Sunday 5th December 2021

गुरु और मङ्गल के बीच एक ग्रह पण्डित जसराज

गुरु और मङ्गल के बीच एक ग्रह पण्डित जसराज

स्मरण*डॉ विवेक चौरसिया

सुरों के राजा पण्डित जसराज नहीं रहे, यह जगत के लिए एक ख़बर और उनके प्रेमियों के लिए एक कष्टदायी सूचना हो सकती है लेकिन मेरे लिए यह इतनी असहनीय, अस्वीकार्य और आहत करने वाली घटना है जिसे शब्दों के जरिए ठीक-ठीक अभिव्यक्त कर पाना लगभग असम्भव है।

मैं अत्यंत असहज हूँ। मानो पण्डितजी की श्वांसों के विराम के साथ मेरी आत्मा का संगीत भी सदा-सदा के लिए मौन हो गया है। अब चाहे सारी कायनात गाती रहे, मेरी आत्मा के आँगन में सुर-सङ्गीत विहीन सन्नाटा अनन्तकाल के लिए पसर गया है। मेरा ह्रदय एक पल को मानने को राजी नहीं कि अब पण्डितजी इस धरती पर नहीं है। मानूँ भी तो कैसे?

पण्डितजी से मेरा नाता कोई पन्द्रह बरस पहले जुड़ा था, जब अपने भजन प्रेम के चलते मैं पहली बार उनके गाएं भजनों की एक कैसेट लाया। इसके बाद तो तब से आज तक शायद ही ऐसा कोई दिन गया हो, जब मैंने उनके भजन न सुने हो। बीते पाँच साल से तो रोज़ मेरी भोर पण्डितजी के मधुराष्टकं से नित्य नियमित सुगन्धित हो रही है। आज सुबह ही देर तक पण्डितजी के दिव्य स्वरों से घर-आँगन महका था और शाम को यह मर्मान्तक ख़बर आ गई कि अमरीका में पण्डितजी अंतिम साँस लेकर इस लोक से विदा ले गए।

उफ़्फ़! सतत उनके सघन भाव के बीच सदा के लिए उनके अभाव की सूचना लाई यह शाम कितनी निष्ठुर है! क्या कोई साँझ इतनी निर्मम भी हो सकती है! अनुमान न था।

मेरा बेटा विप्र पण्डितजी के भजन सुनकर ही बड़ा हुआ है। जब वह बमुश्किल साल भर का था और बालसुलभ रुदन लीला करता था, तब उसकी माँ या मैं टेप रिकॉर्डर पर पण्डितजी के भजन बजा देते और वह रोना भूलकर परम् मगन हो बिस्तर पर पड़े-पड़े ही इस संगति से हाथ-पैर हिलाता था मानो नाच रहा हो। इस प्रभाव में पण्डितजी के चयनित अद्भुत स्त्रोतों के शब्दों की शक्ति ही नहीं थी, उनके अलौकिक स्वर और अनुपम सङ्गीत का सम्मोहन भी था। यह जादू ही था जो एक रोते हुए बच्चे को रोना छोड़ हँसना, झूमना सीखा देता था। जब मैंने यह बात पण्डितजी को बताई थी तो उन्होंने भाव में भरकर विप्र को गोद में उठा लिया था।

याद है यही अगस्त का महीना था और साल 2007 की 19 तारीख़। पण्डितजी श्रावण महोत्सव में प्रस्तुति के लिए उज्जैन पधारे थे। मुझे उनका इंटरव्यू करना था और आदतन ‘ऑफबीट’ सवाल करते हुए मैंने पूछ लिया, ‘यदि आप गायक न होते तो क्या होते?’ बाप रे बाप! उस पल को मरते दम तक नहीं भूल सकता। क्या नज़ारा था। मेरा प्रश्न पण्डितजी को इस कदर चुभा कि उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। कमरे में बैठे तत्कालीन कलेक्टर शिवशेखर शुक्ला समेत सात-आठ जन हक्केबक्के रह गए थे। मैं लज्जा और ग्लानि से आपदशीर्ष मानो ज़मीन में गढ़ गया कि ऑफबीट के चक्कर में यह क्या अनर्थ हो गया। उफ़्फ़, मैंने अनजाने में एक अत्यंत संवेदनशील कलाकार की आत्मा में प्रश्न का पिन चुभा दिया था!

मगर इसके कुछ ही पलों बाद जैसे भादौ की भीगी भोर के रीत जाने पर सूरज निकलता है, ठीक वैसे ही मेरे प्रश्न के उत्तर में पण्डितजी के श्रीकंठ से उजियारे शब्द उदित हुए। आँसू पोंछते हुए बोले, ‘यह कभी नहीं होता। मैं भगवान से भले लड़-लड़कर मर जाता पर हर हाल में गायक ही होता। और कुछ नहीं, कभी नहीं। किसी सूरत में, किसी कीमत पर गायक के सिवा कुछ नहीं होता।’
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पण्डितजी के कमल कपोलों पर ओंस की बूंदों-से उन अश्रु कणों को मेरे दोस्त काईद जौहर ने अपने कैमरे में कैद किया था। मेरे इंटरव्यू के साथ यह पूरा पैकेज अगले दिन दैनिक भास्कर के सभी 65 संस्करणों में प्रथम पेज पर प्रकाशित हुआ था जो बाद में मेरी क़िताब ‘वे लोग वे लम्हें’ में भी संस्मरण के रूप में संकलित हुआ।

उस दिन पण्डितजी ने कहा था , ‘मुझे गुस्सा तब आता है जब मैं गा रहा होऊं और कोई बीच में व्यवधान उपस्थित करें। मुझे प्रेम केवल सङ्गीत से है और सर्वाधिक प्रसन्नता तभी होती है जब मैं अकेले में, केवल अपनी मौज में गाता हूँ। मंच पर तो मुझे श्रोताओं के सम्मान की खातिर ‘अलर्ट’ जो रहना पड़ता है!’

इस मुलाकात के बाद आगे भी मुलाकातें हुई और उन्हें प्रत्यक्ष सुना भी। हर बार पाया कि ‘पण्डित जसराज केवल और केवल पण्डित जसराज ही हो सकते हैं। हजारों-हजार गायक आएं और आएंगे लेकिन पण्डितजी की जोड़ का दूसरा न हुआ न होगा। यह भी पढ़े-
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चार पीढ़ियों से उनके परिवार में शास्त्रीय सङ्गीत की परंपरा थी। हरियाणा के हिसार में मेवाती घराने की उस खयाल शैली की गायकी को यदि पण्डितजी ने अमर कर दिया तो इसमें उनकी साधना से अधिक भाव की प्रबलता ही थी। लोगों को उनका मधुराष्टकं अधिक स्मरण होगा किन्तु जिन्होंने आद्य शंकराचार्य कृत, ‘यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्ण सत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्’ सुना होगा, वे साधना से परे भाव के प्रभाव का अंतर समझ जाएंगे। तब उन्हें रसराज जसराज कृत ‘जसरंगी’ के इज़ाद की महिमा का भी बोध हो सकेगा और पण्डित जसराज के महात्म्य और चले जाने का मर्म भी समझ आते देर न लगेगी।

पिछले साल ही अमेरिका ने उनके नाम पर एक ग्रह का नामकरण किया था। जिसे कोई तेरह साल पहले नासा और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के वैज्ञानिकों ने खोजा था। ख़ूबी यह कि पण्डित जसराज नाम का यह ग्रह गुरु और मङ्गल के बीच हमारे सौरमंडल की परिक्रमा करता है। मानो सङ्गीत के गुरु रूप पण्डितजी धरती पर मङ्गल बरसाते आसमान में चमकते रहेंगे और ‘यदा तदा यथा तथा’ के आभास के साथ गुनगुनाते रहेंगे कि ‘हे कृष्ण ! मुझ पर ऐसी कृपा करे कि मैं सदैव आपकी लीला, कथा एवं महिमा का प्रत्येक स्थिति मे गुणगान करता रहूं।’

विनम्र श्रद्धा-सुमन पण्डितजी! वचन देता हूँ, आपकी पावन वाणी प्रतिदिन अखण्ड भाव से व्रतपूर्वक सुनता रहूँगा। कृपया आप भी आकाशगंगा में चमकते रहिएगा।

*डॉ विवेक चौरसिया
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पौराणिक साहित्य के अध्येता है)

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