Tuesday 18th May 2021

सह अस्तित्व के मूल्यों के निर्धारण का निर्णायक समय है

सह अस्तित्व के मूल्यों के निर्धारण का निर्णायक समय है

लेख*कृष्ण मोहन अग्रवाल

“सह अस्तित्व” का सहज अर्थ है साथ साथ रहना। सह अस्तित्व समस्त प्राणी एवं वनस्पति के लिये परमावश्यक है। हिन्दू सिद्धान्त “वसुधैव कुटुम्बकम्” सह अस्तित्व की धारणा पर ही आधारित हैI एकल अस्तित्व से समाज का निर्माण नहीं हो सकताI सह अस्तित्व के लिये एक दूसरे के विचारों में सामन्जस्य, एक दूसरे की आवश्यकताओं, हित-अहित एवं भावनाओं की समझ व आदर आवश्यक है। ये सूत्र परिवार स्तर से ले कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक लागू होते हैंI इनके अभाव में परिवार टूट जाते हैं, अन्तर्राष्ट्रीय विवाद बढ़ जाते हैंI दो विपरीत प्रकृत की वनस्पतियों, पशु पक्षियों, कीट पतंगों का भी सह अस्तित्व सम्भव नहीं है फिर मनुष्य तो बुद्धि एवं तार्किक शक्ति का स्वामी है। विचारों में भिन्नता तो ठीक है, परंतु विचारों की कट्टरता, विचारों में वैमनस्यता होने पर सह अस्तित्व की कल्पना ही व्यर्थ है। सुतर्क उचित निर्णय का मार्ग प्रशस्त करते हैं परंतु कुतर्क अज्ञानता के परिणाम होते हैं।



यदि हम हिन्दू धर्म ग्रंथों वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, गीता आदि का अध्ययन एक साहित्य की दृष्टि से करें तो इन धर्म ग्रन्थों में वर्णित प्रसंगों में हमें नीति अनीति एवं प्रबंधन के अनेक सूत्र स्पष्ट दृष्टिगत होंगे जो हमें विषम से विषम परिस्थितियों में निर्णय लेने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
रामायण किष्किंधा काण्ड का एक छोटा सा प्रसंग है:
बाली प्रश्न: धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं॥मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥

प्रभु श्री राम उत्तर: अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥



रामानन्द सागर निर्मित “रामायण” धारावाहिक एपिसोड 37 में प्रभु श्री राम ने मनु स्मृति को उद्धृत कर कहा- “सत्पुरुषों का धर्म बहुत सूक्ष्म होता है, इसे समझना बहुत कठिन हैI यदि राजा पापी को दंड दे तो पापी उस दंड को भोग कर निष्पाप हो जाता है परंतु यदि राजा पापी को उचित दंड न दे तो उस दंड का फल राजा को स्वयं भोगना पड़ता हैI”



एक राष्ट्राध्यक्ष को क्या करना चाहिये इसका उत्तर उक्त प्रसंग में निहित है-
मुगल हिदुस्तान में आक्रांता और आतताई थेI इन आक्रांताओं ने हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण किया और उनमें इतनी कट्टरता भर दी जो पीढी दर पीढ़ी चली आ रही है और उनमें हिन्दुत्व की सुलभ सहिष्णुता, समावेशता विलुप्त हो गई और आतताई गुण विद्यमान रहेI आज के अधिकांश मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू ही थेI
जिस प्रकार एक परिवार में, पति पत्नी में, पिता पुत्र में विचारों की भिन्नता सीमा से परे होने पर विघटन अवश्यम्भावी हो जाता है उसी प्रकार दो वर्गों/दो धर्मों का सह अस्तित्व भी तभी तक सम्भव है जब तक दोनो वर्गों में विचारों की भिन्नता सीमा के अंदर हो, दोनों में सामन्जस्य हो, सहिष्णुता हो और लचकता (फ्लेक्सिबिलिटी) हो, कट्टरता न हो। अन्यथा “हिन्दू मुस्लिम भाई भाई” का नारा सिर्फ बेईमानी है। चूंकि मुस्लिम (धर्मांतरित हिन्दू) हिन्दुत्व की सुलभ सहिष्णुता, समावेशता खो चुके हैं इसी लिये यह संभव नहीं हो पा रहा हैI



देश का बटवारा भी कुछ अतिवादी नेताओं की सोच और दोनों वर्गों के विचारों में धुर भिन्नता के कारण ही हुआI बटवारे के बाद जो मुस्लिम हिदुस्तान में रह गये उनको हमारे नेता अपने राजनैतिक लाभ के लिये एक वोट बैंक की तरह देखते रहेI सदैव एक वर्ग को बहुसंख्यक होने का हवाला दे कर सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते रहे और दूसरे वर्ग को अल्पसंख्यक होने दुहाई दे कर उनकी सभी धृष्टता, अमानवीय कृत्यों को नजर अंदाज करते रहे, क्षमा करते रहे, तुष्टिकरण करते रहे और विशेष सुविधायें देते रहेI फल स्वरूप उनकी धृष्टता, अमानवीय कृत्य बढ़ते रहे।



संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी तो ठीक है परंतु अतिव्यक्ति स्वीकार्य नहीं हैI हम अपराधी के मानवाधिकारों की बात करते करते पीड़ित के मानवाधिकार को भूल जाते हैं और न्यायिक प्रक्रिया को विलंबित करते हैंI हम अल्पसंख्यक के मानवाधिकार की बात करते हैं परंतु बहुसंख्यक के मानवाधिकार भूल जाते हैंI कई बार हम अल्पसंख्यक एक विशेष समुदाय को ही मानते हैं और दूसरे अल्पसंख्यकों को भूल जाते हैंI सभी विशेष सुविधाएं एक समुदाय विशेष के अल्पसंख्यकों को ही देते हैंI अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली विशेष सुविधाएं क्षेत्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों की जनसंख्या के आधार पर होना चाहिये न कि राष्ट्रीय स्तर की जनसंख्या के आधार परI



एक ओर उस्ताद बिस्मिल्ला खान, उस्ताद जाकिर हुसैन जैसे कलाकार हैं और दूसरी ओर जावेद अख्तर, शाह रुख खान जैसे कलाकार हैं। एक ओर डाo अब्दुल कलाम, आरिफ़ मोहम्मद खान जैसे बुद्धिजीवी हैं और दूसरी ओर मोo हमीद अंसारी और एसo वाईo कुरेशी जैसे बुद्धिजीवी हैं। एक ओर कबीर, रहीम, हजरत निजामुद्दीन औलिया जैसे सूफी सन्त हैं और दूसरी ओर ओवैसी, साद जैसे मौलवी/इमाम हैं, तबलीगी जमात जैसे संगठन हैं। एक सह अस्तित्व को साकार करने वाले और दूसरे विघटनकारी प्रवृति का पोषण करने वालेI विडम्बना यह है कि प्रथम श्रेणी के सुविचार मुस्लिम बाहुल्य में प्रसारित नहीं हो पाते हैं जब कि दूसरी श्रेणी अपनी कुत्सित विचार धारा सामान्य मुस्लिम समाज को आसानी से प्रभावित कर लेती है। इसीलिये दोनो वर्गों के सह अस्तित्व की सम्भावना दिन प्रति दिन क्षीण होती जा रही है।



प्रथम श्रेणी खुल कर अपने वर्ग की अनीतियों, अनैतिक कृत्यों का विरोध नहीं करती, इससे इनके कुकृत्यों को मौन समर्थन मिलता है और इसी कारण शाहीन बाग, तबलीगी जमात मरकज जैसे प्रकरण होते हैं। शाहीन बाग ने जहाँ एक ओर अकारण तीन माह से अधिक समय तक दिल्ली में जन जीवन अस्त व्यस्त किया वहीं दूसरी ओर तबलीगी जमात ने करोना महामारी का प्रसार किया और सम्पूर्ण भारत को एक गहन खतरे में धकेल दियाI तबलीगी जमात ने करोना सैनिकों के साथ जिस प्रकार का अमानवीय कृत्य किया उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय कम हैI



जब हमें अपनी सम्पूर्ण शक्ति इस महामारी से लड़ने में केंद्रित करनी थी हमें इनकी धर पकड़ और इनके अमानवीय कृत्यों को नियन्त्रित करने के लिये विकेन्द्रित करनी पड़ रही हैI धन्य हैं हमारे प्रधान मन्त्री श्री मोदी जी उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति, दृढ संकल्प और धैर्य। आज इन विषम परिस्थितियों में सम्पूर्ण विश्व भारत के कुशल केंद्रीय नेतृत्व का लोहा मान रहा है, इस महामारी के समाधान के लिये भारत की ओर उन्मुख है।



अब सह अस्तित्व के मूल्यों के निर्धारण का निर्णायक समय है। भारत में शान्ति स्थापना, स्थिरता के लिये कुछ कठोर निर्णय सभी विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध परमावश्यक हैं। तुष्टीकरण नीति को छोड़ कर एक राष्ट्र, एक संविधान, एक नीति का प्रतिपादन और अमल आवश्यक हैI अभी नहीं तो कभी नहीं।

*कृष्ण मोहन अग्रवाल, गाजियाबाद

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