत्रिका ‘बीएमजे ओपन’ के अनुसार भारत में प्राथमिक चिकित्सा परामर्श का समय 2015 में दो मिनट था, जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान में 2016 में यह महज़ 1.79 मिनट का रहा हैं।


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जब ग्रामीण भारत के सुदूर क्षेत्रों में डिग्रीधारी योग्य चिकित्सकों की उपलब्धता नहीं हो पाती हैं तो इस स्थिति का अयोग्य चिकित्सक अपने लिए एक अवसर के रूप में उपयोग करते है। आम बोलचाल की भाषा में कहा जाए तो चिकित्सकों की कमी का सर्वाधिक लाभ दूरदराज के इलाकों में रहने वाले झोला छाप चिकित्सक उठाते हैं। वर्ष 2016 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में एलोपैथिक चिकित्सक के रूप में प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों में एक तिहाई ऐसे हैं, जिनके पास नागरिकों का इलाज करने के लिए डिग्री ही नहीं है। बावजूद इसके वेें लोग इलाज कर रहे हैं। जब कभी इलाज में लापरवाही के दौरान किसी मरीज की मृत्यु हो जाती है तब प्रशासन क्लीनिक सील कर देने की कार्यवाही कर अपने दायित्वों से इति श्री कर लेता है क्योंकि हमारी व्यवस्था हादसों के उपरांत ही जाग्रत अवस्था में आती है। ऐसे चिकित्सक सक्रिय रूप से मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहें है। नागरिकों के पास तो इसके अतिरिक्त विकल्प भी नहीं हैं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10 लाख 41 हजार पंजीकृत चिकित्सक थे। इनमें सरकारी अस्पताल में सेवाएं देने वाले चिकित्सकों की संख्या एक लाख 20 हजार थी। शेष चिकित्सक निजी अस्पतालों अथवा निजी क्लीनिक में लोगों का इलाज करते हैं।


ग्रामीण क्षेत्र और स्वास्थ्य सुविधा

सरकार अस्पतालों में रिक्त पदों पर भर्ती के लिए विज्ञप्ति भी निकालती है किंतु निजी क्षेत्रों में संभावनाओं के चलते युवा चिकित्सकों का रुझान शासकीय अस्पतालों में सेवा देने में नहीं हैं। कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश सरकार ने एमबीबीएस चिकित्सकों की भर्ती हेतु विज्ञापन जारी किया था, वेतन में भी वृद्धि की गई किन्तु प्राप्त आवेदनों की संख्या रिक्त पदों की संख्या से कम थी। एक बड़ा कारण यह भी हैं कि सुविधाओं के अभाव वाले ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सक सेवा देना पसंद ही नहीं करते। इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार और भारतीय चिकित्सा परिषद को सुझाव दिया है कि सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षित डॉक्टरों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा (कुछ समय तक) को अनिवार्य किया जाए। कई राज्यों ने सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षण के पश्चात् ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने की अनिवार्य शर्त (बांड के रूप में) लागू की थी। इनमें आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य हैं। परन्तु राज्य सरकारों के इन नियमों को अदालत में चुनौती दी गई। इस पर उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि देशभर के डॉक्टर जो परा-स्नातक और सुपर स्पेशयलिटी मेडिकल कोर्स में दाखिला लेंगे वह उनके द्वारा निष्पादित अनिवार्य बॉण्ड (प्रवेश के समय स्वीकृत) से बंधे होंगे। अनिवार्य सेवा सार्वजनिक हित में है और समाज के वंचित वर्गों के लिये लाभकारी है।



ज्ञात रहे कि शहरी क्षेत्रों में प्रति 1 लाख लोगों के लिये 176 चिकित्सक हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 1 लाख लोगों के लिये मात्र आठ से भी कम चिकित्सक उपलब्ध हैं और हर साल भारत में 269 निजी और सरकारी मेडिकल कॉलेजों से लगभग 31,000 चिकित्सक स्नातक करते हैं।
यह तमाम चुनौतियां इस देश की नागरिक स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है। जब हम अपनी इन समस्याओं से सीमित संसाधनों के माध्यम से लड़ रहे है तो नागरिकों को समझना होगा कि कोरोना संकट की इस स्थिति में वे अपने घरों में ही रहे। यह नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करने का समय है ताकि इस संक्रमण की कड़ी को तोड़ा जा सके। अन्यथा मरीजों की बढ़ती संख्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था एवं संसाधनों के लिए प्रतिकूल साबित होगी।

*सौरभ जैन
(लेखक-सामयिक विषयों के जानकार हैं)


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