Wednesday 21st April 2021

कोरोना ने बदले सामाजिक दृष्य

कोरोना ने बदले सामाजिक दृष्य

लेख*संदीप सृजन

दुनिया का दृष्य बदल गया है। कोरोना के कहर ने आधुनिकता की कमर तोड़ कर रख दी है। जो लोग पैसा पाने के लिए दौड़ लगा रहे थे वे आज अपनी जान बचाने के लिए घरों में है। जो परिवार को समय नहीं दे पा रहे थे वे चौविसों घंटे परिवार के साथ है। जो पड़ोसियो से कभी नहीं मिले वे एक दुसरे का हाल पुछ रहे है। दूर के रिश्तेदार जिसने बात करे बरसो हो गये उनसे सौहार्द पूर्वक कुशल क्षेम पुछी जा रही है। जिन्होंने कभी मानव सेवा के कार्यों में अपना योगदान नहीं दिया वे वक्त की नजाकत को देखते हुए आगे आकर सेवा दे रहे है। जिस पुलिस का खौफ ही लोगों के बीच था वही पुलिस सेवा कार्यो में दिन रात लगी हुई है। जिसे आधुनिकता की चकाचौंध में आप और हम ओल्ड मानसिकता का जुमला देते आ रहे थे, वही ओल्ड मानसिकता आज करोना महामारी के दौर में गोल्ड बन गई है।



कोरोना के कारण आज पुरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ है। लॉकडाउन कर इससे बचाव के प्रयास जारी है। कोरोना से बचाव के तरीको और लॉकडाउन के कारण हमारी जीवन शैली में एक बड़ा परिवर्तन आया है। आज कारोबार, कार्यालय, शिक्षा ,चिकित्सा हर क्षेत्र में, हर कोई इस महामारी के बाद दुनिया के बदलावों के अनुरूप ढल रहा है। कोरोना ने समाज के रहन-सहन, खान-पान के ढंग, सामाजिक व्यवहार हर जगह एक बड़ा परिवर्तन ला दिया है।
सामाजिक जीवन में दो गज की दूरी और घर से बाहर न निकलने के सरकारी अनुरोध को जनता समझ रही है और इसका पालन भी कर रही है। कोरोना की वजह से बदलते हालात में मास्क भी हमारे जीवन का हिस्सा बन रहा है। स्वच्छता के प्रति जो हमारी उदासीनता थी वह दूर हो गई। आज हर कोई किसी भी काम को करने के पहले और बाद में हाथों की सफाई पर ध्यान दे रहा है। सार्वजनिक स्थलों पर थूकने जैसी लोगों की तमाम आदतों में भी बदलाव आया है। लोग समझने लगे है जान है तो जहान है।



लॉकडाउन के दौरान शहरों और गांवों में जन सहयोग से स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा जरूरतमंद लोगो तक दवाई और खान पहुंचाने का बीड़ा उठाया गया और मानवता के इस काम को भारतीय संस्कृति के अनुरूप करके दिखाया गया। जो कि देश के लिए और हमारे मनुष्य समाज के लिए गर्व की बात है। यह व्यवस्था मनुष्य को मनुष्य से जोड़ रही है। बिना किसी भेद भाव के लोग निस्वार्थ भाव से एक दुसरे के प्रति समर्पित हो कर सेवा दे रहे है। पूरे देश में, गली-मोहल्ले में, जगह-जगह पर आज लोग एक-दूसरे की सहायता के लिए आगे आए हैं। धन से बड़ी मानवता है इस बात को लोग आधुनिकता की चकाचौंध में भूल रहे थे। वो फिर याद आ गई है।



देश जब एक टीम बनकर काम करता है तब क्या कुछ होता है, ये अनुभव सामने आ रहे हैं। आज केंद्र सरकार हो, राज्य सरकारें हो, इनका हर एक विभाग और संस्थान राहत लिए मिलजुल कर पूरी स्पीड से काम कर रहे हैं। डॉक्टर हो , पुलिस हो, प्रशासनिक लोग हो, एवियेशन सेक्टर में काम कर रहे लोग हों, रेलवे कर्मचारी हों, ये दिन रात मेहनत कर रहे हैं ताकि देशवासियों को कम से कम समस्या हो। और इस महामारी से जल्दी छुटकारा मिल सके। आज हर कोई बस यही सोच कर काम कर रहा है कि हम रहे या न रहे ये देश रहना चाहिए। देश सुरक्षित रहे लोग सुरक्षित रहे इस के लिए हर कोई समर्पित हो कर सेवा दे रहा है।



किसान इस महामारी के बीच अपने खेतों में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और इस बात की भी चिंता कर रहे हैं कि इस देश में कोई भूख न सोए। कोई किराया माफ कर रहा है, तो कोई अपनी पूरी पेंशन या पुरस्कार में मिली राशि को पीएम केयर्स में जमा करा रहा है। कोई खेत की सारी सब्जियां दान दे रहा है तो कोई हर रोज सैकड़ों गरीबों को मुफ्त में भोजन करा रहा है। कोई मास्क बना रहा है, कहीं हमारे मजदूरो भाई बहन क्वारंटाइन में रहते हुए जिस स्कूल में रह रहे हैं, उसकी रंगाई-पुताई कर रहे हैं। दूसरों की मदद के लिए आपके भीतर हृदय के किसी कोने में जो ये उमड़ता-घुमड़ता भाव है ना। वही कोरोना के खिलाफ भारत की इस लड़ाई को ताकत दे रहा है। हर कोई अपने सामर्थ्य के हिसाब से इस लड़ाई को लड़ रहा है। प्रधानमंत्रीजी के शब्दों में कहे तो शहर हो या गांव, ऐसा लग रहा है, जैसे देश में एक बहुत बड़ा महायज्ञ चल रहा है, जिसमें हर कोई अपना योगदान देने को आतुर है।



सेहत के लिए योग से होने वाले लाभ को देखकर ही दुनिया ने इसे अपनाया और अब उसी प्रकार कोरोना महामारी के वैश्विक संकट के दौरान भारत के सदियों पुराने आयुर्वेद के सिद्धांतों को भी अपनाया गया जा रहा है। यह आयुर्वेद के विश्वव्यापी प्रसार करने का सुअवसर हमारे बीच है। दुनिया ने योग की तरह ही आयुर्वेद को भी अब सम्मान के भाव से देखना शुरु कर दिया है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम प्राचीन पारंपरिक ज्ञान की परंपराओं को नकारने लगे थे वो पुनः स्वीकार करने का यह समय है। सैकड़ों साल की गुलामी के कारण हमने जो खो दिया उसे पाने का यह एक अवसर हमारे बीच आया है। पुरी दुनिया को आज भारत से ही उम्मीद की किरण आती दिखाई दे रही है। तो हमारा भी दायित्व बनता है कि एक बार हम अपनी उन परम्पराओं को अपनाए, उस संस्कृति को अपनाए जिसका उद्देश्य सिर्फ यही रहा – सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ “सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।”
कोरोना के कारण जो बदलाव समाज और हमारी रफ़्तार से चलती जीवन शैली में आए है वे कोरोना के जाने के बाद भी हमारे जीवन में बने रहे तो भविष्य में कोई भी जैविक हमला हमारे ऊपर सफल नहीं होगा यह तय है। हम विचारों से आधुनिक बने लेकिन संस्कारों से पुरातन रहे यही आने वाले समय की मांग है।


*संदीप सृजन
संपादक-शाश्वत सृजन
ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन (म.प्र.)
मो. 9406649733
मेल- sandipsrijan.ujjain@gmail.com




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