Monday 6th December 2021

नव्यता के संकट में नवगीत

नव्यता के संकट में नवगीत

लेख*डॉ. मनोहर अभय

“उत्तरायण” के बीसवें अंक में ‘अर्थबोध’ स्तम्भ में पत्रिका के यशस्वी सम्पादक निर्मल शुक्ल ने लिखा “आज भी कोई पारम्परिक गीत को असली संवेदनात्मक संवाहक बताता है, तो कोई नवगीत के स्थापित औचित्य को ही पानी पी–पी कर कोस रहा है। कोई नवगीतकार को गीतकार क्यों नहीं कहता, या गीत को नवगीत और नवगीत को गीत क्यों नहीं? इसी उठा -पटक में अपना सब कुछ बर्बाद करने पर तुला है। हिंदी साहित्य के इतिहास में गीत को क्या और कितना स्थान मिला है, इसे जानने की चिंता कम दिखाई पड़ती है ,समय में बने रहने के लिए, आज प्राथमिकता पर हमें ही इसका मनोविश्लेषण करने के लिए आगे आना होगा” ।

शुक्ल जी नवगीत की समृद्धि के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहने वाले उन पुरोधाओं में हैं, जिन्होंने इस विधा की स्थापना के लिए अनुपम साहित्यिक संघर्ष किया है। बहुत कुछ झेला है ,गंवाया है। नवगीत की आज की स्थिति पर उनकी चिंता स्वाभाविक है।वैसे इतना तो कहा जा सकता है कि नवगीत की अस्मिता और उसका अमृत्व अक्षुण्य है। डॉ.शम्भू नाथ सिंह के शब्द हैं:”नवगीत की अमरता गीत की नव्यता अर्थात रूढ़ि-रीतियों से युक्त भाषा, मुहावरा तथा आत्म-साक्षात्कार जन्य बिम्ब योजना एवं लोक-जीवन के साथ गहरी सम्पृक्ति पर निर्भर करती है। यह तो मानी हुई बात है कि नवगीत का जो रूप आज दिखाई पड़ता है, वह अगले युगों में बदल जायेगा”। डॉ.शम्भू नाथ सिंह का यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि नवगीत को नव्यता और बदलाव की जरूरत है। इसे युगीन परिवर्तनों से सम्पृक्त होना पड़ेगा।

“शाश्वत सृजन” नामक पत्रिका में प्रकाशित हमारे आलेख में इसी बात पर बल दिया गया है। इसे एक प्रकार का सर्वेक्षण कह सकते हैं ,जिसका उद्देश्य था वर्तमान में लिखे नवगीतों में नव्यता के प्रश्न पर नवगीतकारों, साहित्य-साधकों की सम्मति ज्ञात करना।यह किसी को केंद्र में लाने या स्थापित करने के लक्ष्य से नहीं लिखा गया। सोशल मीडिया में आलेख पर बड़ी रोचक चर्चा हुई। पचास से ऊपर साहित्य- धर्मियों ने आलेख को पसंद किया और चर्चा में भाग लिया।लगभग सभी नव्यता के संकट की बात से सहमत थे, जबकि कुछेक ने चर्चा को रोचक मोड़ दिया, जो विषय से इतर था।

सर्वेक्षण से प्राप्त परिणाम को अधिक विस्तार न देकर ,भोपाल से वयोवृद्ध नवगीतकार यतीन्द्र नाथ राही की सम्मति को उद्धृत करते हुए चर्चा का समाहार समीचीन होगा।राही जी ने कहा: “नवगीत के नामकरणकारों ने दशक पूर्व जो लकीरें खींचीं, युगों तक तो नहीं चल सकतीं।…देश, काल, वातावरण के अनुसार संवेदना, संचेतना और संस्कारों पर बदलाव तो स्वभाविक है और उसका प्रभाव अभिव्यक्ति पर आना नितांत सहज। किसी आयातित विचारधारा को गीत की ग्रंथि में गूंथ भले ही लो, खटकती ही रहेगी। जहाँ प्रतिक्षण नवता हो वहीं ‘पुनर्नवता’ है, आधुनिकता नहीं। उससे आगे की बात है नवता। इस नवता पर कोई पुराने मानदंड नहीं थोपे जा सकते। उसे तो नव से नव, अभिनव होना है”।

शेष आगे…

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