Saturday 25th September 2021

मां की अंगुली पकड़ कब तक चलोगे लल्ला

व्यंग्य*सुशील कुमार 'नवीन'

हर बात किसी के कहे अनुसार ही कहते हो क्या? बिना किसी के कहे थाली में परोसा भोजन खाते नहीं हो क्या? सांस भी शायद कोई कहता हो तब ही लेते होगे। मां ने एकबार चलना सिखा दिया था, जिंदगी भर अपनी अंगुली पकड़कर थोड़े ही चलाएगी। और मान भी ले कि मां तो अपनी अंगुली तुम्हें जिंदगी भर चलने के लिए थमा देगी पर तुम क्या उसे पकड़ कर चल पाओगे।आप भी सोचते होगे कि आज यह मैं क्या विषय लेकर बैठ गया। वजह भी कुछ अजीब सी है। हमारे एक पड़ोसी हैं झल्लन जी। वाकपटुता रक्त संचित है। मुद्दा कुछ भी हो उस पर चर्चा करने के लिए उनके पास पूरा समय है। लोकडाउन में आजकल कुछ राहत मिली हुई है। इसका वो भी भरपूर फायदा उठा रहे है। मास्क लगा जब भी मौका मिलता है। तफरी को निकल जाते हैं। दोपहर को घर के आंगन में खड़ा था। इसी दौरान उनका भी गली से निकलने का संजोग बन गया। वो बाजार की तरफ से आ रहे थे। हाथ में एक बड़ा सा तरबूज लिए हुए थे।



नजरें मिली तो राम-राम होना स्वभाविक ही था। मैंने भी औपचारिक रूप से पूछ लिया कि दोपहर में कहां भटकते फिर रहे हो। घर पर टिके रहा करो। नहीं तो कोरोना मरीजों की हालत का पता होगा ना। न खुद को कहीं जाने देंगे। न किसी को पास आने देंगे। भटकना परमानेंट भूल जाओगे। मेरी बात सुन वो मुस्कराए और बोले-सारी बातों का पता है शर्मा जी।तभी तो देखो। मजाल है कि पिछले 40 दिनों से बाहर निकले हो।ये तो अब छूट मिल गई है। थोड़ा टहल आते हैं। पर मुझे नहीं लगता कि ज्यादा दिन ऐसा हो पाएगा।
मैंने कहा- क्यों क्या हो गया ऐसे। कोई दिक्कत हो रही है क्या? गम्भीरता दिखाते हुए बोले-हमें तो क्या दिक्कत होगी पर जो ये मेरे जैसों की भीड़ बाहर दिख रही है वो भविष्य बिगाड़ने वाली है। कहीं बाहर निकलना परमानेंट न बन्द करा दे। सरकार ने छूट देकर गलत काम किया है। अभी कुछ दिन और सख्ती से लोकडाउन को लागू रखे जाना था। अब अपनी बारी थी। उपदेश भी वो दे रहे थे जिनके पैर घर पर टिकते ही नहीं। मतलब गुड़ खाने वाले गुड़ियानी से परहेज की बात बता रहे थे। मैंने कहा कि तो आप बताओ क्या होना चाहिए। बोले- अभी एक महीना और सख्ती होनी चाहिए। इससे हम और सुरक्षित रह पाएंगे। बाजार खुल गए हैं। लोग आ जा रहे हैं। इससे तो संक्रमण बढ़ेगा ही। सरकार को ये ढिलाई महंगी पड़ सकती है।



मैंने कहा तो अब आप मेरी बात सुनिए। फिर बोलना। सरकार ने आपको बीमारी की भयावहता से अवगत करा दिया है ना। इससे बचाव के लिए सोशल डिस्टैंसिंग, हैण्ड सेनिटाइजेशन व मास्क इत्यादि लगाने के बारे में सब समझा दिया है। आपकी गली मोहल्लों को एक बार पूर्ण रूप से सैनेटाइज भी करवा दिया है।यहां तक आपकी दुकानों के आगे निश्चित दूरी के गोले तक बनवा दिए है। अब उन गोलों में सरकार धक्के से आपको खड़ा करे क्या? बीमार होने के बाद की स्थिति भी आप देख हीं रहे हैं। अब जो समझदार हैं, वे अपनी दिनचर्या, काम करने का तरीका समझ लें। सरकार 24 घंटे, 365 दिन चौकीदारी नहीं करेगी और न कर सकती है । सोच समझ कर घर से निकलें एवं काम पर जायें व नियत नियमानुसार हीं अपना कार्य करें ।
आदतन बीच में ही वो फिर बोल पड़े- तो हमें ही सब कुछ करना होगा। सरकार की भी तो कुछ जिम्मेदारी है। सख्ती दिखाए।
मैंने कहा-क्या लगता है आपको, 17 मई के बाद एकाएक कोरोना चला जायेगा, हम पहले की तरह जीवन जीने लगेंगे ? ये वायरस देश में जड़ें जमा चुका है। बचाव के साथ अब हमें इसके साथ रहना सीखना पड़ेगा। हमें स्वयं इस वायरस से लड़ना पड़ेगा, जीवन शैली में बदलाव करना होगा। इम्युनिटी स्ट्रांग करनी होगी।स्वच्छ और शुद्ध आहार लेना होगा। फास्ट फूड, पिज्जा, बर्गर, चाउमीन, मोमोज, कोल्ड-ड्रिंक आदि के स्वाद को भूलना होगा।



कम से कम अगले एक साल तक ये करना पड़ सकता है । तभी हम इससे लड़ पाएंगे। जो खुद को बदल लेंगे वो आगे बने रहेंगे और जो नहीं बदलेंगे, वो खुद तो मरेंगे ही दूसरों की भी मौत का कारण बनेंगे। यह किसी एक आदमी के बस की बात नहीं है। इसके लिए सबको सोचना होगा। विचार करना होगा। मनन करने होगा। जिंदगी जब हमारी है तब उसे बचाये रखना भी हमारी जिम्मेदारी है। अंत में कहा कि मां ने चलना सिख दिया है। अब अंगुली छोड़ खुद चलो। मां की अंगुली कब तक पकड़ कर चलोगे। चलना तो खुद ही पड़ेगा। मेरे इतना कहते ही उन्होंने हाथ जोड़ लिए और बोले-हे करुणानिधि! सब समझ गया। धन्यवाद आपके इस भगवतज्ञान का। आपने मेरी आंखें खोल दी। अब खुद भी इसका पालन करूंगा और औरों को भी टोकूंगा। कहकर घर की तरह निकल गए। प्रवचन लंबा होने के चलते मुझे भी अब एक कप चाय का इंतजार था।
*सुशील कुमार ‘नवीन’,हिसार



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