Wednesday 21st April 2021

भारत को कब्रिस्तान बनाने की चाह रखने वाले साद की जगह जेल ही है ?

क्या मकसद है तबलीगी जमात का?

क्या मकसद है तबलीगी जमात का?

लेख*आर.के. सिन्हा

देश को कमबख्त कोरोना वायरस के जाल में फंसाकर भारी नुकसान पहुंचाने की कथित रूप से साजिश रचने वाला तबलीगी जमात का नेता मौलाना साद कांधलवी का सारा गंदा खेल अब दुनिया के सामने रोज ही खुलकर आ रहा है। अपने को इस्लाम का विद्वान बताने वाला मौलाना साद तो भ्रष्टाचार और देश विरोधी हरकतों में आकंठ डूबा हुआ साबित हो रहा है। वह धर्म प्रचार और इस्लामिक कट्टरवाद फ़ैलाने के नाम पर बड़े पैमाने पर विदेशो से हवाला के जरिये पैसा जुटाता था। अब उसकी औकात पता चल गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने निजामुद्दीन मरकज के तबलीगी जमात के नेता मौलाना साद कांधलवी और प्रबंधन कमेटी पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। उस पर आरोप हैं कि उसे जो धन हवाला के जरिए मिलता था उसके के एक भाग का इस्तेमाल तो निजामुद्दीन इलाके में नई मस्जिदों क बनाने और उन्हें भव्य करने पर होता था, शेष धन से वह और उसके करीबी चेले अय्याशी करते थे। अब तो उसके सारे काले चिट्ठे खुल कर रहेंगे।



सबसे गौर करने लायक बात यह है कि अगर वह सच में दूध का धुला होता तो पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देता। पर वह तो फरार है। क्या किसी धार्मिक नेता से इस तरह की अपराधियों वाली हरकत की उम्मीद की जानी चाहिए? पर वह तमाम गंदे खेल खेलने के बाद भी मुसलमानों की आंखों में धूल झोंककर तबलीगी मरकज का एकछत्र नेता बना हुआ था। मौलाना साद जैसे लोग मुस्लिम समाज के सबसे हानिकारक तत्व हैं। क्योंकि इनकी दीक्षा समाज को पीछे ले जाने वाली है। इस्लाम की मूलभूत शिक्षा के विपरीत है ऐसा इस्लाम के जानकर विद्वान बताते हैं। निजामुद्दीन जमात के दौरान इन जैसे मौलानाओं ने तमाम पाखंडी तकरीरें की कुछ वीडियो यू-ट्यूब पर सामने आये हैं। आशंका के मुताबिक़ ही साद कोरोना से बचाव के लिए सरकार का सहयोग करना तो दूर, तमाम अंध विश्वास फैलाता रहा। जिसके कारण तमाम जमातियों को कोविड-19 का संक्रमण हो गया है। उसकी इस अक्षम्य हरकत से इस महामारी से लड़ने की पूरी मुहिम को बड़ा आघात पंहुचा है। मौलाना साद में इतनी भी हिम्मत नहीं है कि सामने आकर देश से अपनी चूक और मूर्खता के लिए माफी मांगे। दरअसल वह तो देश का शत्रु नंबर वन बनकर उभरा है। उसी की देखरेख में निजामुद्दीन मरकज में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो भारत में कोरोना का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बना। इसमें देश और दुनिया के हजारों जमाती आए। कोई कहता है, बारह हजार तो कोई सात हजार । उनमें से सैकड़ों की संख्या में कोरोना संक्रमित पाए गए। उनमें से दर्जनों कोरोना वायरस के कारण संसार से कूच भी कर गए। लेकिन, मौलाना साद तो खुलेआम कहता रहा कि कोरोना से मरना ही है तो मस्जिद से बेहतर कोई जगह ही नहीं हो सकती। यह उसकी मूर्खता थी या देशभर में कोरोना फ़ैलाने की सोची सा झी योजना? यह तो अनुसन्धान से ही पता चल सकेगा।



बहरहाल, साद पर मनी लॉन्ड्रिंग के केस दर्ज होने से पहले गैर इरादतन हत्या का मामला और आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज किया ही जा चुका है। तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों में से कईयों के कोरोना वायरस से मौत बेहूदा हो जाने के बाद पुलिस ने यह कदम उठाया था। साद इतना नीच किस्म का इंसान है कि कोरोना वायरस पर काबू करने के लिए सामाजिक दूरी संबंधी सरकार के दिशानिर्देशों की अनदेखी करते हुए उसने निज़ामुद्दीन मरकज़ में अपने चेलों को संक्रमण के परवान चढ़ने के बाद पूरे देश और विदेशों से भी बुलाया। मुझे यहां पर कहने दें कि जब धूर्त साद अपना कोरोना संक्रमण वृद्धि का कार्यक्रम चला रहा था, तब तक दिल्ली की कश्मीरी गेट स्थित शिया जामा मस्जिद को नमाजियों के लिए बंद कर दिया गया था। इसके इमाम मौलाना मोहम्मद मोहसिन तकी कहते हैं कि हमने केन्द्र सरकार के निर्देशों का पालन करते सबसे पहले कोरोना वायरस से बचाव के लिए इस मस्जिद में नमाजियों के आने पर रोक लगा दी थी, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग की जा सके। फिलहाल इस मस्जिद में सिर्फ इमाम और मुइज्जिन ही नमाज पढ़ रहे हैं। इधर मुइज्जिन लाउड स्पीकर पर अजान तक नहीं देते। क्या ये मुसलमान नहीं है? शिया जामा मस्जिद की तरह दिल्ली एतिहासिक जामा मस्जिद को भी सोशल डिस्टेनसिंग के नियम का पालन करते हुए नमाजियों के लिए बंद कर दिया गया था। तब से इधर पांचों वक्त की नमाज सिर्फ इमाम साहब और मस्जिद के मुइज्जिन वगैरह ही पढ़ते हैं। यहाँ तो 25 जुलाई, सन 1657 से लगातार दिल्ली वाले नमाज पढ़ रहे थे। उस दिन दिल्ली ईद उल जुहा मना रही थी। उस पवित्र दिन जामा मस्जिद में पहली बार नमाज़ पढ़ी गई थी। पर साद के इरादे इन दोनों तारीखी मस्जिदों की तरह से नेक कहां थे? वह तो भारत को कब्रिस्तान में बदलना चाह रह था। जिस धरती में उसका जन्म हुआ उसे ही वह क्षति पहुंचा रहा था।



अब एक बात मान ही लीजिए कि अब ईडी की कार्रवाई के बाद मौलाना साद पर कायदे से शिकंजा कस गया है। अब उसे कोई बचा नहीं सकता। वह देशहित में और देश के बीस करोड़ मुसलमानों के हित में बचना भी नहीं चाहिए। इस तरह के पापियों को कठोर सजा मिले तो ही अच्छा होगा। इस देश में साद जैसे इंसान की जगह सिर्फ जेल ही हो सकती है। वह अपने चेलों को अंधकार के घने बियाबान में धकेलता जा रहा था। उसने कभी भी यह कोशिश नहीं कि तबलीगी मरकज से जुड़े लोग आधुनिक शिक्षा से रूबरू हो या रोशन ख्याल बनें। साद का तो एक ही लक्ष्य था अपने चेलों को अंधेरे में रखना। उसमें वह सफल भी हो रहा था। अफसोस होता कि कि इतने बदबूदार इंसान के लिए भी कई कथित ज्ञानी लोग भी सामने आने लगते हैं। मोम्मट्टी ब्रिगेड भी इस राष्ट्रद्रोही के विरुद्ध चुप्पी साधे हुए है । धिक्कार है उनकी शर्मनाक हरकतों पर। इनमें अनेकों बड़े राजनेता भी शामिल हैं ।



अफसोस इस बात का भी कम नहीं है कि जिस तबलीगी जमात पर अल कायदा जैसे खूंखार आंतकी संगठन से संबंधों के भी आरोप लगते रहे हैं, वह भारत में बिना किसी रोक-टोक के अपने पैर पसारे जा रहा था। अमेरिका पर हुए 9/11 आतंकी हमले में शामिल अल कायदा के कुछ आतंकियों के भी तबलीगी जमात से संबंध मिले थे। विगत में तबलीगी जमात के कई सदस्य आतंकवादी गतिविधियों में भी पाए जाते रहे हैं। लन्दन के मेट्रो ब्लास्ट में भी शामिल आतंकवादियों में भी जमती शामिल थे। वैसे जानने वाले तो यह भलीभांति जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश की तबलीगी जमातें भारत में जिहाद फैलाने की कोशिश करती रही हैं। यह भी कहा जाता है कि हरकत-उल-मुजाहिदीन के भी तार तबलीगी जमात से जुड़े रहे हैं। भारत भूला नहीं है कि हरकत-उल-मुजाहिदीन ने ही 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण किया था। साद के बारे में पता चल रहा है कि उसकी तबलीगी जमात से अच्छी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान भी जुड़े हुए हैं। निजामुद्दीन मरकज में अनेकों रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठिये शामिल हुए थे, जिनकी तलाश हो रही है। यानी कोरोना वायरस फैलाने के क्रम में शातिर साद अब फंस गया है। अब उसकी जगह तो जिन्दगी भर जेल ही होनी चाहिए।

*आर.के. सिन्हा
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)



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