Tuesday 18th May 2021

मजदूरों का दर्द और हमारी उपेक्षा

मजदूरों का दर्द और हमारी उपेक्षा

लेख**मंदाकिनी श्रीवास्तव

वर्तमान समय में कोरोना का समाचार कहीं निराश करता है, कहीं आशान्वित करता है। इस हताशा निराशा के दौर में ऐसी ख़बर ने भी अपनी जगह बना ली है, जो पीड़ा देती है। हज़ारों लाखों मजदूरों का पलायन जिस तरह बेबसी और दर्द की लंबी कहानी बनता जा रहा है और हमें सोचने के लिए विवश करता है कि चूक कहाँ हो रही है। सबसे बड़े षड्यंत्रकारी और धूर्त वे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने सबसे पहले श्रमिकों को अपनी-अपनी कर्मभूमि से बाहर जाने के लिए प्रेरित किया, स्थानीय मालिकों ने भी इसे और हवा दी। भड़काकर या फिर बलपूर्वक उन्हें मजबूर किया कि वे अपना स्थान छोड़ने के लिए विवश हो चले।



केन्द्र प्रशासन ने इसकी कोई कल्पना नहीं की होगी क्योंकि कभी कभी षडयंत्रों का बाद में पता चलता है, कुछ षड्यंत्र इतने गुप्त तरीके से किये जाते हैं कि अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी जी का सहयोग के लिए सबसे पहले आग्रह था कि जो जहाँ है , वहीं रहे, लेकिन साहब इसे होने कहाँ दिया गया,रात को सोते से जगाकर गुपचुप तरीकों से मजदूरों को नगर से बाहर जिस तरह भेजा गया और किसने इसकी शुरुआत की ,हम सब जानते हैं, इससे उत्पन्न परेशानी का विष शुरुआत में ही कर्मठ योगी जी चुपचाप पी गये,इसके बाद तो मानो यह सिलसिला एक प्रवाह की तरह बह चला। जगह -जगह मजदूर अफ़रा-तफ़री में संक्रमण के ख़तरे को और मजबूत करते चल पड़े, ख़ुद हैरान, परेशान।समझ की कमी और भीड़ में समझ कहाँ होती है। मजदूरों की इस यात्रा की शुरूआत नासमझी और कहीं-कहीं जबरन भी हुई, लेकिन बाद में यह काफिला बढ़ता ही गया और अब लंबे अजगर की तरह पूरे भारत में फैला हुआ है। जब सारा भारत लाक डाउन था तब दोषी वे हैं जिन्होंने उन्हें वहाँ से खदेड़ा,बाध्य किया कि वे अपनी कर्मभूमि और गृहनगर के बीच की दूरी को किसी भी तरह पार करें,तो वे चल पड़े,अब इसके बाद दोषी वे हैं जिन्हें हम राज्य सरकारें कहते हैं ,फिर केन्द्र और राज्य सरकारों में तालमेल की कमी दिखाई देती है।



हज़ारों संस्थाएँ,लेखक,कवि, नेता, कुछ चैनल श्रमिकों के लिए भर -भर के दुख प्रगट करते हैं, उनकी पीड़ा के जो दृश्य नज़र आ रहे हैं, उसे दिखाने , भुनाने में लगे हैं, चाहते हैं कि पीड़ा बनी रहे ताकि दुकान चलती रहे, सरकार को कोसने की। फैक्ट्रियों में जैसे कोई प्रोडक्ट निकलता है,उसी तरह इन श्रमिकों की स्थितियों पर रचित साहित्य का ढेर भी पहाड़ बनता जा रहा है,इस साहित्यिक प्रदूषण की भी चिंता करनी होगी, बहरहाल, सबकी दिनचर्या तय हो चुकी है।वे दिखाते हैं और देश के बड़े-बड़े चिंतिंत लोग मजदूर की चिंता का काम करते हैं। अधिकारी रोज़ आदेश की प्रतीक्षा करते हैं। भई, उन्हें यदि आदेश न मिले तो वे कैसे मजदूरों के जत्थो को पानी पिलाएँ ,खाना खिलवाएँ। आला अफसर तो सबसे बड़े मजबूर हैं, हास्यास्पद लगता है न! सब जानते हुए कि मजदूर चल पड़े हैं डगर-डगर तो फिर राज्य सरकारों और अधिकारियों की अनभिज्ञता समझ में नहीं आती। हर बात पर यही बात उठती है कि ये फैसला ग़लत था, ऐसा करना चाहिए था, ये होता तो वो होता ,वो होता तो ये होता लेकिन इस देश का स्थानीय प्रशासन क्या इतना संवेदनहीन हो गया है कि उसे श्रमिकों की भगदड़ दिखाई नहीं दे रही, पैरों के छालों, तड़पती अँतड़ियों और सूखे कंठों का आभास नहीं हो रहा,क्या यह हम सभी नागरिकों का भी कर्तव्य नहीं बनता कि छोटे-छोटे गाँवों में उन्हें राहत दें।



उत्सवों में यहाँ के नागरिक जिस भक्ति भाव से संगठित होकर जगह-जगह भंडारा करते हैं,क्या उनकी क्रियाशीलता इतनी सुप्त है अभी? वे इतना करने में भी अक्षम हैं अभी कि अपने गांव में एक तंबू तानकर पानी ही पिला दें, ताकि वे आगे का सफर कर सकें। जिन्होंने किया है अब तक ,वास्तव में उसी पुण्य कार्य का संक्रमण फैलने की आवश्यकता है। जब घर में आग लगती है तो आग बुझाना हर सदस्य का कर्त्तव्य बन जाता है,आग लगने के कारण का पता लगाना बाद का काम है।जब नाव में छेद हो तो जीवन बचाने के बजाय लड़ मरें कि छेद हमने नहीं तुमने किया तो जीवन किसी का नहीं बचता। श्रमिकों के किस्से खूब दिखाये जा रहे हैं,दास्ताने-मजदूर में कइयों को दर्द के फोड़े हो रहे हैं, लेकिन ठीक कोई नहीं करना चाहता क्योंकि ख़बरों की, राजनीति की दुकानें बंद हो जायेंगी।



याद है न! वह गिद्ध वाला किस्सा! अफ्रीका में अकाल के समयजब बाहरी फोटोग्राफर को मरती हुई बच्ची के पीछे ताक में बैठे गिद्ध वाली फोटो के लिए बेस्ट फोटोग्राफर का पुरस्कार मिला तो इंटरव्यू के दौरान उनसे पूछा गया कि फोटो खींचने के बाद आपने क्या किया तो उस फोटोग्राफर ने कहा मैं चला आया क्योंकि दस मिनट में मेरी फ्लाइट थी तो इंटरव्यू लेने वाले ने कहा कि उस समय वहाँ दो गिद्ध थे,एक लड़की के पीछे और एक आप,तब फोटोग्राफर की आत्मग्लानि इतनी बढ़ी कि उसने आत्महत्या कर ली। दर्दनाक ख़बरों के दृश्य जनता तक अवश्य पहुँचने चाहिए लेकिन उन ख़बरों में छुपे दर्द की आग में जब निजी या राजनीतिक या व्यावसायिक रोटियाँ सेंकी जाती हैं, तो वह घिनौना हो जाता है। अचानक इन गिद्धों की संख्या बहुत बढ़ी नज़र आ रही है, हमें इनकी पहचान करनी होगी।अपना स्वार्थ साधने वाले इन गिद्धों से श्रमिकों को बचाने के लिए नागरिकों को ही आगे आना होगा, यही एक सकारात्मक समाधान है।

*मंदाकिनी श्रीवास्तव,किरंदुल जिला-दन्तेवाड़ा


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