Tuesday 18th May 2021

विक्रम विश्वविद्यालय में भाषाओं पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश की छह भाषाओं के विद्वान ने लिया भाग

सांस्कृतिक क्रांतियों ने बदला है भाषाओं और संस्कृति को – प्रो रामराजेश मिश्र 

सांस्कृतिक क्रांतियों ने बदला है भाषाओं और संस्कृति को – प्रो रामराजेश मिश्र 

शाश्वत सृजन समाचार

उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा भाषाओं पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का का आयोजन 2-3  मार्च को किया गया। विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में आयोजित उद्घाटन समारोह के प्रमुख अतिथि मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल के निदेशक एवं विक्रम विश्वविद्यालय एवं रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के पूर्व कुलपति प्रो रामराजेश मिश्र थे। सारस्वत अतिथि महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो पंकज लक्ष्मण जानी थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने की। पूर्व कुलपति प्रो रामराजेश मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत में कई सांस्कृतिक क्रांतियाँ हुईं। उन्होंने भाषाओं और संस्कृति को बदला है। मानवीय सभ्यता के विकास और सम्पर्क से एक भाषा दूसरी भाषा के साथ जुड़ती है। समस्त भाषाओं का अपना अपना सौंदर्यशास्त्र होता है। लोक भाषाओं की अपनी मिठास होती हैं, उनके महत्त्व को स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी जी के अंदर और बाहर की भाषा एक ही थी, इसीलिए वे पूरे विश्व को प्रेरणा दे रहे हैं। 



सारस्वत अतिथि महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो पंकज लक्ष्मण जानी ने कहा कि भारत विविध भाषाओं और बोलियों का देश है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। संकेत भाषाएँ पहले थीं। बाद में उनका विकास हुआ, जिनसे सूक्ष्म संवेदनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति होने लगी। भाषाओं के माध्यम से अपने लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। कई छोटी नदियों से बड़ी नदी बनती हैं, वही क्रम बोलियों से भाषाओं के विकास का होता है।अध्यक्षता करते हुए विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि भाषा सरस्वती है। वाक, भाषा, भारती सरस्वती के पर्याय हैं। भारत में अष्टाध्यायी और अमरकोश को विशेष मान्यता मिली हुई है। भारतीय दृष्टि में  सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से हुई है। भाषाएँ सरस्वती का ही रूप हैं। भाषाओं के भेद को तोड़ने की आवश्यकता है। भाषाओं के घालमेल से बचना होगा। लिखित भाषा से बजाय हम संकेतों का इस्तेमाल करने लगे हैं, जो उचित नहीं।   



प्रथम दिवस पर तीन तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न भागों के विद्वानों ने विशिष्ट व्याख्यान दिए। इनमें डॉ मोहन गुप्त,  प्रो पंकज लक्ष्मण जानी, प्रो राजुल भार्गव, जयपुर, उज्जैन, प्रो अचला शर्मा, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा शामिल थे। सांध्यकालीन सत्र में डॉ मोहन गुप्त ने भाषा की उत्पत्ति और भारोपीय भाषा परिवार पर महत्त्वपूर्ण व्याख्यान सह प्रस्तुति की।  स्वागत भाषण प्रो अचला शर्मा ने दिया। अतिथियों का स्वागत प्रो गीता नायक, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ अंजना पांडेय, डॉ एस के मिश्रा, डॉ बालकृष्ण आंजना, डॉ रूबल वर्मा, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा आदि ने किया। वैदिक मंगलाचरण डॉ महेंद्र पंड्या ने किया। 



संगोष्ठी का समापन 3 मार्च को हुआ। समापन समारोह के प्रमुख अतिथि प्रसिद्ध संस्कृतविद एवं पूर्व कुलपति प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी, पुणे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने की। विशिष्ट अतिथि बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति प्रो पी के वर्मा थे। संस्कृत विद्वान एवं पूर्व कुलपति प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि अठारहवीं शताब्दी में भारतविद्या को लेकर नई सजगता पैदा हुई, जिसका विश्वव्यापी प्रभाव हुआ। भारतीय नवजागरण के उदय के पीछे संस्कृत ग्रंथों के अनुशीलन और अनुवाद की अविस्मरणीय भूमिका रही है। उस दौर में फ़ारसी के माध्यम से संस्कृत के अनेक ग्रन्थों के अनुवाद यूरोपीय भाषाओं में हुए। विलियम जोंस ने अनुवादों के माध्यम से दुनियाभर में संस्कृतविद्या के प्रति गहरी जागरूकता पैदा की। भारतीय पुनर्जागरण ने भारतवासियों को निराशा और आत्महीनता से मुक्त किया। संस्कृत पत्रकारिता ने भी नवजागरण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। उस दौर में संस्कृत पत्रिकाओं में क्रांति, स्वराज और सामाजिक परिवर्तन की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। संस्कृत का अतीत ही गौरवशाली नहीं है, आधुनिक संस्कृत रचनाधर्मिता भी अविस्मरणीय सिद्ध हुई है। परतन्त्र भारत में संस्कृत के कई साहित्यकारों और विद्वानों को राज्यद्रोह के मुकदमे भी झेलने पड़े।



अध्यक्षता करते हुए विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि ज्ञान अगाध और अनादि है। सारस्वत तत्त्वों को ग्रहण करने वाले कुछ ही लोग होते हैं। भाषा का संबंध सभी से है। ज्ञानार्जन और अनुसंधान के लिए भाषा ही माध्यम बनती है। सभी भाषाएँ सरस्वती का रूप हैं। विशिष्ट अतिथि बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति प्रो पी के वर्मा ने कहा कि समय के साथ शिक्षक की भूमिका बदल रही है। नए दौर में शिक्षक मार्गदर्शक के रूप में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं। आने वाले दौर में जिज्ञासा जाग्रत करने की जरूरत है। नई पीढ़ी में अन्तरानुशासनिक दृष्टि से सोच विकसित किया जाने चाहिए। द्वितीय दिवस पर तीन तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न भागों के विद्वानों ने विशिष्ट व्याख्यान दिए। इनमें प्रो हरीश नवल, नई दिल्ली, प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी, पुणे, प्रो बी हसन, उज्जैन, प्रो जिनेंद्र कुमार जैन, उदयपुर, प्रो प्रेमलता चुटैल, प्रो गीता नायक, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा शामिल थे।



स्वागत भाषण एवं संगोष्ठी की उपलब्धियों का परिचय प्रो अचला शर्मा ने दिया। अतिथियों का स्वागत प्रो प्रेमलता चुटैल, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ अंजना पांडेय, डॉ बालकृष्ण आंजना, डॉ रूबल वर्मा, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा आदि ने किया। अतिथियों का स्वागत एवं स्मृति चिह्न अर्पण मुख्य समन्वयक प्रो अचला शर्मा एवं सह समन्वयक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने किया। संचालन डॉ रूबल वर्मा  और डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने किया।इस संगोष्ठी में हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, पाली, प्राकृत एवं रूसी भाषाओं के विशेषज्ञ वक्ताओं ने भाग लिया।


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