Sunday 17th January 2021

सोशल साइट्स की अफवाहों से सावधान

सोशल साइट्स की अफवाहों से सावधान

लेख*मीरा सिंह ‘मीरा’

समस्या चाहे कोई भी हो, आजकल चुटकी बजाते समाधान मिल जाता है। यकीन नहीं हो तो आप सोशल मीडिया पर नजर दौड़ा कर देख लीजिए। हर समस्या का समाधान वहां उपलब्ध मिलेगा । वास्तविक जीवन में बेशक कोई दो शब्द भी नहीं बोलता हो, लेकिन सोशल साइट्स पर ऐसे उपदेश देते हैं मानो कोई अवतारी हो। उनके ज्ञान दर्शन से बड़े-बड़े उपदेशकों को काठ मार देता है। बोलती बंद हो जाती है। दुनिया दांतो तले उंगली दबाने के लिए मजबूर हो जाती है। सोशल साइट्स पर तो ऐसे उपदेशों की अक्सर ही बाढ़ सी आ जाया करती है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि कभी-कभार क्या अक्सर ही हम किसी उपयोगी खबर को नजरअंदाज कर देते हैं। दरअसल मनोविज्ञान में उपचार की एक पद्धति है जिसके तहत कष्टों से मुक्ति के लिए इंसान को दुखों /कष्टों के वेग को बढ़ा दिया जाता है। इससे वह पीड़ित व्यक्ति उस कष्ट या तनाव के प्रति अनुकूल समायोजित व्यवहार करने लगता है। सोशल मीडिया पर भी शायद यही पद्धति अपनाई जाती है । बेचारा पाठक जबरन तनाव के अथाह दरिया में डूबा दिया जाता है। क्या सही, क्या गलत,उसे सोचने विचारने की मोहलत नहीं मिलती है।वह समस्याओ के मकड़ जाल में फंस कर छटपटाने लगता है।अनचाहे उसकी दिल की धड़कन बढ़ने लगती है।इसी के साथ बी पी, शुगर,अवसाद जैसी कई बीमारियां उसके मन में शरण पा जाती हैं। बीमारियों को पुष्पित पल्लवित होने के लिए वहां अनुकूल वातावरण मिलता है।हृष्ट-पुष्ट बीमारियां से इंसान की प्रतिरोधक शक्ति नष्ट हो जाती है।



मानव जीवन में कोरोना के पदार्पण के साथ ही सभी ज्ञानी ध्यानी मुफ्त अधपका ज्ञान बांटते नजर आए।सच कहूं तो सोशल साइट्स पर ज्ञान की खुदरा दुकानों की भरमार हो गई। मानो अफवाहों के दिन ही फिर गए ।किसी को यह अंदाजा नही था कि अफवाहे इतनी तेजी से फैल जाएंगी। लगता है कोरोना और अफवाहों में कोई प्रतिस्पर्धा छिड़ गई है। दोनों की विध्वंसक शक्तियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।शायद इस बात की शर्त लगी है कि सबसे ज्यादा किसका प्रसार होता है? सबसे अधिक मारक कौन है?उत्पत्ति के लिहाज से अफवाहे कोरोना से बहुत पहले वजूद में आई हैं। ये अव्वल नंबर की धावक के रूप में मशहूर भी रही हैं। इसे किसी माध्यम की जरूरत नहीं होती है। पलक झपकते कही से कही पहुंचने की क्षमता रखती हैं। यकीनन अफवाहें इंसानों की कालजयी रचना हैं।यह व्यक्ति को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं। कोरोना से ज्यादा व्यापक और घातक सिद्ध हो सकती हैं। एक साथ पूरे समुदाय को अपनी चपेट में ले लेती हैं।सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह शत्रु होकर भी शत्रु नहीं प्रतीत होती है। मेरे समक्ष कुछेक दृष्टांत है। जिसे मैं साझा कर रही हूं।



कल रात सोने जा रही थी, तभी मेरा मोबाइल घन घना उठा। मन कुछ अलसाया था। फोन रिसीव नहीं करना चाह रहा था।फिर भी अनचाहे मैं फोन रिसीव कर ली ।फोन पर एक शुभचिंतक थी। वो कहने लगी “मुझे पता है तुम सो गई होगी। पर क्या करें? बात इतनी जरूरी थी कि तुम्हें बताना जरूरी लगा।” इस पर मैं चौक कर पूछ बैठी “तबीयत तो ठीक है ना ?वो मुझे आश्वस्त करते हुए बोली “सब ठीक है ।एक बात बताओ तुम्हारे घर में मिट्टी का दीया है कि नहीं? अचानक दीया की बात से मुझे फिर झटका लगा।



“दीया? मगर किसलिए? “अरे, तुम बोलो ना? दीया है कि नहीं ? वैसे मुझे याद है। जब मैं तुम्हारे घर आई थी, उस वक्त तुम्हारे घर में मिट्टी के कई दिए थे।पूजाघर में देखना । दीया जरूर होगा और अगर नहीं भी है तो बाहर के गमले से थोड़ी सी मिट्टी निकाल कर दो दीया बना लो। एक अपने पति के नाम से और एक अपने बेटे के नाम से। उसमें सरसों का तेल डाल देना और शीतला मां को स्मरण कर दीया जला देना ।यह काम भूलना नहीं। उनकी बातों से जम्हाई लेते हुए मेरे बड़बोले मुंह से निकल गया “वो तो ठीक है।पर आपको यह जानकारी कहां से उपलब्ध हुई है ?” उनकी बातों से ज्ञात हुआ खबर दूसरे राज्य की सीमा लांघ कर अर्थात उड़ीसा से बिहार पहुंची थी। दावा किया गया था कि जो इस अनुष्ठान को सच्चे मन से करेगा,वो और उसका परिवार कोरोना के कोप का भाजन नहीं होगा। पास में बैठी मेरी बेटी भी यह बातें सुन रही थी। वह पूछ बैठी “सिर्फ दो ही दीया जलाने के लिए क्यों कहा गया? यहां तो हम चार लोग रहते हैं ।आपकी और मेरी जिन्दगी क्या कोई मायने नहीं रखती? मैंने उसे समझाया ” छोड़ो ना। इस तरह की अफवाहें अक्सर उठती रहती हैं।पुरुष प्रधान समाज है न, इसलिए पुरुषों की जिंदगी बचाने की बात होती है। महिलाएं तो वैसे ही बला होती हैं। उनके पास कोई दूसरी बला कहां से आ सकती हैं? इस पर बेटी हंस पड़ी ।



एक दिन फिर एक फोन आया। इस बार मेरी एक परिचित फोन पर थी । वह बतायी कि उनकी मामी के गांव से फोन आया था ।वहां एक साधु बाबा आए थे। लोगों ने उनसे कोरोना से मुक्ति का उपाय पूछा तो कहने लगे कि यह दैवीय आपदा है ।इससे मुक्ति के लिए पानी में पांच इलायची और थोड़ी सी चाय पत्ती डाले ।उसे अच्छी तरह से खौला ले।उस उबले पानी को घर के ईशान कोण पर कपूर जलाकर रखे।फिर वह उबला पानी घर के सभी सदस्यों को पीने के लिए दे ।मैंने सोचा सबको बता दूं। इसलिए तुम्हें भी बता रही हूं । उनकी अज्ञानता पूर्ण बातें सुनकर मैं अचंभित थी।एक पढे लिखे शिक्षित इंसान से ऐसी बातों की उम्मीद नहीं थी।विपत्ति में इंसान सूझ-बूझ खो देता है, सुनी थी।कोरोना के बदौलत इससे साक्षात्कार भी हो गया।



अफवाहों की यह झलकियां थी ।आप समझ रहे हैं ना ? कुछ दिनों से धर्म के ठेकेदार जो दम साधकर बैठे थे । उनकी भी दुकानें चल पड़ी हैं। कहने लगे हैं कि यह सब मालिक का कोप है। उसके सिवा कोई बचा नहीं पाएगा।कुछ समुदाय सोशल डिस्टेंसिंग की बात स्वीकार नहीं कर रहे है।उन्हें यह कोई प्रपंच लग रहा है। उनके धर्म पर प्रहार प्रतीत हो रहा है।वो तो यह भी सोचते हैं कि उन्हें एक दूसरे से दूर करने की साजिश की गई है । उन महानुभावों को कौन समझाए “भैया यह नया दुश्मन कोरोना जो है न ? किसी जाति संप्रदाय से ताल्लुक नहीं रखता है। आप के भले के लिए सामाजिक दूरी बनाने की बात कही जा रही है। नहीं मानेंगे तो खुद तो जिंदगी से हाथ धोएंगे ही, अपने साथ कई शुभचिंतकों को भी ले डूबेंगे। क्या है ना ,यह बहुत अलग मिजाज का शत्रु है। इंसान को आज तक जितने भी शत्रुओं से पाला पड़ा था, कोरोना उन सबसे एकदम अलग है। मेरा तात्पर्य है कि आज तक जो भी अपने समूह से अलग होकर दुश्मन के खेमे में गये थे,उन्हे वहां विशिष्ट स्थान मिला था । चाहे लंकापति रावण का भाई विभीषण हो या महाबली बाली का भाई सुग्रीव ।विरोधी उन्हें अपना मित्र का दर्जा दिए थे।उन्हें सम्मानित किए थे ।उनको बहुत लाभ पहुंचाए थे ।



इस युग में ही ब्रिटिश हुकूमत को याद कीजिए। जो लोग अंग्रेजों के साथ दिए थे, जाते जाते अंग्रेज उनके बारे न्यारे कर गए ।आज भी अंग्रेज भक्तों की पीढ़ियां सुख चैन की बंसी बजा रही हैं। पर यह कोरोना उस मिजाज का नहीं है। सरकारी आदेश निर्देश नहीं मानने वाले नासमझो पर रहम करने के बजाय अपनी झोली में भर कर यमराज के पास भेजने की तैयारी कर देता है। दया धर्म से इसका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं। इसलिए समझदार बने।दुश्मन का मिजाज समझिए।हाथजोड़ी है भैया, संभल जाइए । बगावत का बिगुल मत बजाइए ।समय के साथ जरूरतें बदलती हैं ।आज के परिप्रेक्ष्य में अपने भले की सोच ही सर्वोत्तम सोच है । इसी सोच में मानव मात्र की भलाई निहित है। आपका भला अर्थात परिवार, समाज, देश व मानव जाति का भला है। समझे कि नहीं?आज सम्पूर्ण मानव जाति विभिन्न प्रकार के दुश्मनों के चक्रव्यूह में घिरा है।उनसे बचिए । अफवाहें भी दल बल के साथ हैं ।अवसर पाकर दबोचने के फिराक में है।उसके चंगुल में मत फंसीए। सच का सामना कीजिए ।कोरोना को मात देने के लिए अफवाहों से बचना अतिआवश्यक ही नहीं अवश्यंभावी है क्योंकि कोरोना से बच भी जाएंगे मगर जालिम अफवाहों के जाल से बच पाना आसान नहीं होगा। एक सप्ताह पहले की घटना याद है कि भूल गए? जान बचाने की ललक में एक मुल्क के बाशिंदे किस तरह एक जहरीला द्रव्य पीकर बेवजह जान गंवा बैठे । ऐसी कोई गलती आप मत कर बैठिएगा।देखने सुनने में आ रहा है कि आजकल कुछ लोग स्वच्छता को लेकर इतने सतर्क हैं कि खाद्य सामग्री, जो बाजार से ला रहे हैं उसे भी डिटेल से धोने का प्रयास कर रहे हैं। अरे भाई ठहरिए । यह सब क्या कर रहे हैं? ईश्वर ने आपको विशेष ज्ञान इंद्रियां प्रदान की हैं। कुछ काम उसके जिम्मे भी छोड़िए ।सदैव ध्यान रखिए कोरोना से बचने के प्रयास में आप कहीं अफवाहों के चंगुल में तो नहीं फंस रहे हैं । अफवाहें बहुत दिलकश लगती हैं। सहजता से हमें अपना ग्रास बना लेती हैं। मीठा जहर की तरह जीवन खत्म करती हैं और सामने वाले को आभास भी नहीं होता।इसलिए कोरोना के साथ अफवाहों से भी सावधान रहिए ।सदैव सावधान रहिए।जीवन अनमोल है ।इसकी हिफाजत स्वयं कीजिए ।

*मीरा सिंह ‘मीरा’, डुमरांव,जिला -बक्सर ,बिहार


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