Tuesday 18th May 2021

पर्यावरण की प्राणहिता-मानवीय सोच…!

पर्यावरण की प्राणहिता-मानवीय सोच…!

लेख*अखिलेश सिंह श्रीवास्तव

पर्यावरण ! यह एक शब्द मात्र नहीं, ना ही प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता कोई भाव-बोध, अपितु पर्यावरण इस धरित्री पर जीवन की प्राणहिता है। जीवन ! मानव, जंतु, वनस्पति समुद्र, नदियाँ, वायु, पर्वत, उपत्यकाएँ, गहन कंदीराएँ, मरुस्थल सभी इसकी सीमा में हैं। अतः पर्यावरण और जीवन-से तात्पर्य इसका व्यापक वास है। ‘ईशा वास्य मिदंसर्वं।’ साधारण रूप में समझे तो शुद्ध जलवायु संसार की सबसे बड़ी सौगात है यदि जलवायु ही दूषित हो तो भला अन्य किसी विकास का क्या मूल्य! यही आज हमारा सबसे महत्वपूर्ण चिंतन विषय है। वर्तमान में विश्व जिस महामारी से जूझ रहा है वह मानव के आचार-विचार- व्यवहार के प्रदूषण का दंडात्मक परिणाम है ।



बोआर धान के साथ जैसे बोंदरा, गेंदरा, चौड़ी पत्ती, कौंवा केली जेसी रान (कचरा) फसल हानि करती है वैसे ही पर्यावरण की शुद्धता को दूषित धुँआ, हानिकारक रसायन बहाव, आणविक संयंत्रों के विषाक्त पदार्थ वन विदोहन, ज्वालामुखी विस्फ़ोट इत्यादि हानि पहुँचाते हैं अतः जिस प्रकार किसान सब कार्य छोड़, खेत-से कचरा साफ़ करता है वैसे ही पर्यावरण स्वच्छता के लिए सार्वजनिक प्रयास आवश्यक हैं। अच्छा मित्रों, तनिक ध्यान से देखिए तो क्या वाक़ई उपरोक्त लिखित कारकों से पर्यावरण ह्रास होता है क्या प्रदूषण का मूल कारण यही हैं…! नहीं यह नहीं है। मूल कारण कुछ और हैं। प्रदूषण का मूल कारण यह गंदगी नहीं वरन दूषित मानसिकता है। यदि इंसान, मानवता के दायरे में रहकर कार्य करें तो वह ऐसे प्रदूषण उत्सर्जकों को लापरवाही से छोड़ेगा ही नहीं यह तो मानवीय स्वार्थ है कि वह मात्र स्व चिंतन करता है यदि हम सभी अपने अधिकारों के साथ स्त्रियों के प्रति भी सजग हो जाएँ तो निश्चित ही पर्यावरण को इसका सीधा-सीधा लाभ मिलेगा; जैसे-लॉक डाउन काल में स्वच्छ पर्यावरण शुद्धता के अद्वितीय दृश्य देखने को मिले। इस जगत में यदि मानवीय सोच बस शुद्ध हो जाए तो सर्वस्व शुद्धता संभव है। नदियों को विश प्रवाही बनाना, शांत नभ में घातक कोलाहल उत्पन्न करना, ऋतु-चक्र में बदलाव, ओज़ोंन छिद्र इन सभी पर्यावरण ह्रास का दोषी एक ही है, ‘मानव की लोभित सोच।’



रामचंद्र सिंह देव अपनी पुस्तक ‘सिविलाइज़ेशन इन हरी’ में लिखते हैं, “जो दैत्याकार बाँध बनाए जा रहे हैं वह मानवता की कब्रगाहें है। इन बाँधों की जो उम्र बताई गई है हमारी नासमझी और गंदगी की आदतों के चलते लगातार कम हो रही है। सामान्य स्थानों पर जल ग्रहण क्षेत्रों के रेत-से भरने के कारण वर्षा जल संग्रहण कठिन हो रहा है जो धीरे-धीरे सूखे की ओर बढ़ना है। पृथ्वी में भयंकर बीमारियाँ भी पर्यावरण असंतुलन का दुष्परिणाम हैं। प्लेग समाप्त हो गया था आज फिर सिर उठा रहा है। इसका प्रमुख कारण भूकंप-से पहाड़ी चूहों का बाहर आना एवं मानवीय बस्ती के चूहों के साथ मिलना है। सोचिए, यह कितना भयावह और चिंताजनक विषय है । भूकंपों की पुनरावृत्ति के पीछे मानवीय लालच का रत्नगर्भा को पोला करना एक बहुत बड़ा कारण है।



मानव अपने विकास-से आत्ममुग्ध है, परंतु यह एक छलावा मात्र है, आत्म प्रवंचना ! इस झूठ से, अनृत-से जितनीं शीघ्रता से बाहर निकला जा सके उतना अच्छा है, अन्यथा पृथ्वी के अभ्यांतर होने वाले परिवर्तन मानवीय अस्तित्व को इतिहास बना सकते हैं। कोरोना इसका साक्षात उदाहरण है। निश्चित ही यह बात तय है कि पर्यावरण रक्षा के लिए हमें अपनी लाभवादी, अवसरवादी सोच में परिवर्तन लाना होगा शेष कारकों पर स्वतः नियंत्रण हो जाएगा। जब मानव अपनी सोच सात्विक रखेगा तब वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो प्रकृति विरुद्ध हो और यही सोच प्राणहिता बन, पर्यावरण को सुरक्षित करेगी।इसीप्रकार कृषि और वानस्पतिक विकास भी इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा। इस सोच के व्यवहारिक क्रियान्वयन के लिए सिवनी निवासी कपिल पाण्डेय ‘कप्पू’ एवं इनके साथियों नें एक प्रशंसनीय प्रयास आरंभ किया। ये लोग लोगों को घर पर सीमित साधनों के साथ, सीमित स्थान पर कृषि करनें की विधि बात रहे हैं जिसके माध्यम से दैनंदिन जीवन में उपयोग के लिए सब्जी-भाजी मिल सके और घर में शुद्ध वायु संचरण बढ़े।



पर्यावरण संरक्षण की जागरूकता बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र नें 1972 में 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनानें की घोषणा की। हर वर्ष पर्यावरण की थीम अलग-अलग होती है। वर्ष 2020 की थीम है ‘प्रकृति के लिए समय’ इसका उद्देश्य पृथ्वी और मानव विकास पर जीवन का समर्थन करनें वाले आवश्यक बुनियादी ढाँचे को प्रदान करनें पर ध्यान दिया जाए। निश्चित ही इस वर्ष अखिल जगत में पर्यावरण शुद्धता स्वतः बढ़ी है क्यों कि प्रदूषण फ़ैलाने वाला धरती का तथाकथित श्रेष्ठतम जीव मानव, वैश्विक महामारी कोरोना जो स्वयं उसी के कुकृत्यों का परिणाम है, से अपनी जान बचाने के लिए अपनें-अपनें घरों में बंद है। लेकिन स्थिति भी स्पष्ट है कि यह धरती हमारी निजी सम्पति नहीं कि हम कुछ भी करें। हम तो इसके आश्रित हैं और जब भी हम अपनीं मर्यादा का उल्लंघन करेंगे भोगना भी हमें ही पड़ेगा। सकल लॉकडाउन नें जहाँ स्वच्छता निर्मित करी वहीं अनलॉकडाउन आते ही इंसान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। भाँती-भाँति के बहानों के साथ वह प्रकृति की शुद्धता को पुनः खंडित करनें की तैयारी करता दिख रहा है।



अंततः पुनः वही बात निकल कर सामनें आई कि इंसानीं सोच ही असल में प्रकृति प्रदूषण को जन्म देती है। अतः चाहे समझा-बुझा के, चाहे ताड़ना-से पर इस कुबुद्धि-भावों पर रोक सर्वबाधा उपचार है। सत्य भी तो है, ‘विनय न मानें जलधि जड़, गए तीन दिन बीत बोले राम स्कोप तब भय बिन होए न प्रीत।’ सो धरती माँ के धानीं आँचल को मैला करनें वाले हर हाल में ताड़न के अधिकारी हैं। आइए मित्रों प्रण करें कि प्रकृति स्वच्छता के लिए हम हर संभव प्रयास करेंगे। हम मानव हैं तो पूरा करेंगे अपनें मानव धर्म को मन-से, वचन-से, कर्म-से, सोच-से यही तो पर्यावरण की प्राणहिता है।

*अखिलेश सिंह श्रीवास्तव(कथेतर लेखक)
सिवनी(मध्यप्रदेश)



Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES
TAGS

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )