Sunday 5th December 2021

राष्ट्र से सिर्फ लेते रहने में शर्म क्यों नहीं

राष्ट्र से सिर्फ लेते रहने में शर्म क्यों नहीं

लेख*मंदाकिनी श्रीवास्तव

आज जब लिखने बैठी इस पर तो मन में कहीं तकलीफ़ भी है कि आज हमें इस विषय पर सोचने की फिर से ज़रूरत आ पड़ी है जबकि यह सफ़र युगों पहले ही शुरू हो चुका था,मकाम तक पहुँचते-पहुँचते फिर वहीं पहुँच गया, जहाँ से शुरू हुआ, क्योंकि रास्ता बीच सफ़र में स्वार्थ की संकीर्णता से इतना छोटा हो गया कि गंतव्य तक पहुंच ही नहीं सकता था।



समाज का वर्गीकरण जब हुआ हो, जैसे हुआ हो, जिस आधार पर हुआ हो मगर आज हमारे राष्ट्र में समाज की संरचना दो हिस्सों में बँटी हुई है। एक ज़रूरतमंद समाज और दूसरा अघाया हुआ समाज। ज़रूरतमंद समाज में भी दो तरह के लोग हैं।
• एक जिन्हें ज़रूरत तो है पर वह ज़बान पर नहीं आती, ठीक उसी तरह जैसे हम अपने घर में रहते हुए अपने माता-पिता की परिस्थितियों से वाकिफ़ रहते हैं और सब कुछ सहजता से लेकर संतुष्ट होकर जीते हैं और कोशिश रहती है कि माता पिता की कोई मदद कर दें।
• दूसरे वे ज़रूरतमंद होते हैं जिनके मन में सदा खिन्नता बनी रहती है। ये कभी ख़ुश रहते हैं तो कभी दबी ज़बान में कोस भी डालते हैं।



अब बारी आती है अघाये हुए समाज की। यह समाज सभी प्रकार के धर्मो, जातियों, उपजातियों का मिश्रण है। इस अघाये हुए समाज का विस्तार बड़ी तेज़ी से हो रहा है। इसे बचपन में मुफ़्तखोरी की घूँटी मिलती है और कुछ को वैचारिक उच्छंखृलता के लिए सहयोग, परिणामस्वरूप आज इसका स्वास्थ्य बड़ा अच्छा है।
इस समाज को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि राष्ट्र में और भी नागरिक रहते हैं जिनकी ज़रूरतें हैं या राष्ट्र की अपनी ज़रूरतें हो सकती हैं। सुरक्षा या विश्व नीति के संदर्भों को लेकर। यह उस कहानी की तरह है जिसमें एक पिता के तीन पुत्रों में दो पुत्र उद्यमी हों और एक पुत्र निकम्मा जो सदा संपत्ति पर नज़रें गड़ाए हुए रहता था। इस निकम्मे पुत्र को यह बात खाये जाती थी हरदम कि पिता की संपत्ति कहीं भाइयों में न बँट जाए।



यह अघाया वर्ग कभी भी राष्ट्र से संतुष्ट नहीं होता,यह हमेशा राष्ट्र से लेना चाहता है। इसे राहत चाहिए, राशन चाहिए, नौकरी चाहिए, पद, प्रतिष्ठा, पदोन्नति चाहिए, धन चाहिए, साधन चाहिए, विशेष सुरक्षा चाहिए, यहाँ तक कि दूसरों का हक़ भी चाहिए। सब कुछ लेने के बाद भी राष्ट्र के खोखले हो जाने की इसे चिंता नहीं है। वह नहीं जानता कि राष्ट्र को दिया किस तरह जाता है, उसने तो लेना ही सीखा है। इस अघाये वर्ग की सोच का क्षेत्रफल बढ़ता ही जाता है। वह स्वयं, परिवारजन , नाते-रिश्तेदार, मित्र, पीढ़ियों और न जाने क्या-क्या इसमें समा जाते हैं।



देश में जब मुसीबतें नहीं थीं, तब महंगाई भी नहीं थी। मगर भत्ता मिल रहा था। अब मुसीबतें एक नहीं हज़ारों हैं, तो निश्चित ही महंगाई भी बढ़ेगी। यदि हम सच्चे राष्ट्रभक्त हैं तो भत्ते को मुद्दा न बनाकर कोई ऐसा फैसला लेने की पहल करें जिससे यह देश अचानक आई इस विपदा के लिए खर्च कर सके। कोरोना के मरीजों और संदिग्धों पर जो खर्चे हो रहे हैं वे हिलाकर रख देने वाले हैं। अस्पतालों, उपकरणों, दवाइयों और अन्य सुविधाओं पर तथा लोगों को क्वारंटीन करने में, लाखों करोड़ों रोज़ खर्च हो रहे हैं।



आने वाले समय में संघर्ष और बढ़ेगा तो ऐसे कठिन समय में भी राष्ट्र से मांग रखते हैं या असंतुष्टि दिखाते हैं तो धिक्कार है हमें। जिस प्रकार कठिन समय में परिवार को एक होना चाहिए, मिलकर, डटकर सामना करना चाहिए, वैसी ही भावना राष्ट्र के लिए होनी चाहिए। इसके उलट इस अघाये वर्ग को रेशम से कम मंज़ूर नहीं, तब जब सब इस बात की चिंता में लगे हों कि कहीं राष्ट्रीयता की चादर में छेद न हो जाए, कोई ताना-बाना कमज़ोर न पड़े। राष्ट्रीयता इतनी प्रबल हो कि इसमें ‘मैं’ दब जाए लेकिन दुख इस बात का है कि कुछ लोगों का ‘मैं’ राष्ट्रीयता का लिबास पहनकर धोखा देता है, जिससे राष्ट्र कमज़ोर होता है।



यह भूमि लाखों करोड़ों लोगों के समर्पण भाव से ही अविचल है। बूँद-बूँद एकत्र हुआ है सदियों से, इसमें बूँद भर ही तो डालना है हमें भी, जैसा घर में करते हैं, माता-पिता के लिए, घर के सदस्यों के लिए, घर के लिए। निष्ठा, समर्पण और उत्कर्ष की भावना लेकर राष्ट्र को इस संकट में डटे रहने की शक्ति तो हम ही देंगे न! हम ही तो हैं राष्ट्र, क्या हमेशा हम इससे लेंगे, देंगे नहीं? देने का समय आ गया है- तन,तन नहीं तो धन ,धन नहीं तो मन ही कम से कम। सच बताऊँ तो यह परीक्षा की घड़ी है, जो भी बात विपक्षी लगे, उस पर ध्यान मत दीजिए। विपक्षी से तात्पर्य केवल मौजूदा विपक्ष ही नहीं है, राष्ट्र के खिलाफ़ जो भी बात लगे, उसे सुनना ही नहीं है, क्योंकि इस मातृभूमि को कुछ समर्पित कर सकें,यह समय ईश्वर ने हमें दिया है।


*मंदाकिनी श्रीवास्तव
किरंदुल जिला-दन्तेवाड़ा



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COMMENTS

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    Vaibhav Joshi 2 years

    Very well articulated about current state not affairs and make u think about what ideally we should be doing.

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