Wednesday 21st April 2021

पुलिस और मानवाधिकार

पुलिस और मानवाधिकार

हम सदैव पुलिस बल में व्याप्त भ्रष्टाचार की, पुलिस के दायित्व की, उनके व्यवहार की बात करते हैं और सहज में उनकी आलोचना करते हैं। एक संभ्रांत आम व्यक्ति पुलिस के नाम से ही कतराता है। पुलिस का नाम आते ही मन में एक अन्जाना सा भय व्याप्त हो जाता है। परंतु इस करोना महामारी के समय में पुलिस का अद्भुत, अप्रत्याशित आचरण और मित्रवत व्यवहार देखने को मिला। काश पुलिस की यह बदली हुई छवि स्थाई हो।
पुलिस द्वारा किये गये प्रत्येक मुठभेड़ (एनकाउंटर) को हम संदेह की दृष्टि से देखते हैं और उस पर जांच करने की बात करते हैं। पुलिस एनकाउन्टर करे तो क्यों किया न करे तो क्यों नहीं किया। सार्वजनिक धरना प्रदर्शन में कार्रवाई करे तो क्यों की न करे तो क्यों नहीं की। पुलिस के लिये इधर गिरो तो कुआँ उधर गिरो तो खाई। हमेशा धर्म संकट की स्थिति बनी रहती है।
कानपुर के “विकास दुबे” का एनकाउंटर वृहत चर्चा एवं आलोचना का विषय रहा है। समाज के एक बड़े प्रबुद्ध वर्ग ने इसे सही ठहराया और समाज के ही एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेकों प्रश्नों से इसे संदेह की दृष्टि से देखा। आज भी यह सुनिश्चित नहीं हो पाया कि यह एनकाउंटर उचित था अथवा अनुचित जब कि “विकास दुबे” का व्यक्तिव क्या था यह अब किसी से छिपा नहीं है।
पुलिस पर राजनैतिक दबाव में उनका सामाजिक दायित्व गौण हो जाता है।
हम बात करते हैं अपराधियों के मानवाधिकार की, आतंकियों के मानवाधिकार की, यहाँ तक कि पशुओं के अधिकार की परन्तु क्या पुलिस का मानवाधिकार नहीं है?
सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, निजी प्रतिष्ठानों, सार्वजनिक संकायों/उपक्रमों आदि में दैनिक कार्य के घंटों का, साप्ताहिक अवकाश (1 या 2 दिन) का, राष्ट्रीय अवकाश एवं अन्य सुविधाओं का प्राविधान होता है, श्रम कानून लागू होते हैं परंतु पुलिस विभाग में नहीं।
न्यायपालिका में दिनो दिन बढ़ती लम्बित वादों की संख्या के लिये न्यायाधीशों की कमी बताई जाती है परंतु न्यायपालिका के कार्य घंटों, कार्य दिवस, अवकाश से कोई समझौता नहीं होता है जिससे लम्बित वादों को कम किया जा सके। इसके विपरीत अधिवक्ताओं की आये दिन की हड़ताल बढ़ते वादों की संख्या का मुख्य कारण है।
न्यायपालिका आवश्यक सेवा की श्रेणी में क्यों नहीं?
पुलिस बल तो अपनी व्यथा असहयोग आन्दोलन/हड़ताल द्वारा व्यक्त करने के आधिकार से भी वंचित है जब कि समाज का अन्य वर्ग इस हथियार/विधा को इस्तेमाल करने के लिये स्वतंत्र है। मैं यहाँ असहयोग आन्दोलन/हड़ताल की पैरवी कदापि नहीं कर रहा हूँ।
भारतवर्ष में लगभग 24% पुलिस कर्मी औसतन 16 घन्टे प्रतिदिन और लगभग 44% पुलिस कर्मी औसतन 12 घन्टे प्रतिदिन से ज्यादा काम करते है।
एक पुलिस कर्मी का कार्य दिवस औसतन 14 घन्टे का होता है और उसे औसतन 2-3 माह में 1 अवकाश मिलता है।
ज्यादातर पुलिस विभाग यूएसए में 40 घन्टे प्रति सप्ताह 2 साप्ताहिक अवकाश, यूके में 48 घन्टे प्रति सप्ताह 1 साप्ताहिक अवकाश, जापान टोकियो मेट्रोपोलिटन पुलिस डिपार्टमेंट 4 शिफ्ट प्रतिदिन की अवधारणा पर काम करते हैं।
पुलिस कर्मियों पर काम का बोझ उन्हें उनके परिवार से दूर कर देता है, परिवार के साथ समय बिता पाने का अवसर नहीं देता है, उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर उन्हें चिड़चिड़ा और असंवेदनशील बना देता है।
ज्यादातर पुलिस कर्मियों को न तो ओवर टाईम का भुगतान होता है और न ही उन्हें प्रतिपूरक अवकाश ही मिलता है। उन्हें उनके द्वारा किये गये कठिन परिश्रम की समुचित प्रशंसा भी यदा कदा ही मिलती है। मिलती है तो केवल आलोचना।
इन सब का कारण हैं पुलिस बल की कमी, उप्लब्ध पुलिस संसाधनों की कमी।
2013 में भारत में पुलिस आबादी अनुपात 138 प्रति लाख था, 71 देशों में निम्नतम स्तर से 5वाँ स्थान। जनवरी 2014 में पार्लियामेंट में बताया गया पुलिस विभाग में स्वीकृत स्थानों की तुलना में 25% स्थान रिक्त थे। जनवरी 2019 ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवेलपमेंट के अनुसार पुलिस आबादी अनुपात 198 प्रति लाख था।
1 जनवरी 2019 तक के आँकड़ों के अनुसार:
• पुलिस आबादी अनुपात (PPR) प्रति 1 लाख आबादी: 198 (मणिपुर: 1315 अधिकतम, बिहार: 132 और दादरा नगर हवेली: 77 न्यूनतम)
• पुलिस क्षेत्रपल अनुपात (PAR) प्रति 100 वर्ग किलो मीटर: 79
• आबादी प्रति पुलिस (PPP):503 (मणिपुर:76 न्यूनतम, बिहार:760, दादरा और नगर हवेली:1302, अधिकतम)।
• क्षेत्रफल प्रति पुलिस (APP) वर्ग किलो मीटर: 1.27 (चण्डीगढ़: 0.01 न्यूनतम, दिल्ली: 0.02, राजस्थान: 3.11, अरुणाचल प्रदेश: 5.75 अधिकतम)।
• वाहन प्रति 100 पुलिस (TPP): 8
उपरोक्त सभी आँकड़े विकसित देशों की तुलना में चिन्ता जनक हैं और हम पुलिस प्रदर्शन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का आपेक्षित करते है।
इसके अतिरिक्त पुलिस विभाग के पास संचार एवं अन्य आधुनिक आधार भूत ढांचे और सुविधायें भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर से बहुत नीचे हैं।
हमारे पुलिस कर्मी मानवाधिकार, श्रम आधिकार और सन्विधान प्रदत्त अधिकार- धारा 42, “राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा।” से वंचित हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर द्वारा अंगीकृत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुसार सभी को काम के उचित और अनुकूल परिस्थितियों का अधिकार है और “आराम और अवकाश”, “सीमित काम के घन्टे” और “सवैतनिक आवधिक अवकाश” मानव अधिकार हैं।
पुलिस कर्तव्य, कठिन कार्यकारी परिस्थितियां और पुलिस मानवाधिकार सिक्के का एक पहलू है। सिक्के का दूसरा पहलू है पुलिस को प्राप्त असीम शक्तियां (पावर), नगण्य जवाबदेही (accontability) एवं उत्तरदायित्त्व (responsibility), वर्दी का नशा, वेतन से ज्यादा ऊपरी आमदनी का आकर्षण, समस्य्या को नजरन्दाज़ करने/टालने की व्यवस्था प्रदत्त सुविधा जो प्रथम पहलू को गौड़ बना देती है और आम जन मानस सब कुछ जानते हुए भी पुलिस विभाग की नौकरी पाने के लिये लालाइत रहता है फिर चाहे वह क्लर्क स्तर हो, सिपाही स्तर हो या फिर अफसर स्तर।
समाज में दिनों दिन बढ़ते अपराध के लिये उपरोक्त पुलिस के प्रथम पहलू की अपेक्षा द्वितीय पहलू ज्यादा जिम्मेदार है।
यह भी विषयक है कि पुलिस विभाग मजबूरी में राज्य सरकार की राजनैतिक इच्छा को पूरा करने में अपने सामान्य नागरिक के प्रति कर्तव्य को भूल जाती है और समाज का प्रतिष्ठित नागरिक भी अनावश्यक प्रताड़ना और उत्पीड़न का दंश झेलता है। रिपब्लिक भारत के अर्नव गोस्वामी इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।
यक्ष प्रश्न – क्या पुलिस कर्मियों के मानवाधिकार नहीं हैं? क्या इनको भी वह सभी सुविधायें व अवकाश नहीं मिलने चाहिये जैसी अन्य संकायों के कर्मियों को मिलती हैं जिससे यह भी अपने कर्तव्य पर केन्द्रित हो सकें और इनसे वांछित व्यवहार एवं सेवा हमें मिल सके? क्या पुलिस को व्यवस्था प्रदत्त असीम शक्तियां (पावर), जवाबदेही (accountability) एवं उत्तरदायित्त्व (responsibility) पुन: विचारणीय नहीं हैं?


*कृष्ण मोहन अग्रवाल

देखें-
शब्द प्रवाह डॉट पेज
भागवत के विजय उद्बोधन की प्रेरणाएं

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