Wednesday 21st April 2021

सुरक्षा के बीच फसलों की कटाई के उपाय करना जरूरी

सुरक्षा के बीच फसलों की कटाई के उपाय करना जरूरी

लेख*मोहित काबरा

देश के किसानों में आज गहरी चिंता हैं। अनेक राज्यों में इन दिनों खेतों में फसल सूखकर खड़ी हैं। उसकी कटाई के लिए हार्वेस्टर नहीं मिल रहे हैं और न ही श्रमिक। लॉकडॉउन के चलते ट्रेक्टर और कृषि संयंत्रों के संचालन के लिए कामगार नहीं मिल रहे हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गई हैं। किसी भी देश की आर्थिक स्थिति तभी मजबूत हो सकती हैं, जब वहाँ के गाँव में रहने वाला इंसान मजबूत होगा। आय दुगुनी होने का सपना संजोये किसान आज अपनी बोई हुई फसल की केवल लागत निकालने में भी संदेह कर रहे हैं। खेतों के ऊपर कोरोना का घना कोहरा छाने से किसानों का भविष्य उज्जवल होने के बजाय अंधकारमय लग रहा हैं। अन्नदाताओं के सामने वैसे तो साल भर अनेक प्रकार की समस्याएं रहती हैं, और वे संघर्ष की नियति में जीने के आदी हो चुके हैं, परन्तु महामारी का यह दौर उनकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा हैं। इस दिशा में आवश्यक उपाय करना उचित होगा।



यह अच्छी बात हैं कि इस कठिन दौर में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अद्भुत समन्वय और आपसी सहयोग देखने में आ रहा हैं। ऐसा होने से देश मजबूत हुआ हैं। महामारी से बचाव और सुरक्षा को लेकर किये जा रहे राज्यों के प्रयासों से लग रहा है, कि समूची मानव जाति की रक्षा इस समय उनका एकमात्र संकल्प हैं। आलोचनाओं और राजनीतिक मतभेदों के चलते आए दिन पक्ष और विपक्ष के बीच एक दूसरे को नीचा दिखाने की संवाद शैली को जैसे विराम लग गया हैं। कोरोना महामारी से बचाव के लिए लाॅकडाॅउन की अवधि बढ़ाना ही एक सफल उपाय हैं। दुनिया के अन्य विकसित देशों की तुलना में भारत में उठाए गए कदमों की इन दिनों प्रशंसा हो रही हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट में भारत के सुरक्षा उपायों को सराहनीय कहा गया हैं।



अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि इस बीमारी के कारण दुनिया भर में करीब पचास करोड़ लोग बेरोजगार हुए हैं। भारतीय संदर्भ में देखें तो यह अनुमान सटीक लगता हैं। पिछले साल से हम आर्थिक मंदी से जूझते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे। बजट में भी वित्तमंत्री ने जनकल्याणकारी योजनाओं पर अधिक बल देते हुए किसानों, गरीबों और मजदूरों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए ठोस प्रयास किए हैं। इन सब के बीच इस महामारी के प्रहार ने देश की जैसे कमर ही तोड़ दी हैं। पिछले दो माहों में बेरोजगार हुए लाखों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उघोग और कारोबार धरातल पर आ गए हैं। उघमी हो या मजदूर इस समय सभी कठिन दौर का सामना कर रहे हैं। उघोगपतियों, व्यापारियों और दुकानदारों को अपने कर्ज की किश्तें भरने और देयताओं को चुकाने की चिंता हैं, तो दूसरी तरफ उघोग और व्यवसायों से हटाए गए मजदूरों और श्रमिकों के सामने बेरोजगारी और भुखमरी का संकट हैं।




संकट की इस घड़ी में केंद्र सरकार ने चार करोड़ महिलाओं के जन-धन खातों में पांच-पांच सौ रूपये जमा कराये हैं। उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा भी ग्यारह लाख गरीबों के खातों में एक-एक हजार रूपये जमा कराए गये हैं। दिल्ली सरकार ने रोजाना दो लाख गरीबों के लिए भोजन कराने की योजना चलाई हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इंदौर में एक सौ दो चिकित्सकों की संख्या बढ़ा दी है। कोरोना मरीजों की बढ़ती तादाद को देखते हुए उन्होंने यह व्यवस्था की है। उम्मीद हैं कि अन्य राज्य भी गरीबों को राहत देने के लिए आवश्यक उपाय करेंगे। इन सब के बावजूद अनेक समस्याएं सुरसा की तरह मुँह खोले खड़ी हैं। राशन की दुकानों में भ्रष्टाचार होना, ग्रामीण अंचलों और कस्बाई क्षेत्रों में रोजगार के अवसर न होने से श्रमिकों का शहरों में पलायन होना, किसानों के सामने खाद-बीज और उनके उत्पादन का नकद समर्थन मूल्य समय पर न मिलना एवं छोटे दुकानदारों पर जीविकोपार्जन का संकट, शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तथा छोटे उघमियों की पूंजी और कर्ज अदा करने संबंधी समस्याएं भी बनी हुई हैं। इनका निदान होने से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।



कोरोना महामारी से बचाव और सुरक्षा को देखते हुए आवश्यक खाघ वस्तुओं के साथ-साथ अब सुरक्षा किट, दास्तानें, मास्क और सेनिटाइजर का भारी संख्या में उत्पादन और किफायती दरों पर वितरण आज आवश्यक हो गया हैं। जीवन रक्षक दवाइयों के मुफ्त वितरण और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार तथा जांच की सुविधाएं तहसील स्तर पर मुहैया कराना केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वय और आपसी सहयोग से ही संभव हैं। सुझाव यह भी हैं कि लाॅकडाॅउन के बाद भी देश के सभी जिलों में डाॅक्टर, नर्सेस और पैरामेडिकल स्टाफ की पर्याप्त संख्या में भर्ती की जाए। तहसील स्तर पर आधुनिक सुविधाओं से युक्त अस्पतालों को बनाया जाए। मरीजों और परिजनों को स्वास्थ्य सुविधाएँ और राशन वितरण की सुचारू व्यवस्था की जाए, तभी हमारा देश समृद्ध हो सकेगा। इसके अभाव में यदि हम आर्थिक रूप से कितनी भी प्रगति कर लें, परन्तु यह प्रगति नागरिकों की समस्याओं के चलते अधूरी ही कही जाएगी।

*मोहित काबरा
(लेखक प्राइम इंटरकार्प प्रा. लि. कम्पनी, इंदौर के निदेशक हैं)



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