Wednesday 21st April 2021

मौन आह

कविता*अजयकुमार सिन्हा

अजयकुमार सिन्हा

ये कैसी वीरानी छाई है……
समय, वेग सब रुका पड़ा
खामोशी और मौन है रहा अड़ा
धरती चुप है…
सारा जहाँ भी शांत है
ये कैसी……….
महीनों बीत गए,
उषा की किरणों को छुये…
ठंडी हवाओ की ताजगी को महसूस किये,
चारों दिशाओं को निहारे,
अपनों को नजदीक से देखे,
ये कैसी वीरानी……
घर की चारदीवारी में,
पैर चलकर आते है चौखट तक,
फिर वापस शयनकक्ष की ओर मुड़ जाते है,
रह जाती है सिर्फ मौन सी खामोशी,
ये कैसी वीरानी……
होंठ में खो गए शब्द,
भाव में खो गए स्वर,
सभी स्तब्ध है..
इस सुबह की बेला भी,
लगती है रात की काली स्याही जैसी,
फंस गया समय का रथ कहीं,
बस , रह गई…
सिर्फ मौन आह…



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