Wednesday 21st April 2021

नवगीत : उत्तर-आधुनिकता की चुनौतियाँ

लेख*डॉ. मनोहर अभय

नवगीतों की नव्यता को लेकर आज तरह -तरह के प्रश्न उठाए जा रहे हैं, यों नवगीतों का लेखन जारी है, प्रतिष्ठित रचनाधर्मी और अपने को प्रतिष्ठित करने की कतार में खड़े रचनाकार, जो लिख रहे हैं, उस में नव्यता नहीं, पुनरावृति अधिक है। मानो अपने को दुहरा रहे हों।कथ्य वही जो पिछले तीन दशक से चला आ रहा है। इस बीच हावड़ा ब्रिज के नीचे से न जाने कितना पानी बह चुका है। पर आपद- काल के लिए घड़ों में जमा किया पानी परोसा जा रहा है, पिपासुओं को। दूसरे जो एक ने कह दिया, वही दूसरा कह रहा है।बूढ़ा बरगद, धागों से लिपटा पीपल या वट वृक्ष। प्रतीक और बिम्बों के लिए हैं रथ, रब्बे, बैलगाड़ी, हल- बैल, झील, पोखर, सूखी पगडंडी। अतीत के प्रतिबिम्ब बन कर रह गए हैं, ये सब, पर गीतकारों के पास इनके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। आत्म- मुग्धता में डूबे रचनाकार और उनके प्रिय व्याख्याकार झूम रहे हैं। परवर्ती का काम था स्वीकृत प्रतिमानों और मूल्यों के आधार पर सम्यक मूल्यांकन। पर वे नवगीतों के महिमा- मंडन में रत हैं। व्यस्त हैं, नवगीतों के इतिहास को ताम्रपत्री आलेख बनाने में अथवा गिनाएँगे अपने चहेतों के नाम, ये चहेते या तो उनकी विशिष्ट विचार- धारा के होंगे या उनका यशोगान करने वाले। समालोचना के प्रतिमान और मूल्य भी कम भ्रामक नहीं। ‘रसात्मक वाक्यं काव्यं’ से प्रारम्भ होकर आधुनिकता, तार्किकता, वैज्ञानिकता और भाव- प्रवणता जैसा अंतर्विरोधी भंवर- जाल बुना गया है। नई कविता की तर्ज पर नवगीत का अवतरण हुआ। जरा पूछिए तो नई कवितावादियों से कि वे ‘रसात्मकता, भावप्रवणता, रागात्मकता’ पर नाक मुँह तो नहीं सिकोड़ेंग।|प्रभाकर श्रोत्रिय ने बहुत पहले प्रश्न उठाया था ‘क्या आज के लेखन में, समय और सम्प्रेषण की स्वीकृति तेवर की चुनौती देने वाले गीत लिखे जा सकते हैं या लिखे जा रहे हैं?’ इस प्रश्न का तर्क-सम्मत उत्तर देखने को नहीं मिला। डॉ.रामविलास शर्मा ने नवगीतों को पूरी तरह खारिज कर दिया। खिल्ली उड़ाने में डॉ.नामवर सिंह कौन पीछे थे? हाँ, उनके दीक्षित अवश्य आगे बढे और गुरुमंत्र के अनुसार लिखने लगे (जनवादी) नवगीत। इन ‘दीक्षितों के सृजन में कितनी तार्किकता, वैज्ञानिकता है, सिवाय ऐडम स्मिथ के ‘अर्थशास्त्र’ को रात- दिन कोसने के। तार्किकता-वैज्ञानिकता की आड़ में यथार्थवादी चिंतन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, इनकी सर्जना में।



हर देश का, हर राष्ट्र का अपना साहित्य होता है, जो उस देश के नाम से जाना जाता है जैसे ग्रीक, रूस, अमेरिका, ईरान आदि का साहित्य। आवश्यक नहीं कि जैसा अमेरिका में लिखा जा रहा हो, ठीक वैसा ही इंग्लैंड में भी। यों दोनों की भाषा एक जैसी है। देश विशेष के साहित्य का आधार होता है उसकी संस्कृति, उसका इतिहास, प्रागैतिहासिक अवधारणाएँ, देशज रीति-रिवाज, परम्पराएँ, जीवन-शैली, मूल्य और मान्यताएँ। मिल्टन का ‘पैराडाइस लॉस्ट’ चर्च और राजसत्ता के बीच के संघर्ष का महाकाव्य है। अपनी सर्वोच्चता-प्रभुसत्ता बनाए रखने का संघर्ष। उसकी तुलना रामायण से नहीं की जा सकती। एक सत्ता के लिए लड़ रहा है, जबकि दूसरा मर्यादा की रक्षा के लिए सत्ता को ठुकरा रहा है। कविता या नवगीत के नाम पर आज जो लिखा जा रहा है क्या उस में भारतीय संस्कृति, इतिहास, जीवन- मूल्य, आचार संहिताओं, स्मृतिओं, श्रुतिओं की समृद्ध बौद्धिक सम्पदा का बिम्ब-प्रतिबिम्ब है? देखने में आया है कि ऐसी धारणाओं की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। दूसरी ओर वर्गों में विभक्त है लेखन। दलित-विमर्श, नारी-विमर्श, जन-विमर्श आदि। भारतीय मान्यताओं को साम्प्रदायिकता, कट्टरवादिता या आधुनिकता विरोधी ठहराया जा रहा है।पदार्थ-वादियों के लिए विचार पदार्थ से उत्पन्न होते हैं। यही चिंतन वैज्ञानिकों का है। दृष्ट से परे इनके लिए कुछ नहीं है। वेद- रहस्य में ऋषि श्रीअरविन्द घोष कहते हैं ‘विज्ञान वह ज्ञान है, जो वस्तुओं के सत्य के साथ एक प्रकार की एकता के स्थापन द्वारा चेतना में उन्हें धारण करता है, उनके अंदर प्रविष्ट होता और उन्हें व्याप्त करता है’। जब तक हम इस आधारभूत सत्य को स्वीकार नहीं करते, हमारी सर्जना भारतीय – साहित्य की परिधि से बाहर ही मानी जाएगी।वह किसी की नकल हो सकती है, मौलिक नहीं। सच तो यह है कि आज वैचारिकता और आधुनिकता के नाम पर आयातित विचार- धाराओं को गीत की ग्रंथि में गूँथा जा रहा है। आधुनिकता की अवधारणा यूरोप-अमेरिका के विचारों की देन है। वे चाहे जैक गुड़ी हों, एनरिक डसल, डेविड लौरेंजन, सी.आर.एल जेम्स या एरिक वोल्फ आदि अनेक। उसे भारतीय चोला उढ़ाने के मकसद से डॉ.नामवर सिंह ढूँढ लाए कुमारसम्भवम से ‘पुनर्नवता’ जैसा शब्द। कहने लगे ‘जिसे हम आज आधुनिकता कहते हैं, वह इसी ‘पुनर्नवता’ का दूसरा नाम है और आश्चर्य नहीं कि इसमें किसी-किसी को तथाकथित उत्तर-आधुनिकता का भी पूर्वाभास मिल जाए’ (देखें’अकथ कहानी प्रेम की’–पुरुषोत्तम अग्रवाल)। बड़े लोग हैं, नामवर हैं, क्या कहा जाए? प्रसंग कुछ, विश्लेषण कुछ, पार्वती से मिलने पर भगवान शिव कहते हैं ‘हे सुन्दर अंगों वाली पार्वती! आज से मैं तपस्या द्वारा खरीदा गया तुम्हारा दास हूँ’। यह सुन कर पार्वती ने अपने समस्त तपस्या-जन्य कष्टों को भुला दिया।क्योंकि अभीष्ट की प्राप्ति हो जाने पर क्लेश मिट जाता है और नवीनता (‘पुनर्नवता’)-सी आ जाती है (क्लेश: फलेन हि पुनर्नवता विद्यते) (कुमारसम्भवम-5\86) कौन से क्लेश मिटने पर कविता में ‘पुनर्नवता’ का अवतरण हुआ??



ये आधुनिकता भी कैसी? कैसा वैज्ञानिक सोच है? अरे! आधुनिकता तो उत्तर -आधुनिकता के लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर है। जब उत्तर- आधुनिक कविता हो सकती है तो ‘उत्तर आधुनिक नवगीत’ क्यों नहीं? डॉ.शांति सुमन कहती हैं ‘गीत के दीर्घायु होने का सबसे बड़ा कारण है समयानुकूल होना.. अपने युगबोध के साथ इसमें परिवर्तन के संकेत समाहित होते रहे हैं। अपने समय की परिस्थिति के दबाव के कारण वह विभिन्न मुद्राएँ धारण करता रहा, पर उसका गीत तत्त्व कहीं बाधित नहीं हुआ’। लगता है नवगीत को नई ‘मुद्राएँ’ धारण करने का समय आ गया है। इसे अपनी वर्तमान केंचुली उतार कर, ऐसी देह-यष्टि प्राप्त करनी है जो अधुनातन हो, अभिनव हो रूप-लावण्य, हाव-भाव, ध्वनि, लय, संकेत, भाषा गत गठन आदि सब कुछ अधुनातन,नितांत अभिनव,अर्थात अभी हाल का, नया, ताजा, टटका।ऐसे गीत को, नवगीतों की अग्रिम पंक्ति में प्रतिष्ठित चिंतनशील गीतधर्मी प्रो.राघवेंद्र तिवारी ने ‘अभिनव गीत’ की संज्ञा दी है। सोशल मीडिया में उनके अभिनव गीतों पर गरमा -गरम बहस जारी है। नवगीतों के पुरोधा शीर्ष-बुद्धिजीवी नचिकेता की टिप्पणी द्रष्टव्य है…. …’आपके इन गीतों के शिल्प और संवेदना भिन्न हैं। इन में थोड़ी ताजगी भी है। फिर भी आपको बताना चाहिए कि ये अभिनव गीत किन-किन बिंदुओं पर नवगीत, जनहित और समकालीन गीत से अलग हैं। इन में कहीं समन्वय या समानता के तत्व हैं या ये बिलकुल भिन्न हैं।इनका कोई ऐतिहासिक विकास-क्रम है या नहीं। इनका दार्शनिक आधार क्या है? सब स्पष्ट हो, तो बात या बहस आगे बढे’। अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए प्रो.तिवारी ने कहा ‘दरअसल ये उत्तर नवगीत हैं, इसलिए अभिनव गीत हैं। मैं गीत को समकालीन गीत कतई नहीं मानता। यह शब्द समकालीन स्वयं में ही अपूर्ण और भ्रमित करने वाला है| हमारे यहाँ वामपंथियों की नक़ल करना एक फैशन है|…जनगीत भी वामपंथियों की देन ही है। मेरे अभिनव गीत नि:संदेह एक पृथक तेवर, अंग सौष्ठव और देह यष्टि के हैं। इनकी शुरूआत आप यहीं से मान सकते हैं ।…आज कुछ परिवर्तन, कुछ नया जैसा जरूर होना चाहिए, बस यही विचार रखता हूँ’ ।

शेष आगे…



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